भद्रता, शब्द संयम और शालीनता राम का गुण है-पराक्रमी विजेताओं का प्रतीक, न कि हारे हुओं की कायरता। सागर और झरने में यही फर्क होता है। लेकिन भारत का वर्तमान सार्वजनिक-संवाद प्रत्यक्ष हिंसा और शब्द हिंसा से भर गया है। हिंसा केवल शस्त्र से नहीं होती। अपशब्द भी हिंसा की श्रेणी में आते हैं।
केरल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के ग्यारह कार्यकर्ता गत नौ माह में केवल वैचारिक मतभिन्नता के कारण बर्बरतापूर्वक माकपा कार्यकर्ताओं द्वारा मार डाले गए-न दिल्ली हिली, न संवेदनशील मीडिया का दिल हिला। इतना वैचारिक विद्वेष कि मृत्यु पर भी दिल न हिले? और यह उस देश में, जहां कम्युनिस्ट पार्टी की अनेक शाखाओं द्वारा भयानक हिंसा किए जाने के बावजूद दीनदयाल उपाध्याय या वाजपेयी ने कभी उन पर गाली-गलौज का प्रहार नहीं किया।
गुजरात के पूरे लोगों को गधा बताने वाले गुजरात का अपमान कर रहे थे या मोदी पर हमला बोल रहे थे? नहीं, वह समूचे देश का अपमान कर रहे थे। आज जब मैं इन पंक्तियों को लिख रहा हूं, तो मद्रास विश्वविद्यालय के मैनेजमेंट छात्रों के सामने मेरा आर्थिक सशक्तीकरण पर तिरुक्कुल व तिरुवल्लुर के संदेश के प्रकाश में व्याख्यान था। मार्क्सवादियों ने इसका विरोध किया। सात दशक तक कांग्रेस के साए में वे एकाधिकार किए रहे। अपने प्रभाव की हर न्यूज डेस्क और बौद्धिक संस्थानों में वे वैचारिक द्वारपाल बने रहे। जनता द्वारा अस्वीकृत और विश्व द्वारा तिरस्कृत होने के बावजूद उन्हें अपने से भिन्न मत उस देश में स्वीकार नहीं, जहां की माटी ने सदा मतभिन्नता को सम्मान दिया। यह असहिष्णुता वास्तव में वैचारिक हिंसा है और विचारधारा शून्य दल ही इसका उपयोग कर सकते हैं। गाली-गलौज कभी जनसमर्थन नहीं बढ़ाती, बल्कि अपना अहंकार और दुर्बलता ही वह प्रकट करती है। जो जितना कमजोर और विचारशून्य होता है, वह उतना ही गालियों का सहारा लेता है। तर्क न सही तो न सही, गाली से तो सुर्खियां बटोर लूं-बस यही हारे हुए का आखिरी तीर होता है।
वास्तव में देखा जाए, तो इस देश की राजनीति पारिवारिक जमींदारियों के तहत माफिया समूहों की दंगल बन चुकी है। शशिकला हों या भगवंत सिंह मान का अजीब व्यवहार या पंजाब और उत्तर प्रदेश के कुबेरपति राजनेता-धनवान देश के फटेहाल मतदाताओं के बीच जब ये ऐश्वर्यशाली राजनेता अपशब्द बिखेरते हैं, तो लगता है विदेशी हमलावरों से ज्यादा तो इन स्वदेशी लुटेरों ने देश को कंगाल किया है। इस देश को धन और मन-दोनों से दरिद्र बनाने वाले अब अरब, तुर्क, मंगोल, बर्बर हूण, अंग्रेज या मुगल नहीं आते। हम खुद ही खुद को लूटने में लज्जित नहीं होते।
पचास के दशक से वर्तमान युग तक के चुनावी वायदे तनिक भी नहीं बदले, तो इसकी एकमात्र वजह राजनेताओं का ऐश्वर्यप्रिय स्वभाव और अहंकार ही है, जो उन्हें एक-दूसरे भारतीय को तिरस्कार एवं शत्रुता के भाव से देखने का स्वभाव पैदा करता है। इसी अहंकार का दृश्य हर राजनेता के घर और पार्टी दफ्तर में मिलता है, जहां घनघोर घमंड से तौलिया बिछी कुर्सी पर बैठे निर्णय-कर्ता नेता कार्यकर्ताओं के नमस्ते का जवाब तक नहीं देते, सिर्फ नजर भर उठाकर देख लिया, तो यही पर्याप्त होता है। वे लोग संवेदना और एक दूसरे भारतीय के प्रति सम्मान का भाव कहां से पैदा करेंगे? कौन जात है तुम्हारी? कितना पैसा है? कितना खर्च करने का दम है? सिर्फ इस पर निर्भर करता हो यदि राजनीतिक जीवन तथा चुनावी जीत या हार और इसे ही अपने राजनीतिक जीवन के प्राण या मृत्यु मान ली जाए, तो स्वदेशी वैचारिक विपक्षी सीमा पार के शत्रु से भी ज्यादा खतरनाक और घृणित बन जाता है।
तमिलनाडु का राजनीतिक तमाशा भारत के किसी अन्य प्रदेश से कितना भिन्न है? धन, धनलिप्सा, धन का विद्रूप प्रदर्शन, बाहुबल और संख्याबल का जुगुप्साजनक भौंडापन। यही लोग राज करते हैं, अफसरों के लिए नीतियां बनाते हैं, महिलाओं-दलितों को सुरक्षा का भरोसा देते हैं और गरीबों की दुर्दशा सुधारने का वचन देते हैं। यही लोग जनता के धन को जनता के हित में खर्च करने का कार्यक्रम बनाते हैं, अपने इश्तहार जनता के धन से छापते हैं और इनके बंगले कई-कई एकड़ों में फैलते जाते हैं, क्योंकि इनके जनहित के सरोकार भी बड़े होते हैं।
वस्तुतः अपशब्द या गंदे गाली-गलौज वाले व्यवहार का जनक रावण-मानस है। वह विद्वान था, शिव भक्त था, श्रेष्ठ ऋषि वंश से जुड़ा था। लेकिन धन और सत्ता ने उसे अहंकारी बना दिया और अंततः उस राम के हाथों मारा गया, जिनका मुख्य परिचय ही भद्रता था।
भारत में अभद्रता और हिंसा की राजनीति कम्युनिस्टों की देन है। मेरे अलावा बाकी सब कुछ असत्य, ध्वंसयोग्य, मृत्युदंड का पात्र है-यही वह मानसिकता है, जिसने सोवियत संघ, पूर्वी यूरोप को बनाया और बर्लिन की दीवार खड़ी की।
अपशब्द जुबान पर लाने वाला शब्द-हिंसा करने को तत्पर फिदायीन ही होता है, जो अपनी छवि की मृत्यु पर चिंतित नहीं होता। यह नितांत अभारतीय स्वभाव है-जहां आदि शंकर से हारने पर भी मंडन मिश्र ने उन्हें गालियां नहीं दी थीं। हार जीवन का अंत नहीं, और मतभिन्नता शत्रुता का पर्याय नहीं, यह लोहिया और दीनदयाल की युति ने समझाया था। वह बात अब सिर्फ किताबों के लिए ही रख दी गई है। उस युग का लोप भारतीयता का भारत से निर्वासन जैसा होगा।
कुछ लोग ऐसे चाहिए, जो पार्टी की विभिन्नताओं को दीनदयाल उपाध्याय की सरलता से जी सकें और उन पुलों को बना सकें, जो घनघोर विरोध और मतभेद के बावजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनेक शीर्ष अधिकारियों ने बनाए थे। आखिरकार यह कल ही की बात है, जब चंद्रशेखर, वाजपेयी, नरसिंह राव जैसे घोर वैचारिक विरोधी भी मित्रता के संबंध रख सकते थे। वह आज भी असंभव नहीं। देश का मान हमारी जय-पराजय से ज्यादा बड़ा और मूल्यवान है। धन बचे न बचे, मन तो बचाइए।