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गांव को भी चाहिए प्रौद्योगिकी

अनिल प्रकाश जोशी Updated Thu, 10 May 2018 07:07 PM IST
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अनिल प्रकाश जोशी
आज के ही दिन 11 मई, 1998 को भारत ने पोकरण में दूसरी बार परमाणु शक्ति का सफल परीक्षण किया था। इस दिन को ऐतिहासिक मानते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे तकनीकी दिवस घोषित किया था। इसी दौरान देश का पहला एयरक्राफ्ट हंस-3 भी देश की तकनीकी सफलताओं का हिस्सा बना। एक के बाद एक तकनीकी सफलता को लेकर अपने देश ने भी दुनिया को अपनी तकनीक का लोहा मनवाया।


मेक इन इंडिया के साथ ही आज बुलेट ट्रेन पर बात हो रही है। इसके साथ ही अनेक विडंबनाएं भी हैं। हमने अंतरिक्ष से लेकर परमाणु शक्ति से जुड़ी उपलब्धियां भले हासिल कर ली हैं, लेकिन हम आज भी देश के गांवों को अपने तकनीकी मिशन का हिस्सा नहीं बना पाए हैं। देश के 90 प्रतिशत गांव नई तकनीक व विज्ञान के लाभों से वंचित है।

हम इस बात का कतई दम नहीं भर सकते कि देश में विज्ञान-तकनीक समानता है। एक तरफ शहर और कस्बे नई खोजों और विज्ञान का लाभ उठा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ गांव कई तरह की सुविधाओं से तो वंचित हैं ही, कई तरह के संकट में भी हैं। 


इस देश में अब भी गांवों के लोग खाना पकाने के लिए चूल्हों पर निर्भर हैं, लेकिन इन चूल्हों का आधार जलाऊ लकड़ी लगभग गायब ही हो चुकी है। गांवों में लकड़ी या गोबर के उपले ही सबसे बड़ा ईधन हैं। इनमें विज्ञान कोई बड़ा चमत्कार नहीं कर पाया। यह देश के गांवों की महिलाओं का एक स्थायी बोझ है, जिसे वे रोज ढोती हैं। 


खेती जो गांवों का मूल स्वभाव है, आज उस तरह से नहीं लहलहा रही है, जिसके लिए इस देश को कृषि प्रधान कहा गया था। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 105 संस्थानों और करीब 70 से ज्यादा कृषि विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिक इस देश की खेती व गांवों का कुछ बड़ा भला कर पाए, ऐसा नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि आज भी किसानों की आत्महत्या के सवाल जस के तस खड़े हैं। और अगर कहीं किसी को कोई लाभ मिला भी होगा, तो वे गांव के सीमांत किसान नहीं हैं, जिनके हालात आज और भी गंभीर हैं। खेती की बढ़ती लागत जहां एक तरफ किसानों को मिटाने को तुली है, वहीं बीज, रासायनिक खाद व जल पंपों के व्यवसाय ने जमकर लाभ उठाया है।  


आर्थिक असमानता के पीछे गांवों के उत्पादों में विज्ञान का अभाव ही है। वर्ना यह कैसे संभव था कि देश के उत्पादक गांव गरीबी की रेखा नहीं पार कर पाते और दूसरी ओर शहरी आर्थिकी ही देश की रीढ़ बन जाती है। भारतीय विज्ञान कांग्रेस में अक्सर पहले और अब के प्रधानमंत्री ने बार-बार कहा है कि विज्ञान को ग्रामोन्मुखी होना चाहिए। देश में विज्ञान की दिशा काफी हद तक भटकी-सी है। शोधपत्रों, वैज्ञानिक बैठकों व सम्मेलनों तक ही ज्यादा विज्ञान दिखाई देता है। इनकी सारगर्भिता पर अब बहस कौन कर सकता है, जिन्हें करना था वे खुद इसका हिस्सा है।


इस देश में हजारों सरकारी, गैर सरकारी, विज्ञान संस्थान हैं। अकेले सरकार के ही अपने 1,000 से अधिक शोध संस्थान होंगे, जिन पर देश की तकनीक का दायित्व है, पर ज्यादातर ये संस्थान शोधपत्रों तक ही सीमित हैं। इनसे अगर ग्रामोन्मुखी कुछ खोज निकली भी होगी, तो उनको दिन का सूरज दिखना मुश्किल हो जाता है। सबसे बड़ी बहस इसी पर होनी चाहिए कि हमारे विज्ञान व तकनीक की दिशा कितनी उचित है, खासतौर से तब जब बहुत से गांव आज भी कई सुविधाओं और संसाधनों से अछूते हैं।
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