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स्मृति शेष: शास्त्रीय संगीत में साधारणता की आवाज.... छन्नूलाल मिश्र पर काशीपुराधिपति महादेव का असीम आशीष

व्योमेश शुक्ल (कवि, आलोचक और अनुवादक) Published by: ज्योति भास्कर Updated Fri, 03 Oct 2025 04:37 AM IST

सार

जब दाल खत्म हो जाती थी, तो रोटी, नमक और इमली की चटनी खाकर रियाज करने में गला बैठ जाता था। पर सोच यही रही कि खाना नहीं मिलेगा, तो गाएंगे क्या? 
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पंडित छन्नूलाल मिश्र (फाइल) - फोटो : एएनआई


पंडित जी कहा करते थे : ‘अब कोई ख्वाहिश नहीं। इलाही कोई तमन्ना नहीं जमाने में, हमने सारी उमर गुजारी है अपने गाने में।’ आजमगढ़ जिले के हरिहरपुर गांव में तीन अगस्त की भोर में उनका जन्म हुआ। पंडित जी- तीन भाई और एक बहन। गीत में छन्नूलाल जी, वाद्य में भाई विश्वनाथ और नृत्य में सबसे छोटे शिव जी—बिरजू महाराज के शिष्य। उनका घर सात पीढ़ियों से संगीतकारों का घर है। सबसे पहले वागीश्वरी महाराज। फिर पिंगल महाराज। उनके भतीजे पंडित जगदीप महाराज—जो बनारस में ठुमरी लाए। उनके लड़के—पंडित छन्नूलाल के दादा शीतल प्रसाद उर्फ ढोलई। ढोलई के लड़के—छन्नू जी के पिताजी—बद्री महाराज। उनके लड़के पंडित जी और उनके पुत्र रामकुमार मिश्र—यशस्वी तबलावादक। रामकुमार का बेटा भी बहुत अच्छा तबला बजा रहा है। पंडितजी की बेटियां भी गाती रही हैं। पिता जी मुजफ्फरपुर से कमाकर महीने में दस रुपये भेजते थे, जिसमें बारह लोग पंद्रह दिन खाते थे। सस्ती का दौर था। रुपये में बारह किलो चावल। पैसा खत्म हो जाए, तो दाल कहां से आए? तब पेड़ पर ढेले मारकर इमली तोड़ लाते थे। रोटी, नमक और इमली की चटनी खाकर रियाज करते थे। मन में सोचते थे : ‘छोड़ेंगे नहीं रियाज’।


शुरू के पांच साल पिता जी ने रियाज कराया। दस रुपये का एक हारमोनियम उन्होंने खरीदकर दिया था। भोर में पांच बजे रियाज शुरू हो जाता था। जरा-सी भी झपकी आई कि पिताजी की एक चपत। कहते थे, ‘सो रहे हो, तो नाम कैसे होगा?’ पिता जी बहुत अच्छा तबला बजाते थे और गाना भी गाते थे। माता जी ने ही सुंदरकांड का पाठ करना सिखाया। पंडित जी कहा करते थे : ‘हनुमान जी बड़े कृपालु हैं-‘ज्ञानिनामग्रगण्यम’-ज्ञानियों में सबसे आगे। और तो और, संगीत में भी उनका एक मत है–हनुमान मत। शिव मत, नारद मत, भरत मत और हनुमान मत—ये चार मत हैं।’ तो, बचपन में चटनी खाकर रियाज करने में गला बैठ जाता था। एक बात यह भी रही होगी कि खाना नहीं मिलेगा, तो गाएंगे क्या? लेकिन गाते रहना था। पिता-गुरु का आशीर्वाद साथ में था। पंडित जी के पास लय का भयंकर अभ्यास था। एक ही ख्याल को तीन अलग-अलग तालों में गाना होता था। विलंबित एक ताल यानी बारह मात्रा, झूमरा यानी चौदह मात्रा और तिलवाड़ा यानी सोलह मात्रा में। अलग-अलग लयों का अंदाज जरूरी था। ये पूरावक्ती काम भला माता-पिता के और कौन करता-करवाता! सच में उन पर काशीपुराधिपति महादेव, गंगा जी, संकटमोचन महाराज और गोस्वामी तुलसीदास का असीम आशीष था। 

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