भारतीय अर्थव्यवस्था में अनुसंधान एवं विकास (रिसर्च एंड डेवलपमेंट) पर कुल खर्च जीडीपी का मात्र 0.7 प्रतिशत है, वहीं पिछले 25 वर्षों में वैश्विक स्तर पर शोध एवं विकास के खर्चे में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2000 में वैश्विक स्तर पर यह एक हजार अरब डॉलर के बराबर था, जो आज तीन हजार अरब डॉलर के आसपास है। इस निवेश में सबसे अधिक हिस्सा दक्षिण एशियाई देशों का है, जिनकी हिस्सेदारी 40 प्रतिशत की है। उसके बाद उत्तरी अमेरिका, जिसमें अमेरिका व कनाडा का संयुक्त अंशदान 29 प्रतिशत और यूरोप का 21 प्रतिशत का है। सबसे अधिक आश्चर्यचकित चीन ने किया है। वर्ष 2000 तक चीन का अंशदान चार प्रतिशत के आसपास था, जो आज बढ़कर 26 प्रतिशत हो गया है। चीन की अनुसंधान एवं विकास में बढ़ोतरी अपने आपमें साबित करती है कि वह क्यों आज उत्पादन के क्षेत्र में सबसे अग्रणी अर्थव्यवस्था है।
वैश्विक स्तर पर कंपनियां अपने मुनाफे का तकरीबन दो तिहाई हिस्सा वार्षिक स्तर पर रिसर्च एंड डेवलपमेंट में निवेश करती हैं, जबकि भारतीय कंपनियों में यह सिर्फ एक तिहाई हिस्से से कुछ ही ज्यादा है। इसी के चलते वैश्विक पटल पर यह चर्चा है कि अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और चीन ही वैश्विक बागडोर संभालने में सक्षम हैं, क्योंकि इनके यहां पूंजी का अधिकतम निवेश अनुसंधान एवं विकास में किया जाता है।
अमूमन देखा जाता है कि किसी भी उत्पाद का शुरुआती विक्रय मूल्य कंपनी द्वारा बहुत अधिक रखा जाता है तथा उसे एक या दो वर्ष बाद आधे मूल्य पर बेचा जाता है। इसके पीछे का मुख्य आधार यह है कि बड़ी कंपनियां इस तथ्य से अवगत हैं कि उन्हें शुरुआती समय में अपने उत्पाद को धनाढ्य लोगों को ही बेचना है और उन के माध्यम से अपने उत्पाद को एक ब्रांड के रूप में स्थापित भी करना है। वास्तविकता है कि इन कंपनियों द्वारा धनाढ्य लोगों से वसूल किया गया विक्रय मूल्य उत्पादन की लागत का दोगुना होता है और उसी मुनाफे को अनुसंधान एवं विकास में निवेश किया जाता है, ताकि इन्हीं धनाढ्य लोगों के लिए जल्द से जल्द नई श्रेणी के उत्पाद को उपलब्ध करवाया जा सके।
सवाल यह है कि क्या वास्तव में भारतीय कंपनियां नवाचारों को अधिक महत्व नहीं देती हैं? पिछले कुछ वर्षों से इस पक्ष पर भारत में एक नई सोच बड़ी तेजी से आगे बढ़ती दिख रही है, जो साबित कर रही है कि भारत लगातार श्रमिकों की कार्यकुशलता को बढ़ाने के लिए अनुसंधान एवं विकास में अधिक निवेश कर रहा है। विभिन्न कंपनियां जिनमें स्विगी, जोमैटो, इन्फ्रामार्ट, ब्लिंकिट आदि में ऑर्डर दिए जाने के दस मिनट के अंदर ग्राहक के पास उसकी पसंद का उत्पाद कंपनी द्वारा पहुंचा दिया जाता है, निश्चित रूप से यह एक नवाचार के अंतर्गत ही आता है। इन सबके अलावा पिछले तीन-चार दशकों से सफलतापूर्वक संचालित हो रहे मुंबई के टिफिन सिस्टम को भी याद रखना उचित होगा, जो कि भारतीय समाज में अनुसंधान एवं विकास का श्रमिकों में निवेश का एक जीता-जागता उदाहरण है।
भारत विशाल जनसंख्या वाला मुल्क है। भारतीयों की पुरातन समय से यही सोच रही है कि अधिक श्रम संख्या को उपयोग में लाकर कार्य की गति को अधिक विस्तार दिया जा सकता है। उदाहरण के लिए, सड़क निर्माण में नवीनतम तकनीक के बजाय मानव श्रम को प्राथमिकता दी जाती है। निश्चित रूप से इस मानसिकता के पीछे का मुख्य आधार समाज में रोजगार और आर्थिक संसाधनों की उपलब्धता का कम होना है।
एक अन्य आंकड़ा यह है कि विभिन्न देशों में अनुसंधान एवं विकास में सरकारी और निजी क्षेत्र का अंशदान कितना है। इस्राइल में अनुसंधान एवं विकास में निजी क्षेत्र का अंशदान 93 प्रतिशत है, जबकि सरकारी क्षेत्र का अंशदान महज 7 प्रतिशत, वियतनाम में निजी क्षेत्र में 90 प्रतिशत, अमेरिका में लगभग 80 प्रतिशत, वहीं भारत में यह सिर्फ 36 प्रतिशत है। इससे स्पष्ट है कि भारत में अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में बागडोर आज भी सरकार के हाथ में है। बावजूद इसके पिछले दो दशकों से निजी क्षेत्र के मुनाफों में बहुत बढ़ोतरी हुई है।