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वह परिवर्तन कहां है

तवलीन सिंह Published by: Raman Singh Updated Sun, 30 Dec 2018 08:03 PM IST
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तवलीन सिंह

नववर्ष की शुभकामनाएं। कल ऐसा वर्ष शुरू हो रहा है, जिसके शुरू होने से पहले ही उसे ऐतिहासिक कहना गलत नहीं होगा। इस नए साल में देशवासी तय करेंगे कि उनको नरेंद्र मोदी का नया भारत या न्यू इंडिया पसंद है या उन्हें वापस उन लोगों के पास जाना पसंद है, जिन्होंने न कभी अच्छे दिनों का वादा किया था, न ही न्यू इंडिया का। इस देश के मतदाता अगर नरेंद्र मोदी को दूसरा मौका नहीं देते, तो इसलिए कि जिस परिवर्तन की आशा से उन्होंने तीस साल बाद किसी प्रधानमंत्री को पूर्ण बहुमत दिया था 2014 में, वह परिवर्तन अभी तक दिख नहीं रहा है।



सच पूछिए तो मैं उनमें से थी, जिनको परिवर्तन की आशा थी। सो आज मुझे निराशा हो रही है, तो इसका मुख्य कारण यही है कि जिस राजनीतिक सभ्यता में परिवर्तन की मुझे आशा थी, वह अभी तक दिख नहीं रहा। राजनीतिक सभ्यता में परिवर्तन लाना इसलिए जरूरी है, क्योंकि मेरा मानना है कि भारत की गिनती विकसित देशों की सूची में अभी तक केवल इसलिए नहीं हुई, क्योंकि अंग्रेजों के जाने के बाद हमारे राजनेता गोरों की खाली जगहों पर खुद बैठ गए। आला सरकारी अफसरों की जगह तो वैसे भी खाली नहीं थी, क्योंकि हमारे ही बंधुओं ने अंग्रेजों की सेवा की थी, सो अंग्रेजों के जाने के बाद उन्होंने अपनी सेवा भारत सरकार के हवाले कर दी थी, लेकिन अपनी शान में कोई कमी नहीं आने दी।


जब भी मैं किसी छोटे शहर में जाती हूं, तो पहले यह देखने जाती हूं कि आला अधिकारी के निवास कहां हैं। अक्सर देखने को यही मिलता है कि गंदे, बेहाल शहरों में भी एक सड़क या एक रिहायशी इलाका बाकी शहर से बिलकुल अलग दिखता है। चाहे पटना हो, भोपाल, जयपुर हो या लखनऊ-इस इलाके में आपको दिखेगी सफाई, सुंदरता, आलीशान कोठियां, और कभी-कभी तो ऐसे भी लगता है कि इस इलाके में वायु-जल भी अधिक मेहरबान है। इस इलाके में रहते हैं हमारे शासक। जब तक हम अपने शासकों को विशेष क्षेत्रों में रहने की इजाजत देंगे, तब तक सुशासन नहीं आएगा, क्योंकि हमारे शासकों को पता ही नहीं है कि आम भारतीय नागरिक की दैनिक समस्याएं कितनी गंभीर हैं।


न जाने क्यों, मुझे पूरा विश्वास था कि मोदी के आने के बाद इस असमानता में ठोस परिवर्तन दिखने लगेगा, जैसा कि वह खुद कहते हैं। अपने हर दूसरे भाषण में वह अपने आपको कामदार मानते हैं और उन लोगों को नामदार, जिनको दशकों से विरासत में सत्ता मिलती आई है। तो समझ में नहीं आता कि मोदी ने अपने मंत्रियों और अधिकारियों को उसी अकड़ और शान से रहने की इजाजत क्यों दी है, जो हमारी राजनीतिक सभ्यता में चलती आई है।


आम भारतीय इस असमानता को केवल इसलिए स्वीकार कर लेता है, क्योंकि वह जानता नहीं कि अन्य लोकतांत्रिक देशों में जनप्रतिनिधियों और सरकारी अफसरों को इतनी शान से रहने का अधिकार नहीं मिलता है। वही लोग राजनीति में आते हैं, जिन पर वास्तव में राष्ट्र की सेवा करने का भूत सवार होता है।

 

मेरे कुछ दोस्त अमेरिका में हैं, जो सरकार में रहने के बाद वापस निजी क्षेत्र में जाते हैं नौकरी करने और थोड़ा-बहुत पैसे कमाने। अपने भारत में मामला उल्टा है। यहां हमारे राजनेता अपने बच्चों को राजनीति में घसीट कर ले आते हैं पैसा बनाने के लिए। न जाने क्यों, 2014 में मुझे उम्मीद थी कि मोदी अपने ‘नए भारत’ में इसे बदल कर दिखाएंगे। अफसोस के साथ कहना पड़ेगा कि ऐसा उन्होंने नहीं किया है, सो, वर्ष 2018 का यह आखिरी लेख लिखते हुए निराश हूं।

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