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कोशिशों में नाकाम होती सरकार

Mon, 17 Feb 2014 07:38 PM IST
नारायण कृष्णमूर्ति
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इस तथ्य से सभी अवगत हैं कि लेखानुदान हो या अंतरिम बजट, इसका महत्व महज प्रक्रियागत औपचारिकता तक सीमित है। लेकिन यूपीए-दो, खासकर कांग्रेस के लिए यह आखिरी मौका था, जिसमें वह उपलब्धियों का बखान करते हुए अपनी पीठ ठोक सकती थी। इसीलिए भले ही संसद में तेलंगाना का मुद्दा छाया हुआ हो, पी. चिदंबरम ने केवल यूपीए-दो की बात नहीं की।
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उन्होंने राजनीतिक चतुराई दिखाते हुए यूपीए के दस गौरवमयी वर्षों का बखान किया। वजह, पिछले पांच वर्षों में ऐसा कुछ था नहीं, जिसका वह उल्लेख कर पाते। आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की संभावनाओं को बेहतर बनाने के लिए इस अंतरिम बजट का उपयोग किया जा सकता था। पर दुर्भाग्य से वित्त मंत्री वह करिश्मा नहीं दोहरा सके, जो यूपीए-एक के कार्यकाल के अंत में उन्होंने दिखाया था। तब किसानों के लिए कर्ज माफी की घोषणा की गई थी, जिसका फायदा कांग्रेस को ज्यादा सीटों के तौर पर मिला था।

अगर दस वर्ष पहले की स्थिति पर गौर फरमाएं, तो यूपीए के पहले कार्यकाल में जहां आर्थिक विकास की दर मजबूत थी, वहीं शेयर बाजार भी अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे। लेकिन इसके दूसरे कार्यकाल में अर्थव्यवस्था का आलम पूरी तरह बदला नजर आ रहा है। नीची विकास दर, ऊंची ब्याज दरें, विस्मयकारी ढंग से बढ़ता घाटा और एक कमजोर मुद्रा-सब मिलकर मानो देश की बीमार आर्थिक व्यवस्था की दुहाई दे रहे हैं। जो सूचकांक 2004 में तकरीबन 5,000 पर था, 2014 में 21,000 तक जा पहुंचा है।
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दरअसल, जब वाम दलों के समर्थन से पहली बार यूपीए सरकार बनी थी, शेयर बाजार में तेज गिरावट देखने को मिली। मई, 2004 में सूचकांक में 10 फीसदी से ज्यादा की गिरावट हुई थी। इसी के चलते दो बार शेयर बाजार के कामकाज तक को रोकना पड़ा था। 2004 के वित्तीय वर्ष में विकास दर 8.5 प्रतिशत थी, जो 2003 की विकास दर (4.3 प्रतिशत) की दोगुनी थी। इसके बाद 2006 से 2008 तक लगातार तीन वर्षों तक यह नौ प्रतिशत से ज्यादा बनी रही। वैश्विक मंदी के दौर में यह 6.7 प्रतिशत तक गिरी। लेकिन अर्थव्यवस्था ने वापसी की और 2010 और 2011 में यह दर क्रमशः 8.6 और 9.3 प्रतिशत रही। लेकिन इसके बाद 2012 में यह 6.2 प्रतिशत और 2013  में पांच प्रतिशत तक पहुंच गई।

अगर तमाम घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों की बात नहीं भी की जाए, तो कहा जा सकता है कि दूसरे कार्यकाल में महंगाई ने यूपीए की रातों की नींद उड़ा कर रख दी। तमाम अर्थशास्त्री महंगाई और लगातार बढ़ते घाटे के लिए सरकार के उन फैसलों को जिम्मेदार मान रहे हैं, जो उसने 2009 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले लिए थे, और जिनका ताल्लुक मनरेगा जैसी ग्रामीण कल्याण योजनाओं और किसानों की कर्ज माफी से है। बढ़ती महंगाई को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक के पास ब्याज दरों को ऊंचा रखने के सिवाय कोई चारा ही नहीं था। भारतीय रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर डी. सुब्बाराव ने 2010 से 2012 के बीच 13 बार महत्वपूर्ण दरों में बदलाव किया, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।

हालांकि बढ़ती महंगाई के लिए वैश्विक कारक भी कम जिम्मेदार नहीं थे। दरअसल विकसित देशों की अर्थव्यवस्था की सुस्त हालत से निपटने के लिए दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने तरलता में इजाफा किया। इसकी वजह से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में पूंजी का प्रवाह बढ़ता गया। नतीजतन इन देशों में सोना और कच्चे तेल जैसी कमोडिटी के दाम बढ़ने लगे। ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत इन दोनों का बड़ा आयातक है।

यूपीए सरकार पर नीतिगत जड़ता के आरोप भी लगते रहे हैं। लेकिन चिदंबरम ने अपने बजट भाषण में इस आरोप को पूरी तरह खारिज किया। उनके मुताबिक, व्यापार चक्र की तरह किसी अर्थव्यवस्था में विकास दर के झुकाव को इंगित करने वाला एक चक्र होता है। चिदंबरम की मानें, तो पिछले तैंतीस वर्षों में भारत की विकास दर के संदर्भ में यह झुकाव 6.2 प्रतिशत रहा है। 1999 से 2004 के बीच सकल घरेलू उत्पाद की औसत सालाना विकास दर (5.9 प्रतिशत) इससे कम रही।  लेकिन अगले पांच वर्षों में यानी 2004 से 2009 के बीच यह 8.4 प्रतिशत थी, जबकि केंद्रीय सांख्यिकीय संगठन की मानें, तो 2009 से 2014 के बीच यह 6.6 प्रतिशत तक रहेगी।

चिदंबरम के इन तर्कों के बावजूद यह कहना होगा कि पिछले पांच वर्षों में सरकार नीतिगत लकवे से ग्रस्त रही है। हालांकि बीते एक वर्ष में सरकार ने कुछ कदम भी उठाए हैं, जिनके फायदे भी अब दिखने शुरू हुए हैं।

यूपीए-एक और दो ने कर-सुधार की दिशा में जो सबसे महत्वपूर्ण सुधार किया, वह है, प्रत्यक्ष कर संहिता को प्रस्तावित करना। इसके अलावा वस्तु एवं सेवा कर की दिशा में भी इसने प्रयास किए हैं। कर-सुधार के संदर्भ में यह सबसे बड़ी पहल कही जा सकती है। नागरिकों का एक राष्ट्रीय डाटाबेस तैयार करने की मुहिम में जुटा महत्वाकांक्षी कार्यक्रम 'आधार' मजबूती के साथ अपनी जड़ें जमा रहा है। इसके अलावा मनरेगा, खाद्य सुरक्षा कानून, पेंशन फंड नियामक अधिनियम और नया कंपनी अधिनियम, ऐसी ही कुछ सार्थक पहलों के उदाहरण हैं।

चिदंबरम कहते हैं, 'यूपीए के पिछले दस वर्षों के शासन की परख इतिहास पर छोड़ देनी चाहिए।' पर मुझे लगता है कि यूपीए का शासन नाकामयाबियों और कोशिशों का कार्यकाल रहा। दुनिया में हो रहे आर्थिक बदलावों से तारतम्य बैठाने की कोशिशें इस सरकार ने की। हां, इस दौरान भ्रष्टाचार के जो आरोप लगे, उस पर भी इतिहास की नजर रहेगी। वैसे कहना गलत नहीं कि यूपीए-दो ने अपनी कुर्सी बचाने के अलावा भी काफी कुछ किया है। इसने आगामी सरकार के लिए एक एजेंडा तो तय जरूर कर दिया है।
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