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उत्तर प्रदेश, अपराध और आंकड़े

Mon, 19 Sep 2016 07:12 PM IST
नरेंद्र कुमार त्रिपाठी
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नरेंद्र कुमार त्रिपाठी
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नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की वार्षिक रिपोर्ट की प्रतीक्षा समाजशास्त्रियों, मीडिया एवं विरोधी दलों को बेसब्री से रहती है। इन आंकड़ों की सहायता से अनेक सनसनीखेज, रोचक एवं दुखद तस्वीरें प्रस्तुत की जाती हैं। कई बार अपने हितों को साधने के लिए आंकड़ों के चुने हुए अंश से अतिरंजित स्थिति प्रस्तुत की जाती हैं, तो वहीं सत्तारूढ़ दल द्वारा सब कुछ सामान्य बताया जाता है। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री डिजराइली ने एक बार कहा था कि झूठ तीन प्रकार के होते हैं, झूठ, महाझूठ एवं आंकड़े।
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विगत दिनों एनसीआरबी ने 2015 के आपराधिक आंकड़े जारी किए। ताजा आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। हत्या से संबंधित 4,732 पंजीबद्ध अपराधों के साथ उत्तर प्रदेश सबसे आगे रहा, वहीं 3,178 हत्या से संबंधित मामलों के साथ बिहार दूसरे स्थान पर। हालांकि हत्या के प्रयास से संबंधित मामलों में यह सूबा पश्चिम बंगाल और बिहार के बाद तीसरे स्थान पर था।
भारत में राज्यों के आकार एवं जनसंख्या में भारी असमानता है, अतः प्रकरणों की संख्या के आधार पर तुलना करना विसंगतिपूर्ण है। इसके बावजूद भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत पंजीबद्ध कुल प्रकरणों में उत्तर प्रदेश का चौथा स्थान था। पिछले वर्ष पूरे देश में कुल 29,49,400 मामले पंजीबद्ध हुए, जिनमें सर्वाधिक महाराष्ट्र में, उसके बाद मध्य प्रदेश और फिर केरल में दर्ज हुए। उत्तर प्रदेश एक विशाल राज्य है, जिसकी आबादी साढ़े इक्कीस करोड़ के करीब है। यह भारत की कुल जनसंख्या का करीब सत्रह फीसदी है। स्वतंत्र देश के रूप में विश्व में इसका स्थान पांचवा होता। इस सत्रह फीसदी आबादी के क्षेत्र में भारत के कुल अपराध के आठ फीसदी अपराध ही पंजीबद्ध हुए, जो थोड़ा चौंकाने वाला तथ्य है। उल्लेखनीय यह भी है कि दशकों से इसी प्रकार के आंकड़े आ रहे हैं।
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राज्यों के बीच उचित तुलना के लिए एनसीआरबी द्वारा सभी प्रकार के अपराधों की राज्यवार दर प्रस्तुत की जाती है। एक वर्ष में एक लाख की जनसंख्या पर होने वाले अपराधों को उसकी दर कहा जाता है। इस आधार पर सर्वाधिक आपराधिक राज्य केरल को कह सकते हैं, जहां यह दर 723 थी। मध्य प्रदेश में 348 उसके बाद हरियाणा में 310 और उत्तर प्रदेश में 112 अपराध की दर रही। अपराधों की दर की दृष्टि से उत्तर प्रदेश 27 वें स्थान पर है! इस स्थिति पर प्रदेश का पुलिस बल गर्व कर सकता है।

हम सभी जानते हैं कि थानों में सभी अपराध पंजीबद्ध नहीं होते। कभी थाने से पीड़ित व्यक्ति को वापस कर दिया जाता है, तो कभी सिर्फ लिखित में शिकायत ले ली जाती है। छोट-मोटे प्रकरणों में तो शिकायतकर्ता थाने जाने से कतराता भी है। इसी तरह महिलाओं पर होने वाले अपराध की अनेक घटनाएं चारदीवारी में कैद होकर रह जाती हैं।

स्वतंत्रता के बाद सत्ता का तो हस्तांतरण हुआ, पर अपराध से संबंधित कानून या प्रक्रिया में बदलाव नहीं हुआ। पुलिस आयोग एवं विधि आयोग की रिपोर्ट्स रद्दी की टोकरी में जाती रही हैं। हमारे राजनीतिज्ञ अपराधियों के संरक्षक हैं या खुद अपराधी तक हैं। ऐसी व्यवस्था में उन्हें सुरक्षा महसूस होती है। जब तक हमारे नेतृत्व करने वालों की सोच में क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं होता है, हमारे ये आंकड़े सामाजिक स्थिति को स्पष्ट करने के बजाय वास्तविकता को छिपाने का काम अधिक करेंगे।
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एनसीआरबी के पूर्व डीजी, अभी मालवांचल विवि. के कुलपति
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