हमारे जमाने का मतदाता होता था, भोला-भाला, एकदम गऊ माफिक। परिवार के मुखिया ने जिसे जुबान दे दी, उसे वोट पड़ गया। जीजा ने साली को इशारा भर कर दिया, सारी ससुराल का एकमुश्त वोट पड़ गया। गांव के मुखिया को सेट कर दिया, पूरे गांव का वोट पड़ गया।
कभी-कभी तो मुखिया जी कई-कई पार्टियों से पट जाते थे, लेकिन मजाल है कि बाएं हाथ को दाएं हाथ की हवा भी लग जाए। तब का वोटर प्रत्याशी के अवगुण नहीं गिनता था। नेता खाऊ है, तो क्या? है तो अपना बिरादरी का, भाई। हमारे काम को आधी रात तैयार। दामाद जी के रिश्वत वाले केस में वही तो बचाए रहेन। सूबे के अगले तीस साल के पशु चारे को हजम कर गए लालू भैया। जैसे समोसे में सदा रहता है आलू, वैसे ही बिहार में बार-बार चुने जाते थे लालू। पहले बिजली, पानी, सड़कें, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार जैसे तुच्छ मुद्दे नहीं थे। बड़े-बड़े मुद्दे थे कि इस इलाके में दलित जीतेगा या सवर्ण, अगड़ा या पिछड़ा। अब मतदाता सयाने हो गए हैं। तीन दिन बिजली नहीं आई, तो सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ बटन दब जाता है।
इस चुनाव में वोटर तो एकदम पगला गया। सारी पुरानी रिवायतें मिट्टी में मिला दी। मोदी जी ने घूम-घूमकर सारे देश को चाय पिला दी। राहुल बाबा से लाख कहा कि तुम भी घूम-घूमकर अपनी चाय पिला दो। पर वह मुकर गए। वैसे ही जैसे झाड़ू वाले केजरीवाल ने दिल्ली साफ करने की भरी हुंकार। फिर उनचास दिन में ही यह कहकर भाग खड़े हुए कि सारी देश की सफाई का टेंडर मिला है। सो, खाली दिल्ली की सफाई क्यों करूं? वह बनारस में मोदी को रोकने के लिए पूरी तैयारी के साथ गए। पर वहां से खाली हाथ लौटे।
वैसे भी अब मोदी जी आ गए हैं। इसलिए ऐसी-वैसी राजनीति नहीं, सिर्फ विकास की राजनीति चलेगी। चाहे राहुल गांधी हों या अरविंद केजरीवाल, उनके पास विकास के लिए कुछ ठोस हों, तो मैदान में उतरें। नहीं तो अपने घर बैठें।