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चीन हमें बेवकूफ बना रहा है

Fri, 24 May 2013 09:47 PM IST
नई दिल्ली
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चीनी प्रधानमंत्री ली केचियांग के भारत दौरे के बाद यह बहस तेज हो गई है कि क्या दोनों देशों के रिश्तों पर जमी बर्फ के पिघलने की शुरुआत हो चुकी है? इस मामले में कई देशों में राजदूत रह चुके गौरीशंकर राजहंस से हिमांशु मिश्र ने बातचीत की।
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:- ली केचियांग के दौरे के बाद क्या भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों में मजबूती आएगी?

:- चीन हमें बेवकूफ बना रहा है। इतिहास उठाकर देख लीजिए, दोस्ती तो इस देश की फितरत में ही नहीं है। वैसे भी हम 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' के नारों के बीच 1962 में विश्वासघात झेल चुके हैं। दरअसल, अमेरिका एवं यूरोपीय देशों में छाई मंदी ने चीन की अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। इससे संभलने के लिए उसे भारत का विशाल बाजार चाहिए। इसलिए वह हमारी तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा है।

:- मगर कहा जा रहा है कि चीन की बागडोर नए हाथों में जाने से दोनों देशों के संबंधों की कड़वाहट धुलेगी?

:- हमें चीन के इतिहास को समझने की जरूरत है। संबंध तभी सुधरते हैं, जब दोनों पक्ष कुर्बानी देने के लिए तैयार हों। मगर चीन की नीति हमेशा विस्तारवादी रही है। उसने तिब्बत पर कब्जा किया। लाओस को परेशान किया। जापान, कोरिया, भारत सभी के साथ इसके सीमा विवाद है। फिर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस नए हाथों में बागडोर आने के कारण संबंध सुधरने की भविष्यवाणी की जा रही है, उसके सत्ता में आते ही लद्दाख में चीनी सेना ने घुसपैठ की। इसलिए मेरा मानना है कि चीन की दिलचस्पी सीमा विवाद सुलझाने में नहीं, बल्कि भारतीय बाजार पर कब्जा करने की है।
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:- अगर चीन को भारतीय बाजार की इतनी ही जरूरत है, तो भारत सरकार भी तो इसका लाभ उठा सकती है?

:- हां, उठा जरूर सकती है, मगर दुर्भाग्यवश भारत सरकार भ्रम का शिकार हो गई है। इस दौरे में हमें भी दो टूक और कठोर शर्तें रखनी चाहिए थी। चीन को एहसास कराना चाहिए था कि वह हमें कमजोर न समझे। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। भारत की ओर से प्रतीकात्मक विरोध ही दर्ज कराए गए, जिसकी चीन कभी परवाह नहीं करेगा।

:- फिर आपके हिसाब से भारत के पास क्या विकल्प है?

:- सबसे पहले हमें चीन संबंधी नीति में व्यापक बदलाव करने की जरूरत है। हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि चीन एक धोखेबाज देश है। उसके साथ रक्षात्मक नीति अपनाना अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। घुसपैठ सहित अन्य विवाद के मामले में हमें आक्रामक रवैया अपनाना होगा। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर आक्रामक मौजूदगी दिखानी हेगी। चीन को भी यह एहसास है कि भारत के साथ सीधी जंग मुश्किल है। क्योंकि हमारे पास बाजार की ताकत तो है ही, सामरिक दृष्टि से भी हम उससे कम नहीं है। मगर समस्या यह है कि खुद हमारी सरकार को ही विश्वास नहीं है कि चीन के खिलाफ आक्रामक रणनीति कारगर साबित हो सकती है।

:- सवाल यह भी है कि भारत अपने किस-किस पड़ोसी से उलझे।

:- चीन भी तो अपने पड़ोसियों में उलझा है। पाकिस्तान को छोड़ दें, तो अन्य पड़ोसी मसलन जापान, कोरिया, म्यांमार से उसके रिश्ते ठीक नहीं हैं। जहां तक नेपाल की बात है, तो वहां चीन का प्रभाव भारत के ढुलमुल रवैये के कारण बढ़ा। मेरा कहना है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति रक्षात्मक रुख से नहीं चलती। खासतौर से चीन तो सिर्फ धमक की भाषा ही पहचानता है। फिर आज या कल हमें आक्रामक नीति अपनानी ही होगी। जब अंतिम विकल्प आक्रामक नीति ही है, तो फिर इसे आजमाने में देरी कैसी?
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