जल की समस्या अकेले हमारे देश की नहीं, समूची दुनिया की है। अनियंत्रित-अनियोजित विकास, वनों के अंधाधुंध कटाव, बढ़ती आबादी, बढ़ता प्रदूषण और कंक्रीट के जंगलों का बढ़ता क्षेत्रफल हमारे देश में जल संकट को बढ़ाने मे अहम भूमिका निभा रहा है।
यही वजह है कि गांवों की बात तो दूर, शहरी इलाकों तक में स्थानीय निकाय नागरिकों को पेयजल उपलब्ध कराने में नाकाम साबित हो रहे हैं। अभी तो गर्मियों का मौसम आया भी नहीं है, लेकिन महानगरों, नगरों और कस्बों में पेयजल के लिए मारामारी शुरू हो गई है।
सबसे बुरी हालत तो जीवनदायिनी नदियों की है, जो 70 फीसदी प्रदूषित हैं। केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड भी यह स्वीकार कर चुका है। वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि जल संकट दूर करने के लिए शीघ्र ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो मानव अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
दुखद है कि यह जानते-समझते हुए भी राजनीतिक नेतृत्व मौन है। उसे इसकी कतई चिंता नहीं है कि देश में प्रदूषित पानी पीने से हर साल हजारों लोग जानलेवा बीमारियों का शिकार होकर अनचाही मौत के मुंह में चले जाते हैं। देश की जल नीति ने तो बांध निर्माण को ही प्राथमिकता दी, जो पर्यावरण विनाश का परिचायक है।
यह जानते-बूझते हुए भी कि आर्थिक दबाव पड़ने के बावजूद बांध से ऊर्जा का लक्ष्य हासिल नहीं हुआ, सरकार आंख पर पट्टी बांधे बैठी है। जबकि पारंपरिक कुएं-तालाब आदि से न तो पर्यावरणीय नुकसान होता है, न पुनर्वास की समस्या आती है।
सच्चाई यह है कि देश के कई हिस्सों में आज भी नलकूपों और कुओं से ही सिंचाई की जाती है। फिर भी सरकार के जल संसाधन विभागों द्वारा बांधों और जलाशयों के निर्माण पर ही खर्च किया जाता है, कुओं, तालाबों, जोहड़ों आदि के निर्माण पर नहीं। यह विसंगति भी जल संकट की बढ़ोतरी का एक अहम कारण है। बांधों, कुओं, तालाबों आदि के निर्माण की लागत के अंतर को कोई झुठला नहीं सकता।
जहां तक भूजल का सवाल है, केंद्र और राज्य सरकारों तथा उनके योजनाकारों की सोच और दिशा मात्र संयम बरतने तक ही सीमित रही है। उनका प्रयास आंकड़ों को इकट्ठा करना, उनकी जांच-पड़ताल करना और शोध करना ही है।
देखा जाए, तो समस्या का कारण यही है, क्योंकि उन्होंने अभी तक इस दिशा में कोई भी ठोस प्रयास नहीं किया है। यह सर्वविदित है कि वर्षा जल का तीन से सात फीसदी हिस्सा धरती के नीचे प्राकृतिक तरीके से संरक्षित होता है। इसके जरिये ही कुओं और नलकूपों की मदद से भूजल समाज को मिलता रहा है।
यदि इस जल संरक्षण की प्रक्रिया को मानवीय प्रयासों से बढ़ाया जाता है, तो नलकूपों, कुओं, तालाबों आदि से सिंचाई को स्थायित्व प्रदान किया जा सकता है। बेशक बांधों की सिंचाई क्षमता कुओं और नलकूपों से अधिक होती है, लेकिन उसमें लगातार गाद जमने के कारण जहां उनकी उम्र घटती जाती है, वहीं सिचाई क्षमता भी घटती चली जाती है।
हमारे यहां अनुमानतः कुल 4000 क्यूबिक किलोमीटर पानी बरसता है। इसमें से 690 क्यूबिक किलोमीटर पानी सतही जल संरक्षण संरचनाओं यथा-बांध, जलाशयों के माध्यम से सिंचाई में उपयोग किया जाता है और लगभग 2000 क्यूबिक किलोमीटर पानी पेड़-पौधों की जड़ों में समा जाता है, कुछ नीचे भूजल में जा मिलता है और कुछ भाप बनकर उड़ जाता है। शेष 1310 क्यूबिक किलोमीटर पानी बहकर समुद्र में जा मिलता है।
जाहिर-सी बात है कि यह हिस्सा बांध-जलाशय आदि में उपयोग में लाए जाने वाले हिस्से का लगभग दोगुना है, जिसका कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है। यदि इसी पानी को एक सोची-समझी रणनीति के तहत भविष्य में उपयोग के लिए संरक्षित किया जाए, तो देश में पानी का कोई संकट नहीं रहेगा। लेकिन आज तक इस दिशा में जो भी प्रयास किए भी गए हैं, उनका कोई कारगर परिणाम सामने नहीं आया है।
जल संरक्षण के साथ-साथ घरेलू एवं व्यावसायिक कार्यों में जल के अपव्यय को रोकने हेतु ठोस कदम उठाना जरूरी है। जब तक पानी की एक-एक बूंद का हिसाब नहीं रखा जाएगा और समाज को उसके महत्व के बारे में जागरूक नहीं किया जाएगा, तब तक जल संकट से निपटना असंभव है।