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चुनाव में किसानों के मुद्दे कहां

Tue, 21 Feb 2017 07:39 PM IST
सुभाष चंद्र कुशवाहा
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खेती-किसानी पर आसन्न खतरे और किसान आत्महत्याओं के बीच उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। खाद-पानी की समस्या का हल क्या होगा? प्रतिबंधित कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से विषैले होते खद्यान्न को कैस बचाया जाए, इस पर बात नहीं होती। बीजों और कीटनाशकों के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भरता ने किसानों को कितना मजबूर किया है, इस पर बात क्यों नहीं होती? सच्चाई यह है कि लगभग सभी दलों के पास खेती के वर्तमान स्वरूप और उसमें पनपी विकृतियों के आकलन की न तो क्षमता है, न चिंता। अब पहले की तरह किसान प्रत्याशी भी दिखाई नहीं देते। खर्चीला चुनाव किसानों के वश में नहीं रहा।
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कई राज्यों में विगत वर्ष के बकाया गन्ना मूल्य का भुगतान नहीं हो पाया है। विगत कई वर्षों से कम वर्षा, आंधी और ओलावृष्टि से फसलें बर्बाद हुई हैं। देश की कुल 10 करोड़ 80 लाख हेक्टेयर खेतीयोग्य जमीन के बावजूद, खाद, पानी, उन्नतशील बीज और बाजार के अभाव में किसान खेती छोड़ना चाहता है। साथ ही असमान वितरण प्रणाली, भंडारण की कारगर नीति का अभाव आबादी का पेट नहीं भर पा रही है। अब भी प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता 460 ग्राम के आसपास है। यह उपलब्धता 1987-88 में 471.8 ग्राम थी। किसान विरोधी नीतियों के चलते और कृषि जमीनों के अधिग्रहण के कारण बीते चार दशकों में खेती के रकबे में 18.5 प्रतिशत की कमी आ चुकी है। खेती-किसानी पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबाव है। वे आयात बढ़ाने के लिए कृषि को प्रभावित कर रही हैं।

किसानों की बुनियानी समस्याओं से दूरी और लोक लुभावन नीतियों के अनुसार मात्र कर्ज बांटने का काम उन्हें आत्महत्या तक ले जा चुका है। ‘किसान क्रेडिट कार्ड’ का फायदा बड़े किसानों ने उठाया है। राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना अभी किसानों को कोई राहत नहीं दे पाई है। तमाम बिचैलिये मलाई काट रहे हैं। हर गांव में ‘किसान-मित्र’ की तैनाती भी फिजूलखर्ची वाली निरर्थक योजना है। जिस प्रकार अयोग्य और अप्रशिक्षित लोगों की नियुक्ति की गई है, उससे किसानों का भला नहीं होने वाला।
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कृषि यंत्रीकरण मिशन केवल बड़े किसानों का हित साधक बने हुए हैं। करोड़ों खर्च भी हो रहे हैं, पर किसानों को खाद, पानी और बीज सुलभ नहीं हो पा रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में भंडारण की समुचित व्यवस्था के अभाव में फसलें या तो औने-पौने दामों पर बेच दी जाती हैं या किसानों के यहां सड़ती हैं। एफसीआई सीधे किसानों से अनाज खरीदने के बजाय बिचैलियों पर निर्भर हैं। नतीजतन फायदा बिचैलिए उठाते हैं, किसान को न्यूनतम मूल्य नहीं मिल पाता।

एक ओर गन्ने का उत्पादन बढ़ाने की बात की जा रही है, तो दूसरी ओर देश की तमाम सहकारी चीनी मिलें बंद पड़ी हैं। गन्ना किसानों को गन्ना मूल्य का समय पर भुगतान न होना पुरानी बीमारी है। ऐसे में एक सुदृढ़ कृषि नीति की आवश्यकता है, जो किसानों के हितों की रक्षा करे। सिंचाई के साधनों के रूप में अस्सी के दशक में जो नहरें खोदी गईं, उनमें गाद भर चुका है। ये नहरें अब उपयोगी नहीं रहीं।

ऐसे में खेती-किसानी का चुनावी मुद्दा न बनना गंभीर चिंता का विषय है। विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के पास खैरातबांटू योजनाओं की चर्चा के अलावा, खेती-किसानी को मजबूत करने की कोई नीति नहीं है। किसान आत्महत्या करने या पलायन करने को मजबूर हैं। वे एक किलो दाल या घी से गरीबी से मुक्त नहीं होने वाले।
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