इन दिनों अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी चौथी रणनीतिक वार्ता के लिए भारत आए हुए हैं। दोनों देशों के बीच वार्ता-प्रक्रिया की शुरुआत चार वर्ष पहले पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने की थी। ओबामा की पहली पारी के दौरान ऊर्जा एवं पर्यावरण, रक्षा एवं सुरक्षा, व्यापार एवं निवेश, अंतरिक्ष एवं साइबर सुरक्षा, आतंकी एवं आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के संबंध बेहतर हुए थे। हालांकि इस वर्ष जनवरी में जब ओबामा ने अपनी दूसरी पारी शुरू की, तो आम धारणा थी कि दोनों देशों के संबंधों में गर्मजोशी खत्म हो रही है।
भारतीय आर्थिक सुधारों में सुस्ती, अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार की धीमी गति, भारत के जवाबदेही अधिनियम की वजह से 123 असैन्य परमाणु सहयोग संबंधी समझौतों के क्रियान्वयन में देरी, परमाणु आपूर्ति समूह के विस्तार एवं मिसाइल टेक्नोलॉजी एवं अन्य परमाणु अप्रसार संगठनों में भारत को शामिल करने में कोई खास प्रगति नहीं होने, अफगानिस्तान से अपनी सेना को हटाने का अमेरिकी फैसला और कई अन्य कारण हैं, जिसकी वजह से ऐसी आम धारणा बन गई कि भारत-अमेरिका के बीच उभरते रिश्ते का उत्साह खत्म हो गया है। इन तमाम घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में जॉन केरी दिल्ली पहुंचे हैं।
भारत में केरी आम तौर पर पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति रखने वाले अमेरिकी उच्चाधिकारी के रूप में जाने जाते हैं। हालांकि ऐसी धारणाओं का कोई मतलब नहीं है। केरी वही करेंगे, जो अमेरिका के हित में होगा, न कि पाकिस्तान के। सबसे महत्वपूर्ण है कि उन्होंने पहले भारत की यात्रा का फैसला किया, संभवतः वह पाकिस्तान का दौरा अगले महीने करेंगे। विदेश मंत्री के रूप में यह उनकी पहली भारत यात्रा है, लेकिन भारत उनके लिए अनजाना नहीं है।
वह न केवल अमेरिकी सांसद के तौर पर भारत आते रहे हैं, बल्कि भारत-अमेरिका के बीच 123 समझौते से संबंधित विधेयक पारित होने के समय में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके भारत दौरे का उद्देश्य दोनों देशों के बीच रणनीतिक भागीदारी को गति देना है। दिल्ली पहुंचने के बाद नीति संबंधी अपने पहले भाषण में उन्होंने साफ संकेत दिया कि ओबामा प्रशासन दूसरी पारी में पर्यावरण एवं ऊर्जा, व्यापार एवं निवेश, रक्षा एवं सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भारत के साथ सहयोग बढ़ाना चाहता है।
उनके भाषण से ऐसा लगा कि वह अफगानिस्तान के भविष्य और उसमें भारत की भूमिका को लेकर यहां चल रही अटकलों पर विराम लगाना चाहते हैं। भारत में इसको लेकर भारी चिंता है कि तालिबान फिर अफगानिस्तान में सत्ता में लौट आएगा। और अगर ऐसा हुआ, तो वहां भारत द्वारा किए गए पर्याप्त निवेश का खतरे में पड़ना स्वाभाविक है।
अफगान मुद्दे पर व्यापक चर्चा करते हुए केरी ने भारत की सिविल सोसायटी को आश्वस्त करना चाहा कि 2014 में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाओं की वापसी के बाद भी अमेरिका लगातार वहां मौजूदगी बनाए रखेगा और यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि अफगानिस्तान उस दौर में न लौटे, जब वह अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों का एक बड़ा केंद्र बन गया था। उन्होंने शांति प्रक्रिया में भारत की संभावित भूमिका का संकेत किए बिना अफगानिस्तान के भविष्य में भारत की भूमिका को प्रोत्साहित किया।
सच्चाई यह है कि शांति प्रक्रिया में पाकिस्तान विशेषाधिकार रखना चाहता है और भारत को इससे अलग रखना चाहता है। इसलिए कतर शांति प्रक्रिया में भारत की भागीदारी को प्रोत्साहित करने की केरी की क्षमता संदिग्ध लगती है। लेकिन इसमें भारत की ओर से भी समस्या है। भारत तालिबान से उलझना नहीं चाहता, ऐसे में भला भारत कैसे अफगान शांति प्रक्रिया में अपनी भूमिका चाहता है!
इसके अलावा भारत को पाकिस्तान के नए नेतृत्व के साथ रचनात्मक संबंध बनाने का केरी का खुला संदेश उनकी महत्वाकांक्षी सोच को जाहिर करता है। इस समय पाकिस्तान एवं अमेरिका, दोनों अफगानिस्तान से अमेरिका की रणनीतिक वापसी के लिए पाकिस्तानी सहयोग की शर्त के तौर पर भारत-पाक सीमा पर शांति चाहते हैं। यही वजह है कि केरी ने भारत विरोधी आतंकी संगठनों एवं पाकिस्तान में उनकी गतिविधियों के बारे में कुछ नहीं कहा। नवाज शरीफ से बातचीत तभी सार्थक हो सकेगी, जब वह ऐसे समूहों को नियंत्रित करने में कामयाब हो जाएंगे।
उन्होंने जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने में भारत-चीन-अमेरिका के सहयोग को छोड़कर चीन के बारे में भी कुछ नहीं कहा। भारत सहित अपने अन्य पड़ोसी देशों के साथ क्षेत्रीय मुद्दों को लेकर चीन की आक्रामकता पर उन्होंने कोई गंभीर टिप्पणी नहीं की, ताकि भारत व अन्य देश आश्वस्त हो सकें।
इस प्रकार तीन महत्वपूर्ण सुरक्षा मुद्दों पर केरी के संदेश का खास मतलब नहीं है। लेकिन भारत-प्रशांत क्षेत्र में व्यापार एवं निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए सहयोग, एशिया में शक्ति-संतुलन की वाशिंगटन की रणनीति में भारत को जगह एवं पर्यावरण एवं ऊर्जा सुरक्षा जैसे मसलों पर द्विपक्षीय सहयोग जैसे मुद्दों पर जॉन केरी ने सशक्त भाषण दिया। पर वह इसके प्रति सजग थे कि भारत के साथ अमेरिकी रिश्ते का अर्थ किसी अन्य देश के लिए आलोचना नहीं है।
जाहिर है, उन्होंने पाकिस्तान या चीन का नाम नहीं लिया, पर अमेरिका के इस रुख पर भारत को चिंतित होने की जरूरत नहीं है। भारत ने जोर देकर कहा ही कि अमेरिका के साथ रणनीतिक भागीदारी का लक्ष्य कोई तीसरा देश नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें, तो ओबामा प्रशासन की दूसरी पारी में भारत-अमेरिका रणनीतिक भागीदारी के तहत रक्षा एवं सुरक्षा जैसे मुद्दों की तुलना में पर्यावरण एवं ऊर्जा जैसे क्षेत्रों पर ही ज्यादा ध्यान दिया जाएगा।