इस बात का ठीक-ठीक सामाजिक विश्लेषण नहीं होता कि किस तरह समाज में कोई ऐसा नेता उभर कर आता है, जिसकी राष्ट्रीय छवि हो। कई बार कुछ नेता अपने व्यक्तिगत करिश्मे से ऐसी छवि पा लेते हैं, तो कुछ परिस्थितियों को अपने अनुकूल करके अपनी पहचान बना लेते हैं।
हाल के तीन-चार दशक के परिदृश्य में इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी ही ऐसे नेता के रूप में सामने आए हैं, जिन्हें सही मायनों में राष्ट्रीय नेता के तौर पर देखा जा सकता है।
हर चार-पांच साल के अंतराल में समाज ऐसे नेताओं को अपने बीच देखना चाहता है, जो जद्दोजहद से परिस्थितियों से लड़कर उसका नेतृत्व करे। लगातार खराब व्यवस्था या किसी जनाक्रोश से समाज अपने अंदर एक बेचैनी महसूस करता है। इसी बेचैनी में समाज के अंदर किसी ऐसे नेता की चाहत होती है, जो कुछ उलटपुलट करने का उपक्रम करे या करता हुआ दिखे।
1987-90 के दौरान पहले बोफोर्स तोप सौदे की दलाली और उसके बाद मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की वजह से विश्वनाथ प्रताप सिंह के उभार को हम इसी तौर पर देख सकते हैं। लेकिन इसका प्रभाव क्षणिक रहा। सत्ता के प्रति लोगों के आक्रोश को उन्होंने बखूबी समझा। उन परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए सत्ता भी पाई। पर इसके आगे वह नहीं जा सके।
किसी नेता की राष्ट्रीय छवि का गढ़ना और जनाकांक्षा दोनों आपस में संबद्ध हैं। कोई नेता सही मायनों में जन नेता तभी बन पाता है, जब लोगों में उसके प्रति गहरा विश्वास बने। 1971 में इंदिरा गांधी के 'गरीबी हटाओ' नारे में लोगों ने चमक ही नहीं देखी, एक तरह का विश्वास भी देखा। लोगों को लगा कि वह जो करना चाहती हैं, कर सकती हैं।
यह जनता का मनोविज्ञान है, वह लिजलिजे व्यक्तित्व को नेता के रूप में नहीं देखना चाहती। इंदिरा गांधी में एक अलग तरह का जुझारूपन भी नजर आया। राजनीतिक कौशल से उन्होंने सत्ता में वापसी की। आपातकाल से उपजा जनाक्रोश जनता पार्टी को सत्ता में लाया था। लेकिन उसके कद्दावर नेताओं ने इस जन भावना को अनदेखा कर दिया। वे आपस में उलझ गए। ऐसे समय इंदिरा गांधी ने बहुत संयत होकर अपना काम किया और एक समय फिर कांग्रेस को वापस सत्ता दिलाई।
जयप्रकाश नारायण जनता पार्टी की धुरी थे, पर उन्होंने खुद को सत्ता राजनीति से अलग रखा। दूसरी ओर जनता पार्टी में कद्दावर नेताओं की चौपाल भले रही हो, लेकिन उनमें किसी करिश्मे जैसी बात नहीं थी। इंदिरा के बाद स्वीकार्य नेता की छवि अटल बिहारी वाजपेयी में ही नजर आई थी। वाजपेयी सबको साथ लेकर चलने की अपनी काबिलियत के चलते राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किए गए। अपने राजनीतिक सफर में उन्होंने ज्यादा विरोधी नहीं बनाए।
गठबंधन की राजनीति में कुशलता और परिपक्वता के साथ उन्होंने सरकार चलाई। वाजपेयी का जिक्र आते ही लालकृष्ण आडवाणी की बात भी होती है। यहां एक बात जरूर कहनी होगी कि दोनों नेताओं में गजब का तालमेल रहा है। आडवाणी ने राम मंदिर के लिए रथ यात्रा से भाजपा के लिए माहौल बनाया, तो वाजपेयी ने आगे बहुत कुशलता से सत्ता की बागडोर संभाल ली। भारतीय राजनीति में दो नेताओं के बीच परस्पर गहरी समझ, विश्वास का ऐसा उदाहरण कम देखने को मिलता है।
इसी संदर्भ में बात गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर आती है। कई लोग महसूस कर सकते हैं कि उनमें तेवर हैं, वह बदलाव लाने वाले नेता हैं। लेकिन अभी उनका जैसा प्रभामंडल गुजरात में है, उसे देश में भी स्वीकार्य मान लेना जल्दबाजी होगी। वह आज की परिस्थितियों में भाजपा के लिए चुनाव में बड़े स्टार प्रचारक हो सकते हैं।
वह एक कुशल और आक्रामक नेता के रूप में भी दिखेंगे, लेकिन इतने भर से वह राष्ट्रीय नेता नहीं हो जाते। किसी राज्य में किसी नेता की छवि, उसकी राष्ट्रीय छवि के तौर पर भी अंकित हो जाए, यह कतई जरूरी नहीं। इसके लिए उसे दूसरी कई कसौटियों से गुजरना होता है।
कांग्रेस ने जिस तरह अपनी शैली बदली है, उसमें किसी नेता की राष्ट्रीय छवि उभरना मुश्किल ही होता है। वहां एक परिवार की इच्छाओं पर बहुत कुछ निर्भर होता है। इंदिरा गांधी राजनीति में स्थापित की गई थीं। लेकिन उन्होंने अपनी छवि बदली। अब उस तरह की कवायद होती नहीं दिखती। राजीव गांधी को सत्ता सहानुभूति में मिली।
वह लोकप्रिय भी हो रहे थे, लेकिन यह लोकप्रियता व्यवस्था को बदलने या किसी नीतिगत फैसलों की वजह से नहीं थी। वहीं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी पहली पारी तो ठीक से खेली, लेकिन दूसरे दौर में बुझे-बुझे ही रहे। अपनी भावभंगिमा में वह खास अनुशासन में ही दिखे। राहुल गांधी के बारे में यह साफ है कि वह स्वाभाविक नेता नहीं हैं। अभी उन्हें कसौटी में कसा जाना बाकी है।
भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय नेताओं का दबदबा बना हुआ है। यह असर भविष्य में भी बना रहेगा। जैसे अब मायावती का फिर से प्रभाव देखने को मिल सकता है। हालांकि यह अलग बात है कि क्षेत्रीय नेता बारी-बारी से सत्ता में आते रहे।
राज्य में उभरे नेताओं का असर राज्य की राजनीति में तो बना ही है, गठबंधन की राजनीति में भी वे अहमियत रखते हैं। पर उनकी दृष्टि राज्य से देश की तरफ होती है, न कि देश से राज्य की ओर। इसलिए वे हर चीज को अपने ही दायरों में देखते हैं।
यही वजह है कि राष्ट्रीय हितों के बड़े नीतिगत फैसलों में राज्य की राजनीति आड़े आ जाती है। क्षत्रप तो अनेक हैं, लेकिन उनमें ऐसा नेता नहीं, जो सर्वस्वीकार्य हो। आज यही भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती है।