पाकिस्तान के पूर्व विदेश और रक्षा मंत्री इंजीनियर खुर्रम दस्तगीर-खान कहते हैं, 'प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उनकी टीम को अमेरिका का समर्थन बनाए रखने में काफी मशक्कत करनी होगी। प्रधानमंत्री को पाकिस्तानी हितों की रक्षा और प्रसार के लिए गैर-पारंपरिक व बहुआयामी कूटनीति का इस्तेमाल करना होगा, यानी अमेरिका को पाक निर्यात का सबसे बड़ा गंतव्य बनाए रखना होगा और पाकिस्तान के खिलाफ अमेरिकी आर्थिक दांव को रोकना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात मौजूदा कार्यक्रम को जारी रखने के लिए आईएमएफ में आवश्यक समर्थन बनाए रखना होगा।'
व्यक्तिगत रूप से, मुझे लगता है कि ट्रंप पाकिस्तान के लिए बड़ी चुनौती बनने वाले हैं और इसी से जुड़ा सवाल है कि पाकिस्तान के चीन से कैसे संबंध रहते हैं और ट्रंप अफगानिस्तान को कैसे संभालते हैं। ट्रंप ने पदभार संभालने से पहले और बाद में भी चीन से संपर्क साधने की कोशिश की है। उन्होंने चीनी राष्ट्रपति को अपने शपथ ग्रहण समारोह में भी बुलाया था और संकेत दिए हैं कि ट्रंप के नए कार्यकाल में दोनों मुल्कों के बीच तालमेल हो सकता है। लेकिन अभी शुरुआती दिन हैं।
पाकिस्तान के लिए अच्छी बात यह होगी कि अगर चीन और अमेरिका के संबंध काफी हद तक संतुलित हो जाएं, तो चीन से उसके द्विपक्षीय रिश्तों पर कम दबाव पड़ेगा। हमने देखा है कि ट्रंप कूटनीतिक चैनलों को दरकिनार करके विश्व नेताओं से व्यक्तिगत संबंध बनाना चाहते हैं। ट्रंप और इमरान खान की पहली मुलाकात में ही अच्छी दोस्ती हो गई थी। हालांकि 2019 में उन्होंने अपने कार्यालय में इमरान खान से बातचीत के दौरान एक धमाका करते हुए कश्मीर पर इमरान खान को बेवकूफ बना दिया था।
उन्होंने इमरान खान से कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें कश्मीर मसले पर मध्यस्थता करने के लिए कहा है। इस पर खुश होते हुए इमरान खान ने कहा कि अगर वह कश्मीर के लिए कुछ कर सकें, तो लाखों लोग उनके लिए प्रार्थना करेंगे। यह वास्तव में एक कूटनीतिक झांसा था और जब भारत ने ट्रंप की टिप्पणी का खंडन किया, तब ट्रंप चुप हो गए और फिर कभी कश्मीर का जिक्र नहीं किया।
ट्रंप की नई पारी की शुरुआत में पाकिस्तान के सामने एक चुनौती ट्रंप की शरणार्थी नीति भी है, क्योंकि ट्रंप ने बाइडन युग के शरणार्थी कार्यक्रम को निलंबित कर दिया है, जिसका उद्देश्य पाकिस्तान में फंसे हजारों अफगानों को फिर से बसाना है। पाकिस्तान में अस्थायी तौर पर रह रहे 25,000 अफगान अमेरिकी शरणार्थी कार्यक्रम के तहत अमेरिका भेजे जाने के पात्र हैं। यहां तक कि बाइडन प्रशासन भी इससे पीछे हट रहा था और उन्हें वापस लेने की जल्दी में नहीं था। ये 25,000 अफगान वर्षों से पाकिस्तान में रह रहे हैं, जिन्हें काबुल पर कब्जे के बाद वाशिंगटन के अनुरोध पर पाकिस्तान सरकार द्वारा यहां लाया गया था। उन्होंने अफगानिस्तान में नाटो और अमेरिकियों के साथ काम किया था, इसलिए यदि वे तालिबान शासन में अफगानिस्तान लौट गए, तो कभी सुरक्षित नहीं रह पाएंगे।
चूंकि ट्रंप प्रशासन आव्रजन के मामले में सख्त रुख अपना रहा है, इसलिए पाकिस्तान को यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ी कूटनीतिक लड़ाई लड़नी होगी कि ट्रंप अपने पूर्ववर्ती के निर्णय का सम्मान करें।
इसके अलावा, अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली विदेशी सहायता को पुनर्मूल्यांकन के लिए रोक दिया है। यह रोक 90 दिनों की है। वर्तमान में दुनिया की कई राजधानियों की तरह इस्लामाबाद में भी कोई पूर्णकालिक अमेरिकी राजदूत नहीं है और यह भी नहीं पता कि कब किसी को नामित किया जाएगा। इससे स्वास्थ्य क्षेत्र से लेकर कृषि और शिक्षा तक कई परियोजनाएं रुक गई हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे आर्थिक विकास से जुड़ी चार परियोजनाएं भी प्रभावित हुई हैं। यह देखना भी दिलचस्प होगा कि पाकिस्तान और अमेरिका के सैन्य संबंध किस तरह से आगे बढ़ेंगे, क्योंकि अमेरिका के अफगानिस्तान से चले जाने के बाद से ही उसकी इस क्षेत्र में कोई खास दिलचस्पी नहीं रही है। अफगान युद्ध के दौरान दोनों देशों के सैन्य संबंध मजबूत हुए थे। लेकिन अब पाकिस्तान को कोई सैन्य सहायता नहीं मिल रही है। लगता है कि शुरुआत में ट्रंप का सैन्य नेतृत्व सतर्क रुख अपनाएगा, क्योंकि बहुत कुछ इस पर निर्भर करता है कि राजनीतिक संबंध कैसे उभरते हैं।