कथित हत्यारा उसका पार्टनर राहुल है। पीड़िता गुलशन की पूर्व पति से पैदा हुई साल भर की एक बेटी है और वह राहुल के साथ सहमति संबंधों में थी। पुलिस के मुताबिक, राहुल गुलशन पर किसी और से भी रिश्ते रखने का शक करता था। गुलशन की मौत बहुत कम चर्चित हुई। श्रद्धा की तरह दो और महिलाओं की क्रूर हत्या दिल्ली में हो चुकी है। 1995 में सुशील शर्मा नामक व्यक्ति पर आरोप लगा कि उसने अपनी पत्नी नैना साहनी की गोली मारकर हत्या की, शव के टुकड़े किए, उन्हें कार में रखा और घर से दूर एक होटल के तंदूर में जलाने के लिए ले गया।
जले-अधजले टुकड़े घटनास्थल से बरामद किए गए थे। सुशील शर्मा को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा। तंदूर कांड के नाम से यह केस छाया रहा। 2011 में सुमित हांडा पर अपनी दक्षिण अफ्रीकी मूल की पत्नी निरंजनी पिल्लै की हत्या के बाद लाश के टुकड़े कर फेंकने का आरोप लगा। पुलिस का कहना है कि श्रद्धा और निरंजनी की हत्याओं के पैटर्न में कई साम्य हैं। यह केस अदालत में है।
श्रद्धा की हत्या पर तल्ख और तीखी प्रतिक्रियाएं हो रही हैं। एक पूर्व आईपीएस अधिकारी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को छह पन्नों की चिट्ठी लिखकर 'लव जेहाद' पर रोक की मांग की है। उनका सुझाव है कि उत्तर प्रदेश अवैध धर्मपरिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021 में संशोधन किया जाना चाहिए। वह विवाह, विवाह के वादे, दैहिक संबंधों और लिव-इन, सब पर प्रतिबंध चाहते हैं। मुंबई से एक रिपोर्ट के अनुसार, पहले इंस्टाग्राम पर श्रद्धा के 120 फालोअर थे। अब यह संख्या 5,117 हो गई है।
अधिकतर पोस्टों में श्रद्धा पर नफरत के तीर चलाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि श्रद्धा को घरवालों की मर्जी के खिलाफ आफताब के साथ नहीं जाना चाहिए था। कुछ पोस्टों में टिप्पणी की गई कि श्रद्धा अत्याधुनिक हो गई थी, उसने सहमति संबंध जैसी पश्चिमी बुराई को अपना लिया था। ज्यादातर की राय यह है कि हिंदू होते हुए भी श्रद्धा एक मुसलमान के साथ रही, उसकी बुरी मौत होनी ही थी। रिपोर्ट में बताया गया कि मृतक के विरुद्ध कुछ पोस्ट इतनी घृणापूर्ण हैं कि शिष्टाचार के नाते उन्हें नहीं छापा जा रहा।
सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया जा रहा है कि हिंदू लड़कियां ही क्यों मुसलमानों के जाल में फंस जाती हैं। प्रतिप्रश्न यह निकलता है कि श्रद्धा क्या आफताब की साजिश का शिकार हुई? आफताब के साथ रहने के पीछे भावनात्मक लगाव नहीं था? श्रद्धा की जगह कोई मुसलमान लड़की होती तो उसकी प्रेम कहानी का त्रासद अंत न होता? वैवाहिक हों या सहमति संबंध, हिंसात्मक व्यवहार और अंत को रुग्ण दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता। समस्या दरअसल यह है कि समाज के साथ पुरुष मानसिकता नहीं बदल रही।
पुरुष महिला से परंपरागत प्रतिबद्धताएं आज भी चाहता है, जबकि वह खुद इनसे दूर रहने की आजादी की ललक छोड़ नहीं पाता। अहं का टकराव अनिवार्य हो जाता है। फिल्मों के माध्यम से समझिए। 60-70 साल पहले पत्नी या प्रेमिका कहती थी, मैंने भी सोच लिया साथ निभाने के लिए... तुमको मनाने के लिए, तुम अगर भूल भी जाओ तो ये हक है तुमको, मेरी बात और है मैंने मोहब्बत की है, तुम्हीं मेरे मंदिर तुम्हीं मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो, तुम्हीं देवता हो। लव आज कल में दीपिका पादुकोण के तलाक से इसकी तुलना करिए।
'चरणदासी और श्री चरणशु' का युग समाप्त हो चुका। वह युग हो भी क्यों? बराबर पैसा कमाने और जिम्मेदारियों का भार वहन करने वाली महिला से एकतरफा प्रतिबद्धता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। पत्नी या लिव-इन में रहने वाली महिला से स्थायी आज्ञापालन या सहनशीलता की अपेक्षा करने से पहले सोचना चाहिए कि क्या घरेलू सहायिका के साथ इस तरह का आचरण संभव है। एफएमसीजी और डिस्पोजेबल के दौर में सामाजिक मूल्यों, मान्यताओं, स्त्री-पुरुष संबंधों की शर्तों और कुल मिलाकर मानवीय व्यवहार में परिवर्तन स्वभाविक है।
कानून बनाकर धर्म परिवर्तन पर एक हद तक रोक लगाई जा सकती है। लेकिन 'लव जेहाद' को नहीं रोका जा सकता। बढ़ते शहरीकरण से समाज के बदलने की प्रक्रिया अरसे से चल रही है। विभिन्न प्रकार के सोशल मीडिया से हो रही जानकारियों का विस्फोट सभी वर्जनाओं को तोड़ रहा है। गांव और छोटे कस्बे-शहर युवाओं की महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं। नौकरी के बेहतर मौके बड़े शहरों में ही हैं। यह असंभव है कि एक साथ पढ़ने या नौकरी करने वाले युवा अप्रतिरोध्य यौन आकर्षण से बचकर धर्म और जाति के बंधनों से बंधे रहें।
हिंदुओं की तुलना में मुसलमान लड़कियां अंतरधार्मिक विवाह या सहमति संबंध कम क्यों बनाती हैं? एक बड़ा कारण यह हो सकता है कि ऐतिहासिक कारणों से मुसलमानों में सामाजिक गतिशीलता, शिक्षा का प्रसार और संगठित क्षेत्र में नौकरियां हिंदुओं के मुकाबले कम हैं। एक बात यह भी है कि मुसलमानों में विवाह, परित्यक्ता और विधवा के विवाह की समस्या गंभीर नहीं है। मुसलमानों में दहेज की सामाजिक बुराई आने लगी है, पर दहेज न दे पाने की वजह से लड़कियों के बिनब्याहे पड़े रहने के केस कम मिलते हैं।
भारत में जनसांख्यकीय स्वरूप सामाजिक ताने-बाने को तय कर रहा है। विविधताओं के मामले में भारत की तुलना सिर्फ अमेरिका से की जा सकती है। अमेरिका को 'मेल्टिंग पाट' कहा जाता है। श्वेत नस्लवाद इसे ठंडा नहीं कर पाया। विविधतापूर्ण समाज में शिक्षा का प्रसार, आर्थिक एकीकरण और रोजगार के अवसर बढ़ने से गतिशीलता का विस्तार मन भी बदलता है और चिंतन भी। उसी के अनुरूप परंपरागत वर्जनाएं भी टूटती हैं। हवा के रुख की तरह इसे बदला नहीं जा सकता। संपूर्ण समाज में व्याप्त हिंसा से निजी रिश्ते अछूते नहीं रह सकते।