जाहिर है, इसका भारत समेत दुनिया की विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ना निश्चित है। कुछ अमेरिकी अर्थशास्त्रियों का मानना है कि कोविड के प्रभाव से अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए अमेरिकी सरकार द्वारा सहायता पैकेज देने के कारण देश में मांग में वृद्धि तो हुई, लेकिन आपूर्ति बाधित होने के कारण वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि देखने को मिल रही है। बढ़ती महंगाई के कारण मजदूरी दरों में भी वृद्धि हो रही है, जिसके कारण लागत में वृद्धि महंगाई को और अधिक बढ़ाने का काम कर रही है। अमेरिकी नीति निर्माता इसका ठीकरा आपूर्ति-शृंखला समस्याओं और कच्चे माल की कमी पर फोड़ने को प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अधिकांश अर्थशास्त्री मुद्रा की बढ़ती आपूर्ति को इसका मुख्य
कारण बता रहे हैं। माना जा रहा है कि महंगाई से जल्द ही कोई राहत मिलने वाली नहीं है।
अमेरिका में कई नीति निर्माताओं का कहना है कि कीमत नियंत्रण से महंगाई को रोका जा सकता है। लेकिन इसका एक नुकसान यह होता है कि उत्पादकों का अधिक उत्पादन हेतु प्रोत्साहन कम हो जाता है। आशंका यह है कि इसके कारण उपभोक्ताओं को वस्तुओं की कमी से जूझना पड़ सकता है। अमेरिका के नीति निर्माता अपनी पूर्व की गलती पर पर्दा डालने के लिए तरह-तरह के तर्क दे रहे हैं, और वह गलती है मुद्रा का जरूरत से ज्यादा विस्तार। इतिहास गवाह है कि महंगाई का मुख्य कारण मुद्रा का विस्तार ही होता है।
अमेरिकी नीति निर्माता भी मानते हैं कि अमेरिका में लोगों के पास भारी बचत शेष है और कोविड के दौरान जो वस्तुएं या सुविधाएं वे नहीं खरीद पाए, उसकी अब भरपाई करना चाहते हैं। लेकिन समझना होगा कि लोगों के पास बचत का असली कारण सरकार द्वारा भारी मात्रा में आर्थिक सहायताओं का वितरण है।
कोविड संकट के दौरान सीमित आमदनी के कारण सरकार द्वारा करेंसी की मात्रा में वृद्धि की गई, जिसके कारण मुद्रा प्रवाह में बड़ी वृद्धि से महंगाई में वृद्धि अवश्यंभावी हो गई है। अमेरिकी सरकार द्वारा अतिरिक्त मुद्रा का सृजन करते हुए सरकारी सहायताएं देना कोई नई बात नहीं है, लेकिन पिछले कुछ समय से डॉलर की वैश्विक लोकप्रियता में कुछ कमी आई है, जिसका स्थान चीन की मुद्रा युआन ले रहा है। ऐसे में अमेरिका के बाहर डॉलर की आपूर्ति कम हो रही है। लगता है कि भविष्य में यदि युआन के प्रति आकर्षण की यह प्रवृत्ति जारी रही, तो अमेरिका में बढ़ती मुद्रा की आपूर्ति भविष्य में भी महंगाई का कारण बनती रहेगी। जहां तक अमेरिका की बढ़ती महंगाई का भारत पर असर पड़ने की बात है, तो भारत और भारतीय जो कुछ भी अमेरिका से आयात करते हैं, वह सब कुछ महंगा हो जाएगा, क्योंकि वैश्विक स्तर पर कीमतें बढ़ने से आयातित मुद्रास्फीति ज्यादा होती है। अमेरिका की उच्च मुद्रास्फीति उसके केंद्रीय बैंक को नरम मौद्रिक नीति को त्यागने के लिए बाध्य करेगी, जिससे वहां ब्याज दर बढ़ेगी।
यह भारतीय अर्थव्यवस्था को दो तरीके से प्रभावित करेगा। एक तो, जो भारतीय कंपनियां देश से बाहर पैसा जुटाने की कोशिश कर रही हैं, उनके लिए ऐसा करना महंगा हो जाएगा, क्योंकि अमेरिकी निवेशक अमेरिका में ही निवेश करना चाहेंगे। दूसरे, रिजर्व बैंक को घरेलू स्तर पर अपनी ब्याज दरें बढ़ाकर अपनी मौद्रिक नीति में तालमेल बिठाना होगा। बदले में इससे मुद्रास्फीति बढ़ सकती है, क्योंकि उत्पादन लागत बढ़ जाएगी।