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हाल ही में एक टेलीमार्केटिंग कंपनी द्वारा मोबाइल पर उत्तराखंड के राज्यपाल से की गई अभद्रता ने आम आदमी के दर्द को नुमायां कर दिया है। उस कंपनी के कर्मचारी का राज्यपाल के मोबाइल पर सीधे कॉल करना और फिर शालीनता की सीमाएं तोड़ते हुए बदतमीजी की हद तक पहुंच जाना हैरान करने वाला है।
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एक बार कॉल करके जब मन नहीं भरा, तो कंपनी के लोगों ने दोबारा उन्हें न सिर्फ कॉल किया, बल्कि बात करने से इनकार करने पर अभद्रता की! प्रणब मुखर्जी जब वित्त मंत्री थे, तब संसद में बहस के दौरान एक बार उनके मोबाइल पर भी इस तरह अवांछित कॉल आई थी और हंगामा हुआ था। इस बार भी लगभग ऐसा ही हुआ।

महामहिम की शान में गुस्ताखी हुई, तो पुलिस और एसओजी की टीम ने तत्काल जांच-पड़ताल शुरू कर दी और फोन पर ही बीमा पॉलिसी बेचने वाली एक कंपनी के कई लोगों को हिरासत में ले लिया गया। माफी मांगने के बाद दोषी लोगों को पुलिस से छुटकारा तो मिल गया, लेकिन इस मामले ने इस तथ्य से देश को रूबरू करा दिया है कि ट्राई (टेलीकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया) के नियमों का डंके की चोट पर उल्लंघन कैसे होता है।
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दरअसल इस घटना ने ट्राई के नियमों के खोखलेपन और टेलीफोन उपभोक्ताओं के दर्द, दोनों को एक बार फिर सामने ला दिया है। आम आदमी हर रोज इस सबसे दो-चार होता है। ट्राई ने टेलीमार्केटिंग कंपनियों की अनचाही कॉल्स और एसएमएस पर रोक लगाने के लिए सख्त नियम बना रखे हैं। इन नियमों का उल्लंघन करके अनचाही कॉल करने वाली कंपनियों पर पहली बार 25 हजार रुपये के जुर्माने का प्रावधान है।

हर अनचाही कॉल के साथ जुर्माने की राशि बढ़ते जाने का प्रावधान है। बार-बार नियम का उल्लंघन करने पर यह राशि बढ़कर ढाई लाख रुपये तक पहुंच सकती है। इसके अलावा कोई टेलीमार्केटिंग कंपनी अगर जान-बूझकर बार-बार नियमों का उल्लंघन करती है, तो उसका नंबर ब्लॉक करने का भी प्रावधान है।

ट्राई की ये सिफारिशें कई साल पुरानी हैं। कई बार सिफारिशें करने और नियम लागू करने की समयसीमा तय करने के बाद ट्राई ने 2011 में इन नियमों को कई संशोधनों के साथ लागू कर दिया था। इससे पहले डू नॉट कॉल की सुविधा उपभोक्ताओं को दी गई थी। इसके तहत रजिस्ट्रेशन कराने वाले उपभोक्ताओं को अवांछित कॉल और एसएमएस से छुटकारा दिलाने का प्रावधान किया गया था।

इन नियमों और दिशा निर्देशों के पीछे ट्राई का उद्देश्य यह है कि टेलीमार्केटिंग कंपनियां और ऑपरेटर ऐसे ग्राहकों को परेशान नहीं करेंगे, जो इस तरह की कॉल नहीं सुनना चाहते। पर तमाम नियमों को धता बताकर हर रोज टेलीमार्केटिंग कंपनियां और खुद मोबाइल कंपनियां भी उपभोक्ताओं को बार-बार अवांछित कॉल या एसएमएस भेजकर कभी नए उत्पादों और सेवाओं के बारे बताती हैं, तो कभी किसी और बहाने उनकी निजता में दखल देती हैं। चाहे लोगों के काम करने का समय हो, जरूरी मीटिंग में व्यस्त रहने का या सोने का, टेलीमार्केटिंग कंपनियों को सिर्फ अपने कारोबार से मतलब है।

किसी भी वक्त कॉल करना और जब तक फोन उठाया न जाए, तब तक कॉल करते रहना उनका शगल बन गया है। कोई ड्राइविंग कर रहा हो, अस्पताल में पड़ा हो या फिर किसी के अंतिम संस्कार में ही क्यों न लगा हो, ऐसी अनचाही कॉल्स शर्मनाक सिलसिले की तरह शुरू हो सकती हैं। अक्सर ऐसी कॉल विवाद में बदल कर ही खत्म होती है। इनसे परेशान होकर लोगों को अक्सर अपने मोबाइल स्विच ऑफ करने पड़ते हैं।

मुश्किल यह है कि हर मोबाइलधारक राज्यपाल नहीं होता, जिसके एक इशारे पर पुलिस टेलीमार्केटिंग वालों को टांग कर ले आए। सवाल यह है कि ऐसे आम उपभोक्ता का दर्द कौन और कब समझेगा। आवश्यकता इस बात की है कि ट्राई के नियमों को सख्ती से इस तरह लागू किया जाए कि टेलीमार्केटिंग कंपनियां और हर रोज अपनी नई स्कीम के बारे में बताने वाले सेलफोन ऑपरेटर एक भी कॉल मिलाने या एसएमएस भेजने से पहले कई बार सोचें कि वे एक अपराध करने जा रहे हैं। जिस देश में 85 करोड़ से ज्यादा मोबाइल उपभोक्ता हैं, वहां इस समस्या पर अंकुश लगाना कठिन जरूर हो सकता है, लेकिन असंभव नहीं।
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