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संसद की भूमिका: वक्फ कानून में बदलाव संविधान के अनुरूप, सियासी हल्ले के बजाय बिल पर गंभीर विमर्श जरूरी

विराग गुप्ता
Updated Fri, 31 Jan 2025 05:42 AM IST

सार

जेपीसी में बहुमत से मंजूर वक्फ के संशोधित विधेयक में जो बदलाव प्रस्तावित हैं, उनसे मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति मजबूत ही होगी। लेकिन इसे समझने के लिए धर्म और सियासत के आधार पर हल्ला करने के बजाय बिल के कानूनी बिंदुओं पर गंभीर विमर्श जरूरी है।
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संयुक्त संसदीय समिति - फोटो : अमर उजाला


नेहरू सरकार ने 1954 में, नरसिम्हा राव सरकार ने 1995 में और फिर मनमोहन सिंह सरकार ने 2013 में वक्फ कानून में बड़े बदलाव किए थे। इन बदलावों से वक्फ बोर्ड को मनमानी अधिकार मिलने के साथ सिविल अदालतों का क्षेत्राधिकार खत्म हो गया था। वक्फ की संपत्ति का मदरसा, कब्रिस्तान, मस्जिद, अनाथालय और इस्लामिक धर्मार्थ कार्यों में इस्तेमाल होता है। वक्फ एसेट्स मैनेजमेंट सिस्टम ऑफ इंडिया ऑनलाइन डाटा पोर्टल के नवीनतम डाटा के अनुसार, वक्फ के पास 8.65 लाख संपत्तियों के तहत लगभग 9.4 लाख एकड़ जमीन है। 50 फीसदी वक्फ संपत्तियों के बारे में सही जानकारी उपलब्ध नहीं है और नौ फीसदी संपत्तियों में अवैध निर्माण से जुड़े 32 हजार मामले चल रहे हैं। वक्फ प्रशासन को पारदर्शी और कानून सम्मत बनाने के लिए 1969 में संसद में जोरदार मांग की गई थी।


कई दशक पहले राज्यसभा में बहस के दौरान विपक्ष के नेता और भाजपा सांसद सिकंदर बख्त ने कहा था कि वक्फ संपत्तियां गरीब मुसलमानों की बेवाओं, तलाकशुदा महिलाओं और यतीम बच्चों की अमानत हैं, जिनमें खयानत हो रही है। जायदाद को महफूज रखने और लूटमार से बचाने के लिए पारदर्शिता, ऑडिट और कुशल प्रशासन जरूरी है। 2006 में सच्चर समिति की रिपोर्ट में वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में गैर-मुस्लिमों को शामिल करने, अभिलेखों की देखरेख और ऑडिट की सिफारिश की गई थी। 2008 में राज्यसभा में पेश संसदीय समिति की रिपोर्ट में वक्फ बोर्डों में सीईओ के तौर पर वरिष्ठ अधिकारी की नियुक्ति और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए मुतवल्लियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के प्रावधान की सिफारिश की गई थी। बरेलवी मौलाना के अनुसार, वक्फ बोर्ड के रहनुमाओं ने भू-माफिया से मिलकर करोड़ों रुपये की जमीन बेच दी। इस बिल के आने के बाद भ्रष्टाचार कम होने के साथ मुसलमानों की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति मजबूत होगी।


संसद के कानून से जमींदारी और राजाओं का प्रिवी पर्स खत्म हो गया। पर वक्फ कानून से हासिल मनमाने अधिकारों की आड़ में वक्फ बोर्ड पुरातत्व विभाग के अधीन 120 प्राचीन स्मारकों, मंदिरों और किलों पर दावा ठोक रहे हैं। सनद रहे कि बाबरी मस्जिद मामले में वक्फ बोर्ड पक्षकार था और अब मथुरा व काशी जैसे अनेक स्थानों में चल रही मुकदमेबाजी में वक्फ का दावा है। संविधान की 5वीं और 6वीं अनुसूची के अनुसार अनुसूचित जनजाति के लोगों की भूमि की सुरक्षा का विशेष प्रावधान है, पर उन संपत्तियों पर भी वक्फ बोर्ड के दावे हैं। कर्नाटक में वक्फ बोर्ड अपने अधिकार क्षेत्र से परे जाकर लोगों को मैरिज सर्टिफिकेट देने लगे, जिस पर कर्नाटक हाई कोर्ट ने नवंबर, 2024 में रोक लगा दी।


विवादित संपत्ति के दान और संपत्ति के लिए अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए प्रस्तावित कानून में प्रावधान हैं। उनके अनुसार, कम से कम पांच साल से इस्लाम का पालन करने वाले वैध संपत्ति के मालिक ही वक्फ बना सकते हैं। वेबसाइट पर वक्फ संपत्ति का विवरण घोषित करना अनिवार्य होगा। स्वतंत्र ऑडिट और केंद्रीय पोर्टल के माध्यम से संपत्तियों के अनिवार्य पंजीकरण के प्रावधान से वक्फ के मौखिक दावों पर लगाम के साथ मुकदमेबाजी में कमी आएगी। ये बदलाव संपत्ति पंजीकरण, स्टांप ड्यूटी और लिमिटेशन कानून के भी अनुरूप हैं।


शाहबानो मामले में कट्टरपंथी ताकतों के दबाव की वजह से सुप्रीम कोर्ट के फैसले को राजीव गांधी सरकार ने संसद से बदल दिया था। इतिहास से सबक लेते हुए यह समझने की जरूरत है कि तुष्टीकरण और वोट बैंक की राजनीति से दूसरे समुदायों में कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा मिलता है। दिल्ली और दूसरे राज्यों में वक्फ बोर्ड के माध्यम से इमाम और मौलवियों को वेतन मिलता है। अब उसी तर्ज पर हिंदू पुजारियों के लिए वेतन के साथ सनातन बोर्ड के गठन की मांग हो रही है। ईसाइयों की धार्मिक संपत्तियों के लिए मद्रास हाई कोर्ट ने नियामक बनाने की बात कही है। संविधान में समान नागरिक संहिता का प्रावधान है, पर मुस्लिम समुदाय अभी भी शरिया कानूनों से संचालित है। इसलिए धर्म-निरपेक्षता की आड़ में वक्फ कानून में हो रहे बदलावों का विरोध ठीक नहीं है।


हिंदू धर्म में दलित और पिछड़े वर्ग के कल्याण के लिए आरक्षण का प्रावधान है। नए बिल के अनुसार केंद्रीय वक्फ बोर्ड, राज्य वक्फ बोर्ड और वक्फ न्यायाधिकरणों में महिलाओं और गैर-मुस्लिमों के साथ शिया, दाऊदी बोहरा, अहमदियों, आगरवानी जैसे मुस्लिम संप्रदायों का प्रतिनिधित्व होगा। वक्फ कानूनों में बदलाव से मुस्लिम समाज के पसमांदा और ओबीसी जातियों को वक्फ संपत्तियों के प्रबंधन में बेहतर भूमिका के साथ आमदनी में सही हिस्सेदारी मिलेगी। इस्लामिक देशों में कई दशक पहले फैमिली वक्फ खत्म कर दिया गया था। नए बिल में फैमिली वक्फ में महिलाओं को प्रगतिशील तरीके से अधिकार दिए गए हैं। पुरानी सरकारों ने वक्फ कानून में जो बदलाव किए थे, उनके अनुसार सरकारी या गैर-मुस्लिम की संपत्ति के गलत अधिग्रहण होने पर वक्फ ट्रिब्यूनल के पास ही अपील करनी पड़ती है। नए बिल के अनुसार, कानून बनने पर अदालतों का अधिकार बहाल होगा, जो पूरी तरह से संविधान के प्रावधानों के अनुकूल है। भूमि राज्यों का विषय है, इसलिए वक्फ कानून में बदलाव से पहले सभी राज्यों के साथ पर्याप्त विमर्श होना चाहिए। विपक्षी सांसदों ने अनेक बिंदुओं पर आपत्तियां दर्ज कराई हैं। कानून पारित होने से पहले इन सभी बातों का ध्यान नहीं रखा गया, तो कानून बनने के बाद वक्फ मामला अदालतों में उलझ सकता है।

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