अमेरिका की आबोहवा को करीब से देखने वाले उस पल को शायद ही भूले होंगे, जब वहां की संघीय अदालत ने समलैंगिक विवाह को मान्यता देते हुए विवाह अधिनियम में बदलाव किए थे। राष्ट्रपति बराक ओबामा के इस पहल को हाथोंहाथ लिया गया था। लेकिन जिस शख्स ने परदे के पीछे यह पूरी गाथा लिखी और अदालत में ओबामा प्रशासन का पक्ष रखा, वह थे श्रीकांत श्रीनिवासन।
अब यही शख्स डीसी सर्किट कोर्ट के जज नियुक्त किए गए हैं, जिसे अमेरिका की दूसरी सबसे बड़ी अदालत माना जाता है। लेकिन इस नियुक्ति पर इतराने की सिर्फ यही एक वजह नहीं है कि यह उपलब्धि हासिल करने वाले श्रीकांत भारतीय मूल के पहले अमेरिकी हैं, बल्कि इसलिए भी कि उन्हें डेमोक्रेट और रिपब्लिकन, दोनों का साथ मिला है, जो आम तौर पर विरल है।
ओबामा चंडीगढ़ के इस लाल को जहां 'पथ प्रदर्शक' बता रहे हैं, वहीं एशियाई मूल के सांसदों की नजर में यह एशियन अमेरिकन ऐंड पेसिफिक आइसलेंडर हेरिटेज मंथ (अमेरिका में रहने वाले एशियाई अमेरिकी और प्रशांत द्वीपीय मूल के लोगों की संस्कृति, कला और इतिहास का उत्सव, जो इसी महीने मनाया जा रहा है) का उपहार है। न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबार तो श्रीकांत की तारीफ में कसीदे पढ़ते हुए उन्हें 'अद्वितीय और उदार उम्मीदवार' बता रहे हैं।
लेकिन आखिर ऐसा क्या है कि बॉलीवुड फिल्मों और हिंदुस्तानी खाने के शौकीन श्रीकांत दोनों अमेरिकी पार्टियों की पसंद बनकर उभरे। इसका जवाब नसाबा की पूर्व अध्यक्ष जोल्सन जॉन देती हैं। वह कहती हैं, श्रीकांत न अति उदार हैं, और न अति रूढ़िवादी। उनका नरमपंथी स्वभाव और व्यापकता में चीजों को देखने का नजरिया ही उन्हें इस पद के अनुकूल बनाता है। इसकी पुष्टि उन्हें मिले कई पुरस्कार भी करते हैं, जो उत्कृष्ट कार्य करने की वजह से दिए गए।
दिलचस्प है कि डॉक्टरी की पढ़ाई कर रहे श्रीकांत का रुझान वकालत की तरफ तब बढ़ा, जब वह मेडिकल की शिक्षा कमोबेश पूरी करने वाले थे। उस वक्त काला कोट कुछ इतना पसंद आ गया कि स्टेथोस्कोप क्लास में ही छूट गए। हालांकि अब भी श्रीकांत की राह आसान नहीं है। वह भले ही संघीय अदालत का जज बनने के करीब आ गए हैं, लेकिन उन्हें खुद को फिर भी साबित करना होगा। लेकिन वह आशान्वित हैं। आखिर संघीय अदालत में दो दर्जन से अधिक मामलों में जिरह करने का अनुभव जो उनके पास है।