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सामाजिक न्याय की योद्धा

Fri, 15 Feb 2013 09:36 PM IST
हेमेन्द्र मिश्र
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आज से पंद्रह-सोलह वर्ष पहले तक 'वजाइना' (स्त्री जननांग) बोलने को लेकर कई तरह की वर्जनाएं थीं, यहां तक कि अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी सार्वजनिक मंच पर इस शब्द के प्रयोग पर अघोषित प्रतिबंध-सा था। लेकिन 1996 में आए एक नाटक द वजाइना मोनोलॉग्स ने पूरे परिदृश्य को बदल दिया।
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140 से अधिक देशों में मंचित इस नाटक ने रूढ़िवादी सोच का पटाक्षेप तो किया ही, यौन हिंसा की शिकार हुई महिलाओं के आत्मसम्मान को भी नई ऊंचाई दी। और अब इसी नाटक की लेखिका इव एंस्लर 'वन बिलियन राइजिंग' आंदोलन के जरिये महिला हिंसा के खिलाफ अलख जगा रही हैं। उनके इस आंदोलन को दुनिया भर में जिस तरह हाथोंहाथ लिया जा रहा है, एस्लर को घरेलू और यौन हिंसा मुक्त समाज का अपना वह सपना पूरा होता दिख रहा है, जिसका कभी वह भी शिकार रही हैं।

छोटी उम्र में, जब बच्चों को मां-बाप के स्नेह की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, एंस्लर पिता द्वारा यौन उत्पीड़ित हुई। ऐसी घटनाएं बाल मन को कितना प्रभावित करती हैं, इसे एंस्लर के इन शब्दों से समझा जा सकता है-उस घटना ने मुझे समय-पूर्व वह सब सोचने-समझने को मजबूर किया, जिसे ईश्वर ने वयस्कों के लिए तय कर रखा है। बेशक बीतता वक्त हर मर्ज की दवा होता है, लेकिन एंस्लर इतनी भाग्यशाली नहीं रहीं। शादी के बाद घरेलू हिंसा, तो कार्यस्थल पर भेदभाव ने उन्हें विद्रोही बना दिया, और तब उन्होंने कलम को अपना हथियार बनाने की ठानी। एक्सट्राऑर्डिनरी मेजर्स, द गुड बॉडी, आई एम ए इमोशनल क्रीचर जैसी कई रचनाओं ने उन्हें पाठकों का पसंदीदा बनाया।
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अब तक की जीवन यात्रा में एंस्लर के कई रूप दिखे हैं। अपने से महज आठ वर्ष छोटे दत्तक पुत्र की परवरिश कर उन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारी निभाई, तो परमाणु विरोध के लिए न्यूयॉर्क की सड़कों पर बम-सा ड्रेस पहनकर राजनीतिक दायित्व का निर्वहन किया। महिला हिंसा के खिलाफ वी-डे आंदोलन शुरू कर वह 'सामाजिक ऋण' चुकाने का प्रयास भी कर रही हैं। अब वह 'वुमेन स्प्रिंग' की पटकथा लिखना चाहती हैं। बकौल एंस्लर, मलाला यूसुफजई पर हमला, दिल्ली में चलती बस में बलात्कार की घटना और ओहियो में सामूहिक दुष्कर्म से प्रेरित 'वन बिलियन राइजिंग' तो एक पड़ाव-भर है, सामाजिक न्याय और समानता की इस लड़ाई में कई रंग आने अभी बाकी हैं।
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