इन कार्यक्रमों में पंडितों को स्थानीय मुसलमानों का भी सहयोग प्राप्त हुआ। ग्लोबल कश्मीरी पंडित डायस्पोरा ने कहा कि फिल्म या अन्य समस्याओं को हिंदू-मुस्लिम के नजरिये से न देखा जाए और मुख्य बात यह है कि 1990 में व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी थी। फिल्म के बहाने पंडितों की वापसी का मुद्दा नए सिरे से उठा। निष्कासितों के एक वर्ग ने कश्मीर में अलग बस्तियां बनाने की पुरानी मांग दोहराई, तो घाटी से यह आवाज भी उठी कि पंडितों का उनके पुराने घरों में स्वागत है।
दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि 1990 की बहुत तकलीफदेह यादों को ताजा करते हुए आख्यान एक खतरनाक दायरे में पहुंच गया। हिंदू-मुस्लिम चश्मे से कश्मीर मसले को देखा जाने लगे, तो उससे फायदा पाकिस्तान और कश्मीर में मौजूद उस पाकिस्तानी जमात को होगा, जो 1947 में भारत में विलय नहीं चाहती थी और अभी तक कम से कम घाटी को पाकिस्तान में शामिल करने का सपना संजोए हुए हैं। यहां 1947 और उससे पहले के कई महीनों की दुरभिसंधियों और कुचेष्टाओं का पुनर्पाठ आवश्यक हो जाता है।
मोहम्मद अली जिन्ना इस आधार पर कश्मीर चाहते थे कि वह मुस्लिम बहुल है। महाराजा हरि सिंह और घाटी के लोकप्रिय नेता शेख मोहम्मद अब्दुल्ला, दोनों पर उन्होंने डोरे डाले। नाकाम होने पर पाकिस्तान ने अक्तूबर, 1947 में हमला कर दिया। भारत में कश्मीर रियासत के विलय का विकल्प नहीं बचा। यह भी याद रहना चाहिए कि 1947, 1965, 1971 और कारगिल युद्ध के दौरान कश्मीर का मुसलमान अभेद्य चट्टान की तरह पाकिस्तान के खिलाफ खड़ा रहा। यह भारत की समावेशी, सेक्युलर-गणतांत्रिक राजनीतिक संस्कृति और कश्मीरियत की विजय थी।
कश्मीरी मुसलमान ने बार-बार पाकिस्तान के द्विराष्ट्रवादी सिद्धांत को ठुकराया। तब फिर पंडितों को जान बचाकर रातोंरात भागना क्यों पड़ा? घाटी का मुसलमान कितना जिम्मेदार है? है भी या नहीं? पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद और कश्मीर में पाकिस्तानी-जिहादी आतंकवाद में अनेक साम्य हैं। स्वर्गीय केपीएस गिल कहा करते थे कि तरनतारन खालिस्तान की अघोषित राजधानी बन चुका था, न्यायपालिका सहित पूरी व्यवस्था टूट चुकी थी। राज्यसत्ता के तरकश में मौजूद सभी तीरों का इस्तेमाल करते हुए कुशल नेतृत्व ने हल निकाला।
श्रीनगर और अन्य शहरों में सेना और अर्द्ध सैनिक बलों की भारी मौजूदगी के बावजूद नियंत्रण रेखा (एलओसी) से लेकर अंदर तक भारत की हुकूमत का इकबाल खत्म हो जाने का आभास होने लगा, तभी तो एके-47 से लैस आतंकवादियों का फरमान चलता था। घाटी छोड़ देने की आतंकियों की धमकी के बाद हुक्मरानों ने घातक हिफाजती कार्रवाई क्यों नहीं की? घाटी के मुसलमानों ने तो हाथ नहीं रोक रखा था। एक-एक आतंकी को घेरकर खत्म कर देना नामुमकिन तो नहीं था।
बेशक घाटी में आतंकियों और अलगाववादियों को एक वर्ग का समर्थन हासिल था, लेकिन जमात-ए-इस्लामी और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस समूचे मुस्लिम समाज के नुमाइंदे नहीं थे। आज भी नहीं हैं। चर्चित कश्मीरी पंडित शरणार्थी, युवा लेखक राहुल पंडिता के संस्मरणों की पुस्तक ऑवर मून हैज ब्लड क्लॉट्स को बारीकी से पढ़िए, और एक-एक शब्द का अर्थ निकालिए, तो घाटी का तत्कालीन सच काफी हद तक सामने आ जाएगा।
डायस्पोरा सहित पंडितों के एक वर्ग की मांग है कि कश्मीर में उनकी अलग बस्तियां बसाई जाएं। वे अपने अलग शहर बसाना चाहते हैं, 'जहां स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय हों, जहां तिरंगा फहराए।' इसे व्यापक संदर्भ में देखना होगा। अलग बस्तियों का निर्माण भारतीय राष्ट्रवाद और कश्मीरियत, दोनों की हार का प्रतीक होगा। इससे 1990 के जख्म निरंतर गहरे होते जाएंगे। स्वस्थ, लोकतांत्रिक समाज में घेट्टो के लिए स्थान ही नहीं हुआ करता।
श्रीनगर में मुस्लिम घेट्टो और उससे अलग हिंदू घेट्टो या कहीं भी घेट्टो, की कल्पना तो स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान निर्माताओं ने भी नहीं की होगी। कश्मीर के मुसलमानों को इसके खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाहिए। सब कुछ लुटाकर घाटी से भागे पंडितों से उम्मीद नहीं की जा सकती कि एक दिन वे अचानक अपने पुराने घरों को लौट जाएंगे। उनका भरोसा जीतने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी उनके मुसलमान पड़ोसियों की है। कश्मीरी पंडितों की सहर्ष वापसी का पूरे भारत पर प्रभाव पड़ेगा।
राष्ट्रीय एकता की ताकतें मजबूत होंगी। सच और मेल-मिलाप आयोग के गठन की, पंडितों की मांग पर नेकां, पीडीपी, भाजपा, माकपा और अन्य दल सहमत हैं। 1984 में देश के कई हिस्सों में सिखों की हत्याओं और अन्य हिंसक घटनाओं की जांच अभी तक चल रही है। यह इंसाफ पंडितों के साथ भी होना चाहिए। अतीत की घटनाओं को देखने का सर्वमान्य दृष्टिकोण संभव नहीं होता। सभी पक्ष अपनी सुविधानुसार घटनाओं का भाष्य करते हैं। फिर भी ईमानदार कोशिश तो होनी ही चाहिए।
कश्मीर का एक स्थायी सच यह है कि पाकिस्तान इसे अपनी ग्रीवा शिरा मानता है और भारत अपना मुकुट। पाकिस्तान इसे हड़पने का मंसूबा कभी नहीं छोड़ेगा। भारत से कश्मीरी अवाम के भावनात्मक जुड़ाव को अटूट बनाने के उपाय ढूंढ़ने की जरूरत है। राष्ट्रीय एकता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए नए प्रतिमान गढ़ने होंगे। नई इबारत लिखनी होगी। हिंदू-मुस्लिम विवाद के चश्मे से देखने के आख्यान को नष्ट करना पड़ेगा।
अगर नहीं कर पाएंगे, तो लाभ पाकिस्तान का होगा। अगर हिंदू, सिख और डोगरा शासन पर गर्व करेंगे, तो मुसलमानों को सुल्तान बुतशिकन को हीरो बनाने से नहीं रोका जा सकता। कश्मीर के लहूलुहान इतिहास में पंद्रहवीं शताब्दी में एक शासक हुआ है, सुल्तान जैनुल आब्दीन, जिसे हिंदू और मुसलमान एक साथ प्रेरणा स्रोत मान सकते हैं। इस सुल्तान को समझने के लिए राहुल पंडिता की किताब पढ़ लीजिए।