इस बीत रहे वर्ष 2018 को राष्ट्रीय जीवन का एक महत्वपूर्ण समय मानना चाहिए। राजनीति, सामाजिक चेतना, और उथल-पुथल के बीच वर्ष की शुरुआत में भीमा कोरोगांव की घटना हुई, जहां इतिहास के स्थानीय पन्ने और विगत लड़ाइयों को राष्ट्रीय पटल पर अचानक ही मढ़ दिया गया। यह सब कुछ अगर कम था, तो इसी उथल-पुथल के बीच गौरी लंकेश, दाभोलकर और गोविंद पनसारे की हत्या की चर्चा भी बरकरार रही, क्योंकि इस वर्ष भी पूर्ण रूप से यह पता नहीं चल सका कि किसने इन चिंतकों, लेखकों को मारा और इस घटनाक्रम के षड्यंत्रकारी आयोजक कौन थे। इस वर्ष कई अन्य मुद्दे भी सामने आए और महत्वपूर्ण राज्यों के चुनाव भी हुए, जिनमें प्रमुख थे कर्नाटक, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान।
यदि हम 2018 के प्रतिनिधि मुद्दों की चर्चा करें, तो यह समझ में आता है कि यह वर्ष कितना महत्वपूर्ण रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह रही कि विकासवाद के जिन मामलों की चर्चा करते हुए कई राज्यों में कद्दावर मुख्यमंत्री लंबे समय से गद्दीनशीन रहे, वहां नए मुद्दों के उभरने के चलते मंडल-कमंडल का सम्मिश्रण भी फेल साबित हुआ। कर्नाटक में सिद्धारमैय्या ने कई कल्याणकारी योजनाओं के जरिये यह आशा जगाई थी कि वह फिर से चुने जाएंगे। कई लोगों ने तो उनकी तुलना देवराज उर्स से भी कर डाली, जिन्होंने गरीबी हटाओ का नारा दिया था और कांग्रेस की नींव कर्नाटक में पुख्ता कर दी थी। यही नहीं, यह भी माना गया कि अहिंदा कार्ड के जरिये अल्पसंख्यक और दलित एकता की एक नई धरोहर वह फिर से कांग्रेस से जोड़ देंगे। लेकिन चुनाव नजदीक आते-आते स्पष्ट हो गया कि कर्नाटक में फिर से वर्चस्वशाली जाति के भीतर विभाजन की राजनीति ही सबसे महत्वपूर्ण रही। कर्नाटक के बहुसंख्यक वोक्कालिगा और लिंगायत जातियां ही चुनावी नतीजे पर भारी पड़ीं। लिंगायतों को सरकार द्वारा अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने के बावजूद वे भाजपा की तरफ झुके रहे और वोक्कालिगा को दरकिनार करने के रोष के फलस्वरूप देवगौड़ा की पार्टी जेडीएस कुर्सी की बाजी मार ले गई।
वहीं हाल ही में हुए मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के चुनाव में भी जहां मामा कहे जाने वाले शिवराज सिंह चौहान का किला हिल गया, वहीं छत्तीसगढ़ में चावल बाबा के नाम से मशहूर रमन सिंह की कुर्सी भी चली गई। दोनों मुख्यमंत्रियों का कार्यकाल बहुत लंबा रहा और दोनों ही अपने-अपनी कल्याणकारी नीतियों के चलते जाने जाते थे। मध्य प्रदेश की लाडली लक्ष्मी योजना और रमन सिंह की खाद्य आपूर्ति की योजना भी काम नहीं कर सकी, क्योंकि किसानों के उभरते हुए रोष, बेरोजगारी पर कुछ न किए जाने के कारण युवाओं की नाराजगी और शहरी व्यापारियों में जीएसटी को लेकर हुई दिक्कतों जैसी चुनौतियों का सामना ये प्रभावशाली मुख्यमंत्री भी नहीं कर पाए। जाहिर है, अब गुड गवर्नेंस और विकासवाद भी कुर्सी में बने रह सकने की कोई गारंटी नहीं।
जहां 2017 तक भाजपा आक्रामक रूप से विकासवाद का कार्ड लेकर आगे बढ़ रही थी, वहीं 2018 में पूरी चर्चा मंदिर के इर्द-गिर्द घिर गई है। जहां उत्तर प्रदेश के चुनाव में मुख्य मुद्दा यह था कि अखिलेश यादव की सरकार ने विकासवाद की जगह परिवारवाद में और जातिवाद में समय गंवाया है, वहीं इस वर्ष योगी की सरकार मुख्यतः अयोध्या, राम मंदिर और कुंभ मेले के आयोजन में जुटी दिखी। योगी के बारे में यह कहा जाता था कि कम से कम गोरखपुर के इलाके में वह काम करने वाले रहे हैं, लेकिन उनके भड़काऊ भाषण ही लोगों का ध्यान आकृष्ट करते रहे।
एक दूसरी महत्वपूर्ण बात 2018 में यह रही कि राजनीतिक भाषा की गरिमा पर अब किसी का कोई ध्यान नहीं रहा। जहां एक तरफ योगी आदित्यनाथ ने हैदराबाद में पाकिस्तान भेजने की बात कर दी, वहीं एमआईएम के ओवैसी बंधु भी उसी किस्म की ओछी बातें करते सुने गए। कांग्रेस ने भी अल्पसंख्यकवाद की आलोचना से खुद को बचाने के लिए जनेऊ और मंदिर का सहारा ले लिया। कर्नाटक चुनाव में भी राहुल प्रचार करते हुए मंदिरों का भ्रमण करते देखे गए और ये बातें खूब प्रचारित की गईं। धर्म उनका निजी मामला है, पर बारीकी के साथ राजनीति में धार्मिक प्रतीकों को उभारा गया। कहीं जनेऊधारी, कहीं शिवभक्त, तो कहीं उनके गोत्र-इन सबकी चर्चा कर्नाटक से लेकर मध्य, प्रदेश और राजस्थान सभी चुनावों में सुर्खियों में रहे। वहीं भाजपा ने भी जल्द से जल्द राम मंदिर बनाए जाने की मांग सामने रख दी।
लेकिन जिन मुद्दों पर छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान-तीनों में राजनीतिक उथल-पुथल मची और भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ी, वह था किसानी का मुद्दा। कृषि के उत्पाद बढ़ने के बावजूद किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य बाजार में नहीं मिल पाया। मंडियों में अफरातफरी फैली, उपज की न्यूनतम दर न मिलने के चलते किसानों ने अपना रोष जताया। शिवराज सिंह चौहान ने तो राज्य में भावांतर भुगतान योजना का भी एलान कर दिया, लेकिन बिचौलिए और कमजोर नौकरशाही के चलते सरकार और किसान का संवाद सही रूप से नहीं हो पाया।
चूंकि वर्ष 2018 खत्म होने वाला है, वैसे में अब यह स्पष्ट है कि नए वर्ष में ग्रामीण क्षेत्र, किसानी और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर ही चर्चा गर्म रहेगी। सरकारी चाय के प्याले में तीन तलाक, जनधन, उज्ज्वला और स्वच्छता की बातें की जाएंगी, किंतु भारत के गरीब विवेकशील हैं, जो कठिन जीवन जीने के बाद भी राजनीति और समय दोनों को अपने नजरिये से परखते हैं।
नरेंद्र मोदी की एक उपलब्धि विदेशी मामलों में मानी जाती है और इस वर्ष अप्रैल में वह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से चीनी शहर वुहान में मिले और उसके तुरंत बाद जी-20 के शिखर सम्मेलन अर्जंटीना के ब्यूनस आयर्स में भी। चीन और अमेरिका के संबंधों के कशमकश के बीच जहां एक तरफ यह समझा गया कि मोदी ने अपनी पैठ चीन में बढ़ाई है, वहीं चीन अपना दांव पाकिस्तान से अपने संबंधों और वन बेल्ट वन रोड इनीशिएटिव में लगाता रहा। यानी अब भी यह स्पष्ट नहीं कि भारत-चीन संबंधों से कोई राहत होगी या दोकलम जैसी गर्मागर्म बहस फिर से उभर आएगी। इसी ऊहापोह के बीच हम 2019 में अपने कदम रखेंगे।