फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बेइज्जती भी कोई चीज होती है

Wed, 21 Oct 2015 06:29 PM IST
मुरली मनोहर श्रीवास्तव
विज्ञापन
विज्ञापन
वह जमाना गया, जब आदमी इज्जत के लिए जीता था। आजकल जिसे देखो, वह बेइज्जती करने और कराने पर तुला हुआ है। कई तो ऐसे हैं, जो इसे शान के साथ गले से लगाए रखते हैं। बहुत से लोग तो बेइज्जती के लाइव टेलीकास्ट के मुरीद हो चुके हैं। वे एक से एक ऐसी बेइज्जती भरे कारनामे करते हैं, ताकि लगातार खबर में बने रहें। न जाने क्यों, आजकल बदनाम हुए, तो क्या नाम न होगा वाली कहावत मुफीद हो गई है।
विज्ञापन


एक जमाना था, जब लोग इज्जत को लेकर बड़े चिंतित रहते थे। मां-बाप बच्चों को समझाते थे कि देखो बेटा, कोई ऐसा-वैसा काम मत करना कि मेरी नाक कट जाए। लेकिन इज्जत की परवाह करने वाले इसका अचार डालकर गली-मुहल्लों में सीमित रह गए, और जिन्होंने इसकी परवाह नहीं की, वे सफलता की सीढ़ियां दनादन लांघते चले गए।

ऐसे में, आदर्शवादी लोग बस इनके स्वागत समारोह, मान-सम्मान में पढ़े जा रहे कसीदों पर कहीं दो चार लोगों के बीच या पान की दुकान पर खड़ी भीड़ के बीच इनके कार्यों की दुर्गाथाएं सुना दिल की भड़ास निकालते फिरते हैं। वहां वे बड़े फख्र से बताते हैं कि कॉलेज के जमाने में हम दोनों एक ही क्लास में थे और आज जिसे माला पहनाई जा रही है, वह मेरे नोट्स और कॉपी टीपकर पास हुआ करता था। तब हम अपनी इज्जत से रहे और वह लगातार अपनी बेइज्जती करा-कराकर इस मुकाम तक पहुंच गया। वह कहता था, देख लेना, एक दिन मेरा भी वक्त आएगा। जब मुझे अपनी बेइज्जती की पूंजी का फल मिलेगा, तब तुम सब देखते रह जाओगे।
विज्ञापन


सो, जिसे देखिए, वह अपनी बेइज्जती की फिराक में रहता है। कुछ लोग कभी टीवी, कभी सोशल मीडिया पर बेइज्जती प्रायोजित करा रहे हैं। प्राइम टाइम में अपराध की खबर यही बताती है कि न्यूज चैनल में भी बेइज्जती इज्जत से कहीं ज्यादा बिकती है। आज के जमाने में कहीं कोई अपनी बेइज्जती करता-कराता नजर आए, तो यह मानकर चलिए कि वह बड़े उद्देश्य को पूरा करने के जुगाड़ में लगा हुआ है।
विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें