आश्विन की शुक्ल पक्ष की दशमी विजयादशमी है, जिसे लोकभाषा में दशहरा कहते हैं। यह राम और दुर्गा, दोनों का विजयोत्सव है। विजय यानी संकल्प की जय, शुभ की जय। वनवासी राम की साधारणता की जय। जय और पराजय, दोनों को अतिक्रांत करने वाली विजयादशमी भारत के जनसामान्य की शिरा-धमनियों में चिरकाल से यों ही नहीं है। यह एक ऐसा तटबंध रचती है, जिस पर इस महादेश की संस्कृति का संगीतमय निनाद है।
नवरात्र के सात्विक वातावरण का अगला चरण है, विजयादशमी। सच पूछिए, तो राजसिकता के लिए भी सजग किस्म की सात्विकता चाहिए। शासन करने और प्रतिरोध करने, दोनों के लिए। दोनों ओर तामसिकता के लुभावने छोर दिखते हैं। जयप्रकाश नारायण में यदि अंदर से सत्व नहीं होता, तो आपातकाल के अंधकार को वह चीर नहीं पाते। हम सबके अंदर आपातकाल है और अंधकार भी-उसके पार जाने की जिजीविषा हमें जय दिलाती है। यह जय दूसरे का पराजय चाहे, आवश्यक नहीं। रावण से अंतिम क्षण में राम ने बहुत कुछ सीखा। सबसे बड़ी बात है, अहं का विसर्जन। नवरात्र में अहं का तिरोहण होना ही चाहिए। यदि हम मन को पवित्र और अनुशासित कर लें, तो प्रत्येक दिन विजयादशमी है। आपके संघर्ष, लोकपक्ष के आग्रह, अन्याय के विरुद्ध उठी प्रत्यंचा, समानता के रसायन से युगानुकूल विश्वास जन्मेगा-जो विजयादशमी का हेतु है।
हमारे आज के समय को अंधेरी गलियों में रास्ते की तलाश है। रास्ते गड्डमड्ड दिखते हैं, और निश्चित दृष्टि के अभाव में कई बार भ्रमपूर्ण। वोटों के लालच में कहीं संप्रदायीकरण है, तो धर्मनिरपेक्षता की आड़ में कहीं भ्रष्टाचार व परिवारवाद को समर्थन। मनुष्य का चेहरा रोबोट का मुखौटा होता जा रहा है। उसे मानवीय होना चाहिए।
विजयादशमी समूचे भारत को शक्ति में बांधने का सहकार रूप है। रामलीलाओं के अभिनय में भारत के उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम सभी कोणों के लोग अपना ही जीवन देख पाते हैं-सहमति, असहमति के बावजूद। नए समय में इस कथा की व्याख्याएं न केवल बदली हैं, बल्कि उनकी पुनर्रचना में इस पुराकथा को समकालीन मनुष्य ने अपना चेहरा देखा है। एक ऐसी कथा, जो हमारा संस्कार बन गई है। शक्ति अर्जित करना, वन प्रसंग को समझना, सत्ता की जटिलता को जानना, पारिवारिक आदर्शों का पालन करना, जनता के दुख से गहन सरोकार रखना आदि विजयादशमी के आधार बिंदु हैं।
रामलीला के माध्यम से हम सामाजिक संरचना, सौंदर्यबोध, कला-इतिहास, समय और मृत्यु जैसे शाश्वत यथार्थ को नई दृष्टि से देख पाते हैं। परंपरा को ठीक तरह से समझने के लिए हमें उसके अंदर प्रवेश करने की संभावना तथा बाहर से उसकी आलोचना की क्षमता अर्जित करनी होगी। रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों को मात्र विश्लेषणात्मक, दृश्यात्मक, भाव्यात्मक और ऐतिहासिक रूप से समझने के आगे जाकर समझना होगा। देश का समाज, इसकी संस्कृति और राजनीति नई करवट लेने को उत्सुक है। एक विचारधारा, एक परिवार, राजनीति में संप्रदाय, क्षेत्र, जाति का अतिरेक, बहुलता को दबाना, महाबली देशों की दबंगई, अर्थव्यवस्था की दीनता के बीच भारत का जन सामान्य पिस रहा है। इस विजयादशमी पर हमें नए संकल्प लेने होंगे, परिवर्तन के। हमारी नई सोच का हर वाक्य व वाक्यांश उत्सव का प्रारंभ है।