इस देश में कुछ धर्म की, तो कुछ भ्रम की भरमार है। एक राजधर्म है, जिसका आशय स्पष्ट है। राज्य की नजर में हर धर्म बराबर है। सत्ता धर्म-निरपेक्ष है। इस से उलट, हमने मुल्क में एक सुविधाजनक धर्म ईजाद किया है। इसे सेक्यूलर कहते हैं।
यदि कोई हिंदू है, तो उसे साबित करना पड़ेगा कि वह सेक्यूलर भी है, वर्ना बहुसंख्यक होने के नाते कोई यह न समझ ले कि वह सांप्रदायिक है। अब कोई घर से निकलते ही सेक्यूलर-सेक्यूलर चिल्लाने से तो रहा। बाजार या सरकार कोई सेक्यूलर टोपी क्यों नहीं ईजाद करती? इसे लगाकर कोई निकले, तो उस पर औपचारिक रूप से सेक्यूलर होने का ठप्पा लगे। हमारे सियासी नेता यही करते हैं।
मंच पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण का ढिंढोरा पीटा। घर आकर ज्योतिषी से प्रधानमंत्री बनने की संभावनाओं की खोजबीन करने लगे। एक अन्य प्रचलित और लोकप्रिय युग-धर्म भी है। हर छोटा-बड़ा सरकारी या गैर सरकारी कल-पुर्जा इसका मन से मुरीद है। इसका प्रवर्तक जरूर कोई महान युगपुरुष होगा। उसने गंभीर चिंतन-मनन से पाया कि भले कोई लंका का वासी हो या अयोध्या का, सबकी समान प्रवृत्ति लोभ और लालच है।
कहीं संयमित और संतुलित है, तो कहीं अनियंत्रित। कुछ इससे ऐसे प्रेरित हैं कि वह पद के अधिकार को भ्रष्टाचार का अधिकार समझते हैं। जानकारों की मौलिक खोज है कि ऐसे आदमी और कुत्ते में कोई अंतर नहीं है। दुम हिलवानी है, तो हड्डी फेंको। जिसके दुम है, वह उसे हिलाएगा, जिसके नहीं है, वह जुबान। कामयाबी पाने की अनिवार्य शर्त आज हड्डी को सही स्थान पर पहुंचाने की काबिलियत है।
एक इंसान का निजी धर्म भी है, जो युगधर्म के सम्मुख बौना है। उसे कोई नहीं पूछता है। बाहर व्यक्ति भ्रष्टता के युग-धर्म का समर्पित साधक है, तो घर में निजी का। बाहर लेन-देन की दक्षता है, घर में दिखावे की धर्मभीरुता। जिसका भ्रष्टाचार का कारोबार जितना सफल है, उतना ही उसके घर में शानदार पूजाघर भी।
यह भ्रम का भस्मासुर हमारी अनूठी जीवन शैली के हर विरोधाभास का जनक है। हमने सुभीते के चक्कर में धर्म को गड्ड-मड्ड कर दिया है। उसूल वह थूक है, जिसे हम बोलते वक्त उड़ाते हैं, आदर्श पिकासो का वह प्रिंट है, जिसे हम ड्राइंगरूम में सजाते हैं। यह सब प्रदर्शन के लिए है, अनुपालन के लिए नहीं। मौकापरस्ती ही आज के कापुरुषों का वास्तविक धर्म है।