फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

मुद्दा: सियासी नजर से वक्फ सुधारों को न देखें... संसदीय समिति के भीतर कटु मतभेद दुर्भाग्यपूर्ण

तारिक मंसूर, यूपी विधानसभा परिषद के मनोनीत सदस्य Published by: ज्योति भास्कर Updated Mon, 17 Mar 2025 07:52 AM IST

सार

यह कहना पूरी तरह से सही नहीं है कि वक्फ में सुधार बाहर से थोपा जा रहा है, बल्कि वक्फ सुधारों की मांग मुस्लिम समुदाय के भीतर से ही उठी है। 
विज्ञापन
विज्ञापन
Waqf Board - फोटो : अमर उजाला


ऐसे में, सरकार और संसद से यह अपेक्षा है कि वे एक ऐसी प्रक्रिया अपनाएं, जो मुसलमानों में व्याप्त डर को दूर करे। इस पृष्ठभूमि में, विधेयक को संसद के दोनों सदनों की एक संयुक्त समिति के पास भेजने का निर्णय स्वागत योग्य था। संसदीय समिति की रिपोर्ट को पेश करने पर सरकार और विपक्षी खेमे के बीच तीखे मतभेद चिंता का विषय हैं, क्योंकि यह एक राष्ट्रीय मुद्दे पर वस्तुनिष्ठ बहस के अवसर को खतरे में डालता है, जिसका महत्व किसी एक समुदाय से परे है।


एक ओर, सरकार सुधारों को भारत में वक्फ संपत्तियों के प्रशासन और प्रबंधन में सुधार के लिए आवश्यक मानती है, जिसमें वक्फ बोर्डों की दक्षता बढ़ाने के लिए वक्फ की परिभाषाओं को अद्यतन करने, पंजीकरण प्रक्रिया में सुधार करने और वक्फ रिकॉर्ड के प्रबंधन में प्रौद्योगिकी की भूमिका बढ़ाने जैसे उपाय शामिल हैं। दूसरी ओर, विपक्ष का आरोप है कि प्रस्तावित बदलावों से मुस्लिम अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकारों को नुकसान पहुंच सकता है। आइए, देखते हैं कि वक्फ सुधारों से जुड़े तीन विवादपूर्ण मुद्दे क्या हैं-


यह कहना पूरी तरह से सही नहीं है कि वक्फ में सुधार बाहर से थोपा जा रहा है, बल्कि वक्फ सुधारों की मांग मुस्लिम समुदाय के भीतर से ही उठी है। अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय को वक्फ संपत्तियों के कुप्रबंधन पर मुसलमानों से कई शिकायतें प्राप्त हुईं, जो बड़े पैमाने पर मुकदमों के रूप में सामने आईं। अप्रैल 2023 से मंत्रालय को प्राप्त शिकायतों के विश्लेषण में पाया गया कि 148 शिकायतों में से ज्यादातर अतिक्रमण, वक्फ भूमि की अवैध बिक्री, सर्वेक्षण और पंजीकरण में देरी और वक्फ बोर्ड और मुतवल्लियों के खिलाफ शिकायतों से संबंधित थीं। अप्रैल 2022 से मार्च 2023 तक केंद्रीय लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि प्राप्त 566 शिकायतों में से 194 अतिक्रमण और वक्फ भूमि के अवैध हस्तांतरण से संबंधित थीं और 93 शिकायतें वक्फ बोर्ड के अधिकारियों/ मुतवल्लियों के खिलाफ थीं।


इसके अलावा, वक्फ न्यायाधिकरणों के कामकाज के मूल्यांकन से पता चलता है कि न्यायाधिकरणों में 40,951 मामले लंबित हैं, जिनमें से 9,942 मामले मुसलमानों द्वारा वक्फ का प्रबंधन करने वाली संस्थाओं के खिलाफ दायर किए गए हैं। पिछले कुछ वर्षों में कुप्रबंधन से संबंधित कई मुद्दे सामने आए हैं–जैसे कि, वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण में देरी, वक्फ बोर्ड द्वारा बाजार मूल्य से कम किराया लेना, वक्फ भूमि पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण, विधवाओं को उत्तराधिकार के अधिकारों से वंचित करना, सर्वेक्षण आयुक्तों द्वारा सर्वे पूरा न करना, वक्फ संपत्ति रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण की धीमी प्रगति आदि। 


प्रस्तावित सुधारों में राज्य वक्फ बोर्डों और केंद्रीय वक्फ परिषद को अधिक विविध और समावेशी बनाने के लिए मुस्लिम महिलाओं और पासमंदा मुसलमानों जैसे कम प्रतिनिधित्व वाले और वंचित उप-समूहों को प्रतिनिधित्व देने का भी प्रस्ताव है। ऐसे उपायों से न केवल संस्थाओं के भीतर सामाजिक विविधता और लैंगिक संतुलन को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि यह भाजपा के साथ मुसलमानों  के राजनीतिक संपर्क को भी नया आकार देगा।


वक्फ प्रशासन में तकनीकी विशेषज्ञता लाने वाले गैर-मुस्लिम सदस्यों को रखने का प्रस्ताव समुदाय में चिंता का कारण नहीं होना चाहिए, बशर्ते कि ऐसे प्रतिनिधित्व से प्रशासन में समुदाय की प्रधानता खत्म न हो। वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक प्रक्रिया को लागू करने से वक्फ संस्थाओं को राष्ट्रीय संसाधन में बदलने की क्षमता है। कुछ देशों में वक्फ प्रशासन के लिए एक राज्य विनियमित कानूनी ढांचा है, तो कुछ इस्लामी राष्ट्रों में वक्फ के संस्थान हैं ही नहीं।
विज्ञापन


यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि संसदीय समिति के भीतर कटु मतभेदों ने रिपोर्ट को संसद में पेश करने की प्रक्रिया को प्रभावित किया। एक संसदीय लोकतंत्र में, विधि निर्माण के काम में कुछ हद तक राजनीति स्वाभाविक है, लेकिन गैर-पक्षपातपूर्ण विचार-विमर्श, आम सहमति बनाने और सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद के मूलभूत मूल्य राष्ट्रीय हित के मुद्दे को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी हैं। इन मूल्यों को वक्फ सुधारों पर भावी संसदीय कार्रवाई के मार्गदर्शन के रूप में काम करना चाहिए।


नोट-लेखक उत्तर प्रदेश विधान परिषद के मनोनीत सदस्य और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व उपकुलपति हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next