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जवाबी कार्रवाई का वक्त

मारूफ रजा
Updated Mon, 19 Sep 2016 06:31 PM IST
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उड़ी में हुआ भीषण आत्मघाती हमला पाकिस्तान की साजिश का एक और नमूना है। पिछले करीब दो-ढाई दशकों से पाकिस्तान सिर्फ और सिर्फ कश्मीर के मुद्दे पर चल रहा है। पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अब तक हर मोर्चे पर विफल रहे हैं। कश्मीर मुद्दे को हवा देकर ही वह अपनी गद्दी बचाए रख सकते हैं। नवाज जानते हैं कि अगर वह अपनी भूमिका में जरा भी चूके, तो सेना इमरान खान को प्रधानमंत्री बनाने में तनिक नहीं हिचकेगी। इस दबाव ने ही नवाज को कश्मीर मुद्दे पर आक्रामक बनाया है। चूंकि इसी समय संयुक्त राष्ट्र में नवाज शरीफ को भाषण भी देना है, इसलिए इस्लामाबाद न केवल कश्मीर मुद्दे को जिलाए रखना चाहता है, बल्कि घाटी में आतंकी हमलों के जवाब में भारत अगर जवाब में कुछ करता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई दिल्ली को घेरने का मौका भी मिल जाएगा। हमारे पड़ोसी देश का एजेंडा है कि कश्मीर की आग को बुझने नहीं देना है।

चूंकि यह मौसम आतंकवादियों की घुसपैठ का है, तथा कुछ और आतंकी समूहों के सीमा पार कर इस ओर घुसने की सूचना है, ऐसे में, आतंकी हमला अभी रुकने वाला नहीं है। बहुत संभव है कि जल्दी ही एक और आतंकी हमला हो। पाकिस्तान यही चाहता है कि आतंकी हमलों के जवाब में भारत कुछ करे, तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को पीड़ित बताते हुए वह कूटनीतिक लाभ उठाए। जब भारत ने दूसरी बार परमाणु परीक्षण किया था, तब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ही थे। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने यही तर्क दिया था कि भारत के परमाणु परीक्षण करने के बाद अब हमारे सामने परमाणु परीक्षण के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है, क्योंकि परमाणु शक्तिसंपन्न भारत हम पर हमला न भी करे, तो हमें दबाएगा।


जहां तक हमारी सरकार का सवाल है, तो उसे उड़ी में हुए हमले के बाद कठोरता दिखानी होगी। मतदाताओं ने करीब ढाई साल पहले नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को इसलिए सत्ता सौंपी थी कि वह आतंकवाद के खिलाफ सख्ती दिखाएंगे। पर वह सख्ती नहीं दिखा रही। नरेंद्र मोदी कभी नवाज शरीफ की मां के पांव छूते हैं, तो कभी श्रीनगर में महबूबा मुफ्ती का समर्थन करने लगते हैं। जनता ने उन्हें इसलिए वोट नहीं दिया था। म्यांमार और भूटान के खिलाफ सख्ती दिखाने से काम नहीं चलेगा। यह सख्ती उन्हें पाकिस्तान के खिलाफ दिखानी पड़ेगी, जिसका उन्होंने वायदा किया था।

सवाल यह है कि पाक प्रायोजित आतंकवादी हमलों के बाद भारत को क्या करना चाहिए। पहली बात यह कि हमारी सरकार आतंकी हमलों में पाकिस्तान के हाथ होने के सबूत इस्लामाबाद को दिखाना बंद करे। इस पर पाकिस्तान को न तो शर्म आती है, न ही वह कोई कार्रवाई करेगा। पठानकोट हमले के सबूत उसे सौंपे गए। पाकिस्तान से जांच दल पठानकोट आया। नतीजा क्या निकला? पाकिस्तान को सबूत दिखाने से उसे बचाव के रास्ते बनाने में ही मदद मिलेगी। इसके बजाय ये तमाम सबूत हमें अंतरराष्ट्रीय समुदाय को दिखाने चाहिए। अभी न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की महासभा है। वहां कश्मीर पर भाषण होते हैं, तो सदस्य देश जमुहाई लेने लगते हैं। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को वहां भाषण देने के बजाय पाकिस्तान की करतूतों पर एक पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन देना चाहिए। बल्कि उड़ी हमले के बाद लाजिमी तो यही है कि उस बैठक में खुद प्रधानमंत्री जाएं और अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलें। उन्हें ओबामा से मिलकर वैसा ही रुख अपनाना चाहिए, जैसे 1971 में इंदिरा गांधी ने रूस के प्रति अपनाया था। पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले इंदिरा गांधी ने रूस से दोटूक कहा था कि अगर वह भारत के पक्ष में नहीं होगा, तो उसे दोस्ती गंवाने के लिए तैयार रहना चाहिए।

हमें इसी तरह अमेरिका की दुम मरोड़ने का काम करना चाहिए। यह तब होगा, जब हम अमेरिका के साथ कारोबार घटाएंगे। अमेरिका हमारे साथ व्यापार कर कमाता है, और पाकिस्तान को मदद देता है। हम अमेरिका को यह कह सकते हैं कि अगर आप पाकिस्तान को मदद देते रहेंगे, तब हम आपके साथ व्यापार नहीं करेंगे और रक्षा खरीद समेत दूसरे मामलों में रूस के साथ जाएंगे। दुनिया के दूसरे बड़े देशों के साथ भी हमारा यही रवैया हो। फ्रांस के साथ राफेल डील होनी है। हम फ्रांस पर दबाव बना सकते हैं कि हम यह डील तभी फाइनल करेंगे, जब आप पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई के पक्ष में हमारे साथ होंगे। हम यूरोपीय संघ से भी कह सकते हैं कि आपके साथ व्यापार हम तभी करेंगे, जब आप पाकिस्तान से अनाज, कपड़े आदि लेना बंद करेंगे।

पाकिस्तान के खिलाफ हम क्या कर सकते हैं? तात्कालिक तौर पर हमें पाक अधिकृत कश्मीर स्थित आतंकवादी शिविरों को निशाना बनाना चाहिए। इससे नहीं डरना चाहिए कि पाकिस्तान परमाणु युद्ध की धमकी दे रहा है। याद कीजिए, जब कारगिल का युद्ध हुआ था, तब भी दोनों देश परमाणु शक्तिसंपन्न थे। इसी तरह पाक-चीन आर्थिक कॉरिडोर को अस्थिर करने की मुहिम छेड़नी चाहिए। बलूच लोगों ने पहले से ही इस कॉरिडोर के खिलाफ आवाज उठाई है। स्थिति बिगड़ने पर चीन इस परियोजना से हाथ खींच सकता है। ऐसे ही दुनिया भर में यह प्रचारित करना चाहिए कि सियाचिन की बर्फ में जिन पाकिस्तानी सैनिकों की नाक हम पहले ही रगड़ चुके हैं, वे हमारा मुकाबला क्या करेंगे? सिंधु जल समझौते को भी तोड़ देना चाहिए। इससे पाकिस्तान में कपास और बासमती की फसल बर्बाद होगी। नई दिल्ली स्थित पाक उच्चायुक्त को वापस भेजने पर भी विचार करना चाहिए। यहां वे हुर्रियत और पाकपरस्त नेताओं से मिलने के अलावा और करते क्या हैं! पाकिस्तान से यदि हम रिश्ता न रखें, तो इससे हमारा कुछ नुकसान होने वाला नहीं है। ऐसे ही दीर्घावधि में हमें चीन पर भी दबाव बनाना चाहिए कि यदि पाकिस्तान से उसकी नजदीकी इसी तरह कायम रही, तो हम उससे व्यापार रोक सकते हैं। दुनिया में पाकिस्तान को अलग-थलग करने की नीति पर चलना होगा।
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उड़ी में हुआ भीषण आत्मघाती हमला पाकिस्तान की साजिश का एक और नमूना है। पिछले करीब दो-ढाई दशकों से पाकिस्तान सिर्फ और सिर्फ कश्मीर के मुद्दे पर चल रहा है। पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ अब तक हर मोर्चे पर विफल रहे हैं। कश्मीर मुद्दे को हवा देकर ही वह अपनी गद्दी बचाए रख सकते हैं। नवाज जानते हैं कि अगर वह अपनी भूमिका में जरा भी चूके, तो सेना इमरान खान को प्रधानमंत्री बनाने में तनिक नहीं हिचकेगी। इस दबाव ने ही नवाज को कश्मीर मुद्दे पर आक्रामक बनाया है। चूंकि इसी समय संयुक्त राष्ट्र में नवाज शरीफ को भाषण भी देना है, इसलिए इस्लामाबाद न केवल कश्मीर मुद्दे को जिलाए रखना चाहता है, बल्कि घाटी में आतंकी हमलों के जवाब में भारत अगर जवाब में कुछ करता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई दिल्ली को घेरने का मौका भी मिल जाएगा। हमारे पड़ोसी देश का एजेंडा है कि कश्मीर की आग को बुझने नहीं देना है।

चूंकि यह मौसम आतंकवादियों की घुसपैठ का है, तथा कुछ और आतंकी समूहों के सीमा पार कर इस ओर घुसने की सूचना है, ऐसे में, आतंकी हमला अभी रुकने वाला नहीं है। बहुत संभव है कि जल्दी ही एक और आतंकी हमला हो। पाकिस्तान यही चाहता है कि आतंकी हमलों के जवाब में भारत कुछ करे, तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को पीड़ित बताते हुए वह कूटनीतिक लाभ उठाए। जब भारत ने दूसरी बार परमाणु परीक्षण किया था, तब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ही थे। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने यही तर्क दिया था कि भारत के परमाणु परीक्षण करने के बाद अब हमारे सामने परमाणु परीक्षण के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है, क्योंकि परमाणु शक्तिसंपन्न भारत हम पर हमला न भी करे, तो हमें दबाएगा।

जहां तक हमारी सरकार का सवाल है, तो उसे उड़ी में हुए हमले के बाद कठोरता दिखानी होगी। मतदाताओं ने करीब ढाई साल पहले नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को इसलिए सत्ता सौंपी थी कि वह आतंकवाद के खिलाफ सख्ती दिखाएंगे। पर वह सख्ती नहीं दिखा रही। नरेंद्र मोदी कभी नवाज शरीफ की मां के पांव छूते हैं, तो कभी श्रीनगर में महबूबा मुफ्ती का समर्थन करने लगते हैं। जनता ने उन्हें इसलिए वोट नहीं दिया था। म्यांमार और भूटान के खिलाफ सख्ती दिखाने से काम नहीं चलेगा। यह सख्ती उन्हें पाकिस्तान के खिलाफ दिखानी पड़ेगी, जिसका उन्होंने वायदा किया था।

सवाल यह है कि पाक प्रायोजित आतंकवादी हमलों के बाद भारत को क्या करना चाहिए। पहली बात यह कि हमारी सरकार आतंकी हमलों में पाकिस्तान के हाथ होने के सबूत इस्लामाबाद को दिखाना बंद करे। इस पर पाकिस्तान को न तो शर्म आती है, न ही वह कोई कार्रवाई करेगा। पठानकोट हमले के सबूत उसे सौंपे गए। पाकिस्तान से जांच दल पठानकोट आया। नतीजा क्या निकला? पाकिस्तान को सबूत दिखाने से उसे बचाव के रास्ते बनाने में ही मदद मिलेगी। इसके बजाय ये तमाम सबूत हमें अंतरराष्ट्रीय समुदाय को दिखाने चाहिए। अभी न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र की महासभा है। वहां कश्मीर पर भाषण होते हैं, तो सदस्य देश जमुहाई लेने लगते हैं। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को वहां भाषण देने के बजाय पाकिस्तान की करतूतों पर एक पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन देना चाहिए। बल्कि उड़ी हमले के बाद लाजिमी तो यही है कि उस बैठक में खुद प्रधानमंत्री जाएं और अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलें। उन्हें ओबामा से मिलकर वैसा ही रुख अपनाना चाहिए, जैसे 1971 में इंदिरा गांधी ने रूस के प्रति अपनाया था। पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले इंदिरा गांधी ने रूस से दोटूक कहा था कि अगर वह भारत के पक्ष में नहीं होगा, तो उसे दोस्ती गंवाने के लिए तैयार रहना चाहिए।

हमें इसी तरह अमेरिका की दुम मरोड़ने का काम करना चाहिए। यह तब होगा, जब हम अमेरिका के साथ कारोबार घटाएंगे। अमेरिका हमारे साथ व्यापार कर कमाता है, और पाकिस्तान को मदद देता है। हम अमेरिका को यह कह सकते हैं कि अगर आप पाकिस्तान को मदद देते रहेंगे, तब हम आपके साथ व्यापार नहीं करेंगे और रक्षा खरीद समेत दूसरे मामलों में रूस के साथ जाएंगे। दुनिया के दूसरे बड़े देशों के साथ भी हमारा यही रवैया हो। फ्रांस के साथ राफेल डील होनी है। हम फ्रांस पर दबाव बना सकते हैं कि हम यह डील तभी फाइनल करेंगे, जब आप पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई के पक्ष में हमारे साथ होंगे। हम यूरोपीय संघ से भी कह सकते हैं कि आपके साथ व्यापार हम तभी करेंगे, जब आप पाकिस्तान से अनाज, कपड़े आदि लेना बंद करेंगे।

पाकिस्तान के खिलाफ हम क्या कर सकते हैं? तात्कालिक तौर पर हमें पाक अधिकृत कश्मीर स्थित आतंकवादी शिविरों को निशाना बनाना चाहिए। इससे नहीं डरना चाहिए कि पाकिस्तान परमाणु युद्ध की धमकी दे रहा है। याद कीजिए, जब कारगिल का युद्ध हुआ था, तब भी दोनों देश परमाणु शक्तिसंपन्न थे। इसी तरह पाक-चीन आर्थिक कॉरिडोर को अस्थिर करने की मुहिम छेड़नी चाहिए। बलूच लोगों ने पहले से ही इस कॉरिडोर के खिलाफ आवाज उठाई है। स्थिति बिगड़ने पर चीन इस परियोजना से हाथ खींच सकता है। ऐसे ही दुनिया भर में यह प्रचारित करना चाहिए कि सियाचिन की बर्फ में जिन पाकिस्तानी सैनिकों की नाक हम पहले ही रगड़ चुके हैं, वे हमारा मुकाबला क्या करेंगे? सिंधु जल समझौते को भी तोड़ देना चाहिए। इससे पाकिस्तान में कपास और बासमती की फसल बर्बाद होगी। नई दिल्ली स्थित पाक उच्चायुक्त को वापस भेजने पर भी विचार करना चाहिए। यहां वे हुर्रियत और पाकपरस्त नेताओं से मिलने के अलावा और करते क्या हैं! पाकिस्तान से यदि हम रिश्ता न रखें, तो इससे हमारा कुछ नुकसान होने वाला नहीं है। ऐसे ही दीर्घावधि में हमें चीन पर भी दबाव बनाना चाहिए कि यदि पाकिस्तान से उसकी नजदीकी इसी तरह कायम रही, तो हम उससे व्यापार रोक सकते हैं। दुनिया में पाकिस्तान को अलग-थलग करने की नीति पर चलना होगा।
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