दुर्भाग्य तो यह है कि जहां एक ओर ‘जागो ग्राहक जागो अभियान’ के उपरांत भी उपभोक्ता उदासीन हैं अथवा ‘कौन चक्कर में पड़ेगा’ की धारणा के साथ अपनी आवाज को मुखर भी नहीं करता है। दूसरी ओर, सरकार भी उद्योगोन्मुखी भावना के साथ उत्पादन को प्रोत्साहन प्रदान करने की नीति पर कार्यरत है, बिना यह जाने कि बढ़ते उत्पादन को संभाल पाने में वह उद्योग सक्षम है भी या नहीं। औद्योगिक प्रोत्साहन नीति में उपभोक्ता का तो कोई स्थान है ही नहीं। भारत में उदारीकरण के पश्चात सभी प्रयास इस दिशा में होते हैं कि विदेशों में विद्यमान उद्योग भारत में आकर अपना बाजार तलाशें। इस दौड़ में विभिन्न राज्यों द्वारा आयोजित निवेशक सम्मेलन में भी विदेशी कंपनियों को अधिक महत्ता प्रदान की जाती है। ऑटोमोबाइल क्षेत्र में भी बीते दशकों में मर्सिडीज, ऑडी, बीएमडब्ल्यू, वोल्वो समेत सभी कंपनियों ने अपनी इकाइयां इन्हीं निवेश प्रोत्साहन के तहत स्थापित की हैं, विविधता का लाभ भी लोगों को मिल रहा है, लेकिन कई दर्द भी मिल रहे हैं, जिन पर नियंत्रण के लिए कोई प्रभावी नियम-कायदे नहीं हैं।
ये ऑटोमोबाइल कंपनियां अपनी इकाई लगाने के साथ ही संपूर्ण देश में वितरकों का जाल स्थापित करती हैं। यह सब बाहरी तौर पर अत्यंत आकर्षक लगता है, जब तक कि इस जाल में उलझकर कोई स्वयं को असहाय महसूस न करे। सामान्यतया ग्राहक अपने असहाय भाव को व्यक्त नहीं कर पाता है। जब यह विपणन का जाल बुना जाता है, तो उसमें ध्येय मात्र उत्पाद को बेचना ही होता है और ग्राहक को पारदर्शी तौर पर विक्रय पश्चात की अवस्थाओं के बारे में पूर्ण जानकारी नहीं दी जाती। आश्चर्य इस बात का है कि इन तथाकथित विश्वव्यापी ब्रांडेड कंपनियों में भी विक्रय पश्चात कार्य हेतु ऑटो पार्ट्स की सुलभता हेतु कोई सुदृढ़ व्यवस्था नहीं होती। परिणामस्वरूप किसी भी वाहन के खराब या दुर्घटना होने के पश्चात एक लंबी अवधि तक कल-पुर्जों की उपलब्धता के मद्देनजर कई बार महीनों तक वाहन इनकी कार्यशालाओं की शोभा बढ़ाते रहते हैं। ग्राहक इस दौरान विवश होकर अतिरिक्त खर्च पर अपना आवागमन करता है।
प्रश्न यह है कि जब उत्पादन और विपणन-जाल का विस्तार किया जा रहा है, तो क्या उक्त स्थल पर प्रचुर मात्रा में कल-पुर्जे भंडार में रखना अवश्यंभावी नहीं होना चाहिए। अपेक्षित तो यह है कि नियम-कायदों के तहत लाकर इस प्रकार से नियंत्रण कायम किया जाए कि बिना कल-पुर्जों की सुलभता के क्षेत्र में विक्रय का अधिकार ही न मिले। साथ ही, ग्राहकों को एक निश्चित अवधि के पश्चात वाहन मरम्मत न होने पर मुआवजा मिलने का प्रावधान भी हो। बीते वर्षों में ग्राहक को अधिकार देने के नाते मरम्मत का अधिकार भले ही दिया गया हो और उस पर प्रमुख औद्योगिक उत्पादन कंपनियों ने सहमति भी जताई हो, लेकिन धरातल पर वास्तविकताएं बहुत अलग हैं। यदि ऑटोमोबाइल क्षेत्र को ही देखा जाए, तो संभवतया किसी नियम-कानून के तहत उत्पादन करने वाली कंपनियों का किसी भी स्तर पर विश्लेषण, सामाजिक अंकेक्षण नहीं होता।
भारत में एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार आचरण अधिनियम, 1969 के स्थान पर प्रतिस्पर्धा कानून, 2002 लागू कर ग्राहकों के हित सुरक्षित रखने की भावना व्यक्त की गई थी, लेकिन उद्योगों के दबाव एवं उपभोक्ता की उदासीनता के चलते वर्तमान में एकाधिकारवादी प्रवृत्ति कम होने के स्थान पर बढ़ती जा रही है। इनका मूलभूत कारण उत्तरदायी व्यापार के तानेबाने का अभाव है। परिणामस्वरूप ये उद्योग असीमित और अनियंत्रित लाभ के साथ कार्य कर रहे हैं और पारदर्शिता के नाम पर शून्य व्यवस्था को अपनाया गया है। ऑटोमोबाइल की कर्मशाला में तो ग्राहक का प्रवेश विभिन्न कारण जताकर अथवा बढ़िया आतिथ्य का कवच लगाकर निषिद्ध रखा जाता है। अतएव, उद्योग और उत्पादन को प्रोत्साहन प्रदान करने के साथ उसके सामाजिक अंकेक्षण की व्यवस्था भी समायोजित की जानी चाहिए, ताकि आमजन विक्रय पश्चात ठगा महसूस न करे।