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पानी के धोखे में मत रहिए

Wed, 08 May 2013 11:00 PM IST
मुरली मनोहर श्रीवास्तव
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पानी का रंग देख मैं खुद पानी-पानी हो गया हूं। अब तो पानी को वैज्ञानिक दृष्टि से रंगहीन, गंधहीन, स्वाद रहित कहकर परिभाषित नहीं कर सकते। थोड़ा-सा पानी मील्स ऑन ह्वील्स और स्ट्रीट फूड वालों के पास बचा है।
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वे अपने ग्राहकों से पुराना रिश्ता बचाए रखने के लिए आरओ की एक बड़ी बोतल और प्लास्टिक के कुछ गिलास साइड स्टूल पर रखते हैं। चाट-बताशे वाले भी मिर्च लगने पर कस्टमर को खांसी से बचाने के लिए बाल्टी में पीने का पानी टांगकर चलते हैं।

घनघोर महंगाई में ग्लास की जगह प्लास्टिक के मग्गे ने ले ली है। पर जहां जाना प्रेस्टिज इश्यू है, वहां पानी कहां बचा है? आप हॉट डॉग बर्गर या हैपी मेन्यू ले रहे हैं, तो कोल्ड ड्रिंक के लिए तैयार रहिए।
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मिडल क्लास रेस्टोरेंट में रेट लिस्ट की लिखा रहता है, मिनरल वाटर ऐंड ब्रेवरएज ऑन एमआरपी। जहां तक एक रुपये गिलास के रेट से ठेले पर मिल रहे पानी की बात है, तो उसे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक घोषित किया जा चुका है।

बचा म्युनिसिपैलिटी का नल, तो उसमें पानी आता कहां है? इसके बाद भी आप इस देश में पानी की उम्मीद करते हैं, तो मैं आपको घोर आशावादी की श्रेणी में रखता हूं।

इस देश की तीन चौथाई आबादी आज भी उसी पानी पर निर्भर है, जो नलके में नहीं आता और आता भी है तो इस वैधानिक चेतावनी के बाद कि पानी पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

मुझे शुरू से ही इस खोज पर संदेह रहा है कि धरती पर विकास के लिए पानी का होना जरूरी है। इसलिए दूसरे ग्रहों पर जीवन की खोज में जुटे वैज्ञानिकों के लिए आवश्यक है कि यदि वे अपने प्रयास में सफलता चाहते हैं, तो उन्हें चांद या मंगल पर कोल्ड ड्रिंक्स की खोज करनी चाहिए।

बहुत पहले एक शायर ने लिखा था, मेरी बेजुबान आंखों से जो गिरे हैं चंद कतरे, वे समझ सकें तो आंसू न समझ सकें तो पानी। सो पानी तो समझ का फेर है। आज किसी भी क्षेत्र में चले जाइए, पानीदार लोग हाशिये पर ही नजर आएंगे।

जो लोग आज जीवन में पानी को लेकर संजीदा हैं, वे चुल्लू भर पानी में डूब मरने को अभिशप्त हैं। और जो मानते हैं कि पानी के बिना जीने के ढेरों विकल्प उपलब्ध हैं, वे धड़ाधड़ विकास कर रहे हैं। सो, इस जमाने में मैं पानी का रंग देखकर हैरान हूं, क्योंकि आज पानी कितना भी उतर जाए, शर्म से पानी पानी होने का चलन नहीं रहा।
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