यह उपलब्धि भारत की तकनीकी प्रगति को तो रेखांकित करती ही है, इससे यह भी पता चलता है कि कैसे एक मजबूत डिजिटल बुनियादी ढांचे ने देश को नकदी-प्रधान से डिजिटल-प्रधान अर्थव्यवस्था की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त किया है। यूपीआई, जिसे 2016 में नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) द्वारा शुरू किया गया था, की कामयाबी को महज आंकड़ों में नहीं, बल्कि उस सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन के रूप में देखना चाहिए, जिसने भारत में बैंकिंग को आम आदमी की जेब में पहुंचा दिया है।
अब गांव का किसान हो, या छोटे शहर का दुकानदार-बैंकों की लंबी कतारों में लगे बिना महज एक मोबाइल एप से भुगतान कर सकता है। जाहिर है कि इससे नकदी पर निर्भरता घटी है, पारदर्शिता बढ़ी है और छोटे कारोबारियों को डिजिटल पहचान भी मिली है। यूपीआई अब भारत में 85 फीसदी डिजिटल लेनदेन और वैश्विक स्तर पर लगभग 50 फीसदी रियल-टाइम डिजिटल भुगतानों को संचालित करता है।
यह आंकड़ा तब और प्रभावशाली हो जाता है, जब हम देखते हैं कि प्रतिदिन होने वाले भुगतानों के मामले में इसने वैश्विक दिग्गज वीजा को भी पीछे छोड़ा हुआ है। यह उपलब्धि केवल नौ वर्ष में हासिल की गई है, जो भारत की तकनीकी नवाचार और कार्यान्वयन की गति को दर्शाती है।
यूपीआई ने शहरी क्षेत्रों के साथ ग्रामीण और छोटे शहरों में भी वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दिया है। जनधन योजना के तहत पचपन करोड़ से अधिक बैंक खातों ने लाखों लोगों को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा है। सस्ती इंटरनेट सुविधा व 5जी नेटवर्क के तेज विस्तार ने भी यूपीआई की पहुंच को व्यापक बनाया है।
यूपीआई का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं, बल्कि यह संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, फ्रांस और मॉरीशस में भी कार्यरत है। अब भारत ब्रिक्स समूह में यूपीआई को एक मानक भुगतान प्रणाली के रूप में पहुंचाने की कोशिश कर रहा है और अगर ऐसा होता है, तो यह वैश्विक डिजिटल नेतृत्व में भारत की स्थिति को और मजबूत करेगा। हालांकि, इस कामयाबी के साथ साइबर सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने और डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देने की चुनौतियां भी हैं, जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता।