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समाधान बताएं सियासी दल

Tue, 23 Jul 2013 08:42 PM IST
शंकर अय्यर
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हमारा देश आशा और निराशा के दोराहे पर खड़ा है। आशा की वजह देश की जनसांख्यिकीय हकीकत है, जहां 10 में से 6 लोगों की उम्र 35 साल से कम है। निराशा इसलिए है, क्योंकि राजनीतिक दल गंभीर और राष्ट्रीय हित से जुड़े मुद्दों पर भी एकजुट नहीं दिखते।
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अपने आसपास नजर डालें, तो पता चलता है कि शासन का हर पहलू कमजोर होता जा रहा है। यही नहीं, चाहे वह प्राकृतिक आपदा हो या फिर मानव जनित संकट, प्रतिक्रिया बेहद संवेदनहीन होती है। उत्तराखंड में आई आपदा की पटकथा पहले से लिखी हुई थी, बस उसके होने का इंतजार था। अवैध निर्माण को रोकने का जिम्मा जिन लोगों पर था, उनके लालच और आपराधिक लापरवाही ने इस संकट के लिए ईंधन का काम किया। आपदाओं को नियंत्रित करने की केंद्र की कमजोर योजना के चलते यह संकट विकराल हो गया।

राजनीतिक हित और राष्ट्रीय हित के बीच भ्रम के चलते नक्सल समस्या एक बार फिर तीव्र हो रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत सुरक्षा के दृष्टिकोण से सीमा पार आतंकवाद एक गंभीर मुद्दा है। मगर इस मुद्दे को वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
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एक अन्य पहलू पर नजर डालें तो, दुनिया का हर तीसरा कुपोषित बच्चा भारत में है। सामाजिक क्षेत्र पर केंद्र और राज्य सरकारें कुल मिलाकर पांच लाख करोड़ रुपये खर्च करती हैं, फिर भी कई मामलों में हमारे यहां का मानव सूचकांक उप-अफ्रीकी देशों से भी बदतर है। भारत में पैदा होने वाले बच्चे की जीवन प्रत्याशा ग्वाटेमाला और इराक में पैदा होने वाले बच्चे की तुलना में काफी खराब है।

अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत को ही ले लीजिए। चालू खाता घाटा सबसे उच्च स्तर पर है और रुपया अपने सबसे निम्नतम स्तर पर, रोजाना का सरकारी कर्ज 1,600 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है और आर्थिक विकास दर इस दशक में सबसे कम पांच फीसदी पर है।

वास्तव में भारत का सकल घरेलू उत्पाद पिछले 39 महीनों या फिर पिछले 13 तिमाहियों में से 10 में गिरता रहा है। यह अलग बात है कि सरकार उच्च विकास के दावे कर रही है। अगर सरकार के दावे सही हैं, तो फिर नौकरियों में इजाफा क्यों नहीं हो रहा है?

योजना आयोग के अनुसार, 1999-2004 के बीच भारत में 6.07 करोड़ नौकरियों का सृजन हुआ। वहीं, 2004-05 और 2009-2010 के बीच केवल 27.6 लाख नई नौकरियां सृजित हुईं। दावा किया जा रहा है कि गरीबी कम हुई है। अगर ऐसा है तो आईएफपीआरआई, यूनिसेफ के कुपोषण सूचकांक और संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक पर भारत की स्थिति बदतर क्यों है?

और अगर गरीबी कम हुई है, तो देश की 67 फीसदी आबादी को खाद्य सुरक्षा अध्यादेश के अंतर्गत लाने की क्या जरूरत है? एनडीए की तुलना में यूपीए की अगुवाई में देश में ज्यादा तेज तरक्की हो सकती है, लेकिन आकांक्षाओं का केंद्र भविष्य होना चाहिए न कि बीता हुआ वक्त। क्रिकेट में तो हेलीकॉप्टर शॉट काम कर सकता है लेकिन करदाताओं की धन वर्षा का हेलीकॉप्टर समाधान काम नहीं आता।

तकरीबन एक चौथाई जनसंख्या को बिजली की सुविधा नहीं है, कुल 10 में से चार के पास बैंक खाते नहीं हैं, 121 करोड़ की आबादी वाले देश में केवल 5.5 करोड़ लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा है। 10 में से नौ लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, जिनको पेंशन लाभ नहीं मिलता। 10 में से छह घरों में शौचालय नहीं है। 6.8 करोड़ लोग झुग्गियों में रहते हैं। यह संख्या फ्रांस की कुल आबादी से अधिक है।

10 में से छह भारतीय कृषि पर निर्भर है, जिसकी राष्ट्रीय आय में हिस्सेदारी कुल आय का छठा भाग है। और अनुमान है कि देश की कुल आबादी के 22 फीसदी लोग या फिर 26 करोड़ से ज्यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर कर रहे हैं। और यह भी नहीं है कि इन समस्याओं के समाधान अज्ञात हैं।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संकट यह है कि श्रमिकों का खेतों से उद्योगों की तरफ अत्यधिक स्थानांतरण हो रहा है। भारत में एक वयस्क श्रमिक द्वारा स्कूलों में बिताया गया वर्ष बमुश्किल 4.4 साल है। ऐसे में नीतियों में नरमी लाकर कंस्ट्रक्शन और निर्माण के क्षेत्र में हमें नौकरियां पैदा करनी चाहिए।

उद्योग और नए शहरों को बढ़ावा देने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) अच्छा विचार था। मनरेगा का इस्तेमाल कृषि, सिंचाई और ग्रामीण संपत्तियों को सक्षम बनाने में किया जा सकता था। दरअसल, इन नीतियों से खैरात प्रवृत्ति में कम कर सकती थीं। खाद्य कीमतों में जारी महंगाई का कारण बरबादी और वितरण प्रणाली का कमजोर होना है।

वैसे विभिन्न राजनीतिक दल लोगों के पैसे से सब्सिडी देकर आटा, चावल और दाल की आपूर्ति करके खुश हैं, क्योंकि इससे वोट बटोरने में सहूलियत होती है।

देश की सबसे बड़ी समस्या गरीबी नहीं, बल्कि समाधान खोजने की मानसिकता की ‘गरीबी’ है। देश के कई राज्यों में अच्छे कामकाज के पर्याप्त प्रमाण हैं, जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार करने की जरूरत है।

केरल चीन और विकसित राष्ट्रों से भी मानव विकास के मामले में आगे है। छत्तीसगढ़ में बेहतर जन वितरण प्रणाली का मॉडल सबके सामने है। अशिक्षा को कम करने के मामले में हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर के राज्य काफी आगे हैं। शहरीकरण और सड़कों का जाल बिछाने की दौड़ में गुजरात और तमिलनाडु काफी आगे हैं। इन सफल कहानियों को एकीकृत क्यों नहीं किया जाता। राष्ट्रीय एकीकरण परिषद इन पर चर्चा करने के लिए सबसे बेहतर स्थान हो सकती है, लेकिन दुर्भाग्य से अब यह नारेबाजी करने का एक अड्डा बन चुकी है।

राजनीतिक वर्ग के पास अवसर है कि 2014 के चुनाव में अपने घोषणापत्र में अपनी खूबियों का बखान करने के बजाय तीन या पांच मुख्य मुद्दों को जगह दें, जिनको वे सुलझाएंगे और यह भी बताएं कि वह इन समस्याओं को कैसे सुलझाएंगे।
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(शंकर अय्यर अर्थशास्त्र की राजनीति के विशेषज्ञ एवं एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक हैं)
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