ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुस्ती छाई हुई है। ग्रामीणों के पास खर्च करने के लिए पैसा नहीं है। पैसा नहीं है, तो बाजार में पैसा नहीं पहुंच रहा। पैसा नहीं पहुंच रहा, तो नए काम में निवेश नहीं हो रहा। इसका इलाज यह सोचा गया है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त पैसा भेजा जाए, ताकि ग्रामीणों की क्रय शक्ति बढ़े। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने वित्त मंत्रालय से मनरेगा के तहत 20,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त मांगे हैं। हालांकि मौजूदा वित्त वर्ष में मनरेगा के तहत 60,000 करोड़ रुपये का आवंटन है, जबकि संपूर्ण ग्रामीण विकास मंत्रालय का आवंटन 1.20 लाख करोड़ रुपये है। अन्य मंत्रालयों के कार्यक्रमों के माध्यम से भी ग्रामीण क्षेत्रों में पैसा जा रहा है।
क्या 20,000 करोड़ अतिरिक्त पैसा पटरी से उतरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला देगा। ऐसा लगता नहीं है, क्योंकि जहां पर बीमारी है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उसको नहीं छेड़ा जा रहा। वह है पंचायती राज। देश में 2,53,268 ग्राम पंचायतें, 6,614 पंचायत समितियां तथा 630 जिला परिषदें हैं। इनमें लगभग 31 लाख चुने हुए प्रतिनिधि हैं, जिनमें 13.75 लाख महिलाएं हैं। पंचायती राज प्रधान या सरपंच केंद्रित है। जबकि इसे वार्ड या पंच स्तर पर विकेंद्रीकृत करने की जरूरत है। इससे एक तो वार्ड सदस्य अपने वार्ड के विकास तथा सभी सदस्यों को लाभ देने के लिए प्रयासरत् होगा। दूसरे, पैसों का बंटवारा अधिक लोगों के हाथों में होगा, जिससे शासन सशक्त होगा। अब तक का अनुभव बताता है कि अगर एक ग्राम पंचायत में अनेक गांव आते हैं, तो अधिक पैसा वहीं खर्च होता है, जिस गांव का प्रधान या सरपंच होता है।
वार्ड स्तर पर विकेंद्रीकरण पंचायतों को वित्तीय दृष्टि से सशक्त करने में भी सहायक होगा। अगर ग्राम पचायतें वित्तीय संसाधन नहीं जुटाएंगीं, तो उनको केंद्र या राज्य स्तर से पैसा कब तक मिलता रहेगा, जबकि उनकी खुद की अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है? आंकड़े बताते हैं कि देश के सिर्फ बारह राज्यों में ही प्रति व्यक्ति कर प्राप्ति के प्रयास किए गए। यही स्थिति गैर-कर से प्राप्त संसाधनों की भी है। अगर पंचायतों का विकेंद्रीकरण होगा, तो ये जो 28 लाख के करीब चुने हुए वार्ड सदस्य हैं, वे अपनी ऊर्जा वार्ड स्तर पर लगाएंगे तथा गैर कर संसाधन जुटाने का प्रयास करेंगे। जिन सेंसस टाउन या जनगणना शहरों की संख्या 2001 में 1,362 थी, 2011 में उनकी संख्या बढ़कर 3,894 हो गई है। ये वे शहर हैं, जो परिभाषा के अनुसार शहर हैं, पर तकनीकी दृष्टि से ग्राम पंचायतें हैं।
ऐसी ग्राम पंचायतें सारा लाभ ग्रामीण विकास की योजनाओं का ले रही हैं, पर कर या गैर कर के रूप में कोई योगदान नहीं कर रहीं। ऐसी ग्राम पंचायतों को या तो शहर में परिवर्तित कर देना चाहिए या उनसे कर व गैर-कर संसाधन इकट्ठा करना चाहिए। इन पैसों से ग्राम पंचायतों को संरचनात्मक एवं रोजगारोन्मुखी गतिविधियां शुरू करनी चाहिए, ताकि बेरोजगारों को स्थानीय स्तर पर ही आमदनी का जरिया मिले। इसका एक उदाहरण उत्तर प्रदेश में पंचायत उद्योग है। संविधान पंचायतों को स्थानीय सरकार का दर्जा देता है। अतः केंद्र एवं राज्य सरकारों को पंचायतों को सरकार ही समझना चाहिए। तभी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए स्थायी आधार मिलेगा। गांवों में पैसे की नहीं, परिवर्तन की जरूरत है।
(लेखक भारतीय आर्थिक सेवा के पूर्व अधिकारी हैं)