त्योहारी सीजन में अखबार के तमाम पन्नों पर अपनी आलोचना पढ़कर सातवें सिलेंडर का कलेजा मुंह को आ रहा था। रुआंसा होकर उसने मां महंगाई से पूछा, हे माते! यह दुनिया क्यों मेरी जान की दुश्मन बन गई है। मैंने तो सुना है अंक सात बड़ा शुभ होता है। सात दिन, सात समंदर, सात रंग, सात फेरे, सात अजूबे, सूरज का सातवां घोड़ा इत्यादि-इत्यादि। मां मुसकराते हुए बोली, धैर्य रखो पुत्र, समय सबसे बड़ा मरहम होता है। वक्त बीतने पर दाग भी अच्छे हो जाते हैं। तुमने सुना नहीं, सात खून माफ भी तो हो जाता है।
लेकिन मां, तुम यह बात इतने विश्वास के साथ कैसे कह सकती हो, सातवें सिलेंडर ने हर्षित होकर पूछा। मां महंगाई ने चेहरे पर फुल कॉन्फिडेंस झलकाते हुए कहा, तुमने उस दिन सुना नहीं पुत्र मंत्री जी क्या कह रहे थे। भारतवर्ष के लोगों को भूलने की आदत है। यहां काले से काले दाग धुल जाते हैं। दो बार धो लो, हाथ निर्मल। सातवें सिलेंडर का भरोसा थोड़ा बढ़ा, लेकिन मां, जालिम जमाना मुझे हिकारत भरी नजरों से देख रहा है। अखबार वाले कह रहे हैं कि ब्लैक मार्केटिंग के लिए मैं ही दोषी हूं।
माताएं-बहनें कह रही हैं कि इसी नासपीटे (सातवें सिलेंडर) की वजह से नवरात्र के मेलों में खोमचे वालों के तमाम आइटम महंगे हो गए। सरेआम चौराहों पर मेरा तमाशा बनाया जा रहा है। जिस तरह गृहिणियां 'सातवें सिलेंडर' की चर्चा करते हुए दहशत में हैं, मैं अपनी ही नजरों में गिरा हुआ महसूस कर रहा हूं। सातवां सिलेंडर क्या हुआ, शोले का गब्बर हो गया।
मां महंगाई ने ढाढस देते हुए कहा, ऐसा मत सोचो मेरे लाल, मेरे अनुभव पर यकीन करो, देख लेना एक दिन तुम्हारा सारा अपयश रावण के घमंड की तरह भस्म हो जाएगा। भारतवर्ष का महान मध्यवर्ग बेहद सहिष्णु है। वह पीड़ा को पीकर खुश रहना जानता है। कटौती की कला में माहिर होता है।
यह तुम क्या कह रही हो मां, सातवें सिलेंडर के चेहरे पर चमक आ गई। महंगाई बोली, हां मेरे लाल, भुलक्कड़ भारत का यही सत्य है। जिस तरह से लोगों को मेरी आदत-सी पड़ गई है, वे तुम्हें भी स्वीकार कर लेंगे। सातवां सिलेंडर खुशी के मारे लुढ़कते हुए मां महंगाई के चरणों में आ गया, ओह थैंक्स मां। मां महंगाई ने पलक झपकाते हुए कहा- ‘से थैंक्स टू ऑल भुलक्कड़ भारतीय माई सन, हैप्पी दशहरा।