अरे भैया, हम तो पागल हो गए सोचते-सोचते कि कौन सा गांव गोद लें? दिल्ली वाले बार-बार कुछ और पूछने के बदले बस यही पूछे जा रहे हैं कि कोई गांव गोद लिया या नहीं... जल्दी सूचना भेजो। गोद लेने को किसी हसीना को कहते, तो अब तक पचासों ले चुके होते। लगता है, हमारी अक्ल तो घास चरने जा चुकी है। अब तुम ही कोई नाम सूझा दो...
भैया जी! इसमें परेशान होने की कौनो बात है? जब आपकी अक्ल घास चरने चली ही गई, तो समझो आधा गांव तो आपने गोद ले लिया। बचा आधा गांव, वह भी हो जाएगा। आप कहिए तो सही, आप किस किस्म का गांव गोद लेने के इच्छुक हैं। मेरी जेब में एक से एक गांव भरे पड़े हैं। बस, आप जरा इशारा कर दीजिए कि कैसा गांव चाहिए आपको?
कुछ देर सोचने के बाद वह बोले, जिसमें केवल और केवल अपने ही वोटर हों। हम विरोधी के गांव को गोद लेकर अपने पांव पर कुल्हाड़ी नहीं मारना चाहते।
और...
जिसमें गोबर करने वाली गाएं-भैंसें, भेड़-बकरियां न हों। कुत्ते-शुत्ते न हों। गोबर-शोबर से हमें अपने विरोधी से भी अधिक नफरत है।
अरे भैया जी, यहां तो अब आदमी तक गोबर करने लग गए हैं। ऐसे में गाय-भैसों को गोबर करने से कैसे रोकिएगा? अगर आपने गाय-भैंसों को गोबर करने से रोक दिया न, तो पता नहीं कितने साधु-संतों का गोबर-मूत्र बेचने का धंधा बंद हो जाएगा। खैर और...
वहां सारे पढ़े-लिखे लोग हों! गंवारों के बीच मैं एक पल भी नहीं रह सकता। मेरा कोई भी पुरखा इनके बीच आज तक नहीं गया। और वहां की सड़कें चकाचक हों, क्योंकि धूल से हमें एलर्जी हो जाती है न!
और...
वहां के नलों में वाटर नहीं, मिनरल वाटर आता हो। क्या फायदा, जो वहां का पानी एक बार पीकर ही साल भर पेट पकड़े रहे। और... और... और...