चीन के लद्दाख क्षेत्र में 15 अप्रैल से पहले की स्थिति में लौटना हमारे लिए राहत की बात है।
मीडिया, विपक्ष की दृढ़ता और सरकारी पक्ष द्वारा कम से कम उत्तरार्द्ध में चीन को कड़ा संदेश देने के कारण बीजिंग को कदम वापस खींचने पड़े।
चीन के प्रधानमंत्री इसी महीने भारत यात्रा पर आ रहे हैं, उनकी तैयारी के लिए हमारे विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद भी आज बीजिंग में बातचीत करेंगे। दोनों तरफ यात्राएं होनी चाहिए।
विवाद हल करने के लिए और भविष्य के लिए भी जरूरी है कि कूटनीतिक वार्ताएं एवं एक-दूसरे के साथ संवाद जारी रहे।
लेकिन चीनी सैनिकों ने लद्दाख क्षेत्र से अपने तंबू हटाकर जो संदेश दिया है, उसका गूढ़ार्थ समझने की जरूरत है। वर्ष 1962 में चीनियों ने नेफा और लद्दाख क्षेत्र में हमला किया था।
वे तेजपुर तक आ गए थे और फिर खुद ही लौट गए। वह चीन का एकतरफा युद्धविराम था। इस बारे में हेनरी किसिंजर ने अपनी पुस्तक ऑन चाइना में माओ त्से तुंग की युद्ध नीति का दिलचस्प वर्णन किया है।
उन्होंने लिखा है कि माओ ने अक्तूबर, 1962 से पहले अपने सेना कमांडरों से प्राचीन चीनी युद्धनीति का जिक्र करते हुए कहा था, यदि भारत को बातचीत की मेज पर अपने पक्ष में झुकाना है, तो उसे एक प्रबल आघात देकर लौट आओ। इसी नीति के अंतर्गत 1962 में चीन भारत को प्रबल आघात देकर लौट गया था।
अपने प्रधानमंत्री की प्रथम भारत यात्रा से पहले चीन ने यह कदम क्यों उठाया होगा? चीन ने न केवल अपनी शक्ति और लद्दाख क्षेत्र में भूमि पर अपने दावे को प्रबलता से रेखांकित किया, बल्कि नई दिल्ली पर यह दबाव भी सफलतापूर्वक डाला कि वह इस क्षेत्र में चीनी दावे के अनुकूल विवाद का हल निकालने में विलंब न करे।
इसके साथ ही चीन ने हमारी सामरिक तैयारियों की कमियां भी उजागर कर दीं। चीन अगर वापस नहीं जाता, तो न केवल चीनी प्रधानमंत्री की भारत-यात्रा खटाई में पड़ जाती, बल्कि पिछले लगभग तीन दशकों में भारत-चीन संबंधों में जो सुधार हुआ है, उस पर पानी फिर जाता।
इसलिए चीन का वापस लौटना और भारतीय सैनिकों का भी पुरानी स्थिति तक आ जाना न किसी के लिए जीत माननी चाहिए, और न ही हार, बल्कि राजनीतिक मतभेद से परे होते हुए इसे कूटनीतिक परिपक्वता का ही एक हिस्सा मानना चाहिए। यहां यह स्पष्ट होना चाहिए कि भारतीय सैनिक अपनी प्रारंभिक चौकियों से पीछे नहीं हटे, जैसा कि कुछ टिप्पणियों में कहा जा रहा है।
लेकिन यहां यह सवाल बना हुआ है कि चीनी सैनिकों का करीब 20 किलोमीटर तक भीतर आना संभव कैसे हुआ। इसका सीधा-सा कारण है कि न तो भारतीय सैनिकों की संख्या इस क्षेत्र में प्रबल है, न ही भारत ने अपनी दावेदारी वाली जमीन तक कोई रास्ता बनाया है। मैं 1996 से लगातार लद्दाख के हर हिस्से में जाता रहा हूं।
इस क्षेत्र में सीमा की चौकसी का काम आश्चर्यजनक रूप से भारत-तिब्बत सीमा पुलिस को दिया गया है। विडंबना है कि भारत-तिब्बत सीमा पुलिस सेना के स्थानीय कमांडर को रिपोर्ट नहीं करती और उसके डीआईजी लगभग 300 किलोमीटर दूर लेह में बैठते हैं।
इस क्षेत्र में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस का आईजी मुख्यालय श्रीनगर में है। स्थिति का जायजा लेकर निर्णय लेने में ही इतना समय निकल जाता है कि दुश्मन के लिए हमारे क्षेत्र में घुसने का पूरा मौका मिल जाता है। सेना के पास पर्याप्त संख्या में अधिकारियों की भी बेहद कमी है।
जिस देश के पास सरहद तक जाने के लिए पक्की सड़कें न हों, पर्याप्त संख्या में सैनिक और साजो-सामान न हो और राजनेता भ्रष्टाचार, घोटाले, जातीयता और प्रांतीयता में उलझे हुए हों, वहां सरहद की रक्षा के लिए कौन खड़ा है? लिहाजा अगर हमने रक्षा तैयारियां, सीमा तक सड़कें और सैनिक सघनता पर ध्यान नहीं दिया, तो देपसांग जैसी घटनाएं भविष्य में भी बार-बार होंगी।