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ट्रंप और बिडेन दोनों के लिए अहम है भारत, नफा-नुकसान का गणित समझा रहे हैं सुरेंद्र कुमार

सुरेंद्र कुमार
Updated Tue, 06 Oct 2020 02:52 AM IST
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डोनाल्ड ट्रंप-जो बिडेन (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

भारत का कोई प्रमुख नेता अगर 1970 और 1980 के दशक में संसदीय चुनाव हार जाता था, तो वह इसके पीछे 'विदेशी हाथ' होने का आरोप लगाता था, जिसका मतलब अनिवार्य रूप से अमेरिका की सीआईए से होता था। और अनेक भारतीय इन आरोपों को सही मान लेते थे।



आखिरकार लोकतांत्रिक रूप से चुने गए चिली के राष्ट्रपति सल्वाडोर अलेंदे को उखाड़ फेंकने में सीआईए की भूमिका तो थी ही। लेकिन वह अकेला मामला नहीं था, उसने कई अन्य देशों में भी ऐसा किया। लेकिन देखिए कि समय कैसे बदलता है कि दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार खुलेआम आगामी चुनाव में विदेशी हस्तक्षेप की आशंका जता रहे हैं।


जहां राष्ट्रपति ट्रंप का दावा है कि चीन एवं ईरान उन्हें राष्ट्रपति का चुनाव हारते हुए देखना चाहते हैं, वहीं डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर अरोप लगा रहे हैं कि वह जॉय बिडेन के अगले राष्ट्रपति बनने की संभावना को खत्म करना चाहते हैं।


दिलचस्प बात यह है कि 30 सितंबर को पहली राष्ट्रपति पद की बहस (प्रसिडेंशियल डिबेट) देखने के बाद, जिसमें दोनों उम्मीदवारों ने एक दूसरे के खिलाफ व्यक्तिगत हमले किए और बहुत ही असभ्य भाषा का प्रयोग किया, भारत के हंगामा करने वाले और एक-दूसरे का चरित्र हनन करने वाले नेता सभ्य और शालीन लगते हैं!


पारंपरिक रूप से हिस्पैनिक, अफ्रीकी-अमेरिकी और इस्राइली मतदाताओं को उनके संख्या बल के आधार पर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों द्वारा सम्मान दिया जाता है, जो उनके भाग्य को बदल सकते हैं। पर अब भारतीय-अमेरिकी समुदाय इस स्थिति में आ गया है। पहली बार राष्ट्रपति पद के दोनों उम्मीदवार भारतीय-अमेरिकी समुदाय को लुभाने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं!


एसोसिएशन ऑफ अमेरिकन फिजिशियंस ऑफ इंडियन ओरिजिन (एएपीआई) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, सबसे ज्यादा यह समुदाय कैलिफोर्निया, टेक्सास और न्यूजर्सी में है। कैलिफोर्निया और न्यूजर्सी में रहने वाले ज्यादातर भारतीय-अमेरिकी डेमोक्रेट को वोट देते हैं, जबकि टेक्सास में रहने वाले रिपब्लिकन को।


एएपीआई का सर्वे बताता है कि अगले महीने होने वाले चुनाव में उनमें से 65 फीसदी के जॉय बिडेन को वोट देने की संभावना है, जबकि 28 फीसदी ट्रंप को वोट दे सकते हैं। हालांकि यह एक बड़ा अंतर दिखता है, ट्रंप का समर्थन वर्ष 2016 की तुलना में घटा है।
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फ्लोरिडा, पेंसिलवेनिया और मिशिगन जैसे राज्यों में भारतीय-अमेरिकी समुदाय के वोट अस्थिर हैं, जो दो में से किसी एक उम्मीदवार के पक्ष में संतुलन को झुका सकते हैं, इसलिए दोनों उम्मीदवार उनका समर्थन पाने के लिए जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं। 


भारतीय-अमेरिकी समुदाय के बीच भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से सभी वाकिफ हैं। इसे जानते हुए राष्ट्रपति ट्रंप भारतीय-अमेरिकियों का समर्थन पाने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री के साथ ह्यूस्टन (हाउडी मोदी) एवं अहमदाबाद (नमस्ते ट्रंप) की अपनी तस्वीरों को दिखा रहे हैं, लेकिन भारतीय-अमेरिकी समुदाय उनकी आव्रजन नीतियों से खुश नहीं है, खासकर उनकी एच 1बी एवं एल 1 वीजा के निर्णयों को लेकर, जो भारत की आईटी कंपनियों के विशेषज्ञों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। उनके डर को दूर करने के लिए ट्रंप के प्रचार प्रबंधक हिंदू, सिख, मुस्लिम समुदायों के नेताओं को जोड़ने व उनका समर्थन पाने की कोशिश कर रहे हैं।


डेमोक्रेट उम्मीदवार जॉय बिडेन द्वारा उपराष्ट्रपति पद के लिए कमला हैरिस को चुनने का फैसला मास्टर स्ट्रोक था, यह उन्हें अफ्रीकी-अमेरिकी और भारतीय-अमेरिकी, दोनों समुदायों का प्रिय बनाता है। कमला हैरिस खुद को तमिलनाडु से जुड़ा हुआ बताती रही हैं।


सीनेट में अपने लंबे कार्यकाल के दौरान भारतीय-अमेरिकी समुदाय के समर्थक रहे बिडेन ने हाल ही में गणेश चतुर्थी पर इस समुदाय को कमला के साथ शुभकामनाएं दी हैं। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हालिया भारत-चीन गतिरोध के दौरान ट्रंप और बिडेन, दोनों ने चीन के आक्रामक और विस्तारवादी नीतियों की आलोचना की है।


भारत के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पहली बार डेमोक्रेटिक पार्टी ने एक नीति दस्तावेज जारी किया, जिसमें भारत की भूमिका को रेखांकित किया गया है। उसमें कहा गया है कि 'भारत और अमेरिका के बिना कोई भी साझा वैश्विक चुनौती हल नहीं की जा सकती, जो एक जिम्मेदार साझेदार के रूप में काम कर रहे हैं। 


हम मिलकर भारत की रक्षा और आतंकवाद-विरोधी क्षमताओं को मजबूत करते रहेंगे, स्वास्थ्य प्रणालियों और महामारी की प्रतिक्रिया में सुधार करेंगे और उच्च शिक्षा, अंतरिक्ष खोज और मानवीय राहत जैसे क्षेत्रों में सहयोग को गहरा करेंगे।' डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी के अध्यक्ष थॉमस पेरेज ने स्वीकार किया कि आगामी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में भारतीय-अमेरिकी वोट एक बदलाव ला सकता है।


भारत में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के बारे में एक असहज शांति पसरी हुई है। साउथ ब्लॉक के लोग अपने अनुकूल नतीजे की उम्मीद लगाए बैठे हैं। बिडेन और हैरिस, दोनों जम्मू-कश्मीर की स्थिति को लेकर आलोचनात्मक रहे हैं, खासकर इंटरनेट तक पहुंच नहीं देने, प्रमुख कश्मीरी नेताओं को नजरबंद करने और सीएए के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों तथा अल्पसंख्यक समुदाय से निपटने को लेकर।


लेकिन अगर ये दोनों जीत जाते हैं, तो भारत चीनी आक्रामकता के मद्देनजर 1962 में जेएफ केनेडी द्वारा समय पर सहायता देने तथा मार्च, 2000 में राष्ट्रपति क्लिंटन की यात्रा को रेखांकित करेगा, जो कि भारत-अमेरिका संबंधों में एक महत्वपूर्ण क्षण था।


दूसरी ओर सबसे बड़ा मील का पत्थर भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु करार है, जो रिपब्लिकन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के समय में हुआ था। इसके अलावा ट्रंप-मोदी के प्रगाढ़ रिश्ते भी हैं, हालांकि अफगानिस्तान, पाकिस्तान, ईरान, रूस और व्यापार को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद बरकरार हैं।


जब तक भारत उच्च आर्थिक विकास हासिल करता रहेगा, विदेशी वस्तुओं एवं निवेश के लिए अपने दरवाजे खुले रखेगा और साझा वैश्विक चिंताओं के लिए अपनी आवाज उठाता रहेगा, अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में चाहे कोई भी जीते, वह एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में भारत की तलाश करेगा।

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