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मुद्दा: समान नागरिक अधिकारों के पक्ष में, समाज के व्यापक हित के लिए जरूरी है यह पहल

हरबंश दीक्षित
Updated Thu, 06 Jul 2023 07:50 AM IST

सार

सभी नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा करने, मानवीय गरिमा का सम्मान करते हुए उन्हें सुरक्षा बोध कराने और सभ्य समाज के मानकों पर खरा उतरने के लिए समान नागरिक संहिता जरूरी है। अतः समाज के व्यापक हितों के मद्देनजर पंथनिरपेक्ष हितचिंतकों को इस दिशा में पहल करने की जरूरत है।
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समान नागरिक संहिता - फोटो : अमर उजाला


वैसे तो हमारे देश में अधिकतर मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक जैसा कानून लागू होता है। जमीन की खरीद-फरोख्त, किरायेदारी व दीगर दीवानी मामले में आजादी के पहले से ही एक जैसा कानून लागू है। पर विवाह, उत्तराधिकार, वसीयत, दत्तक ग्रहण जैसे मामलों में अलग-अलग संप्रदायों के लिए अलग-अलग कानून रहे हैं। संविधान निर्माताओं ने महसूस किया कि विवाह और भरण-पोषण से जुड़े मामलों का संबंध किसी पूजा-पद्वति से नहीं है, बल्कि इनका संबंध इंसानियत से है। निस्संतान व्यक्ति यदि किसी बच्चे को गोद लेकर अपनी वंश परंपरा आगे बढ़ाना चाहता है या उससे उसे सुरक्षा बोध का एहसास होता है, तो इससे किसी पूजा-पद्धति की अवमानना कैसे हो सकती है? यदि किसी कानून से किसी महिला को सामाजिक सुरक्षा मिलती है या पति से अलग होने या पति के नाराज होने के बाद दर-ब-दर भटकने के बजाय उसके लिए गुजारे-भत्ते की व्यवस्था की जाती है, तो इसमें धर्म कहां से आड़े आता है। महिला-पुरुष के वैवाहिक संबंधों में यदि समानता सुनिश्चित की जाती है, तो यह किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्म नहीं, बल्कि गर्व का विषय होना चाहिए।


आजादी के बाद इस दिशा में सकारात्मक पहल की गई। समानता के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए पारंपरिक हिंदू विवाह विधि में व्यापक परिवर्तन किए गए। पहले हिंदू पुरुष एक से अधिक शादियां कर सकता था, जिस पर हिंदू विवाह अधिनियम के जरिये प्रतिबंध लगा दिया गया। विवाद की स्थिति में पति-पत्नी को विवाह विच्छेद करके सम्मान पूर्वक एक-दूसरे से अलग रहने का अधिकार दिया गया। महिलाओं को भरण-पोषण का अधिकार दिया गया। पिता की संपत्ति में बेटियों को भी अधिकार देने की शुरुआत हुई। संतान गोद लेने के मामलों में भी पति के एकाधिकार को तोड़ते हुए महिलाओं के अधिकार को सुनिश्चित करने की कोशिश की गई। हिंदू कानून में किए जाने वाले ये सुधार दूसरे संप्रदायों में पहले से ही थे। मसलन, मुस्लिम कानून में बेटियों का उत्तराधिकार पहले से ही था। ईसाई कानून में पहले भी पुरुष को एक ही पत्नी रखने का अधिकार था। हिंदू कानून में किए गए सुधारों में मानवाधिकारों और समानता के सिद्धांतों को तरजीह दी गई। पर वोट बैंक खिसकने की स्वार्थी सोच के कारण दूसरे समुदायों में ऐसा नहीं हो सका और उन्हें लगातार बेहतर होने के मौके से वंचित रखा गया। संविधान का अनुच्छेद 44 और अदालतों के कई निर्देश भी इस सोच पर बेअसर रहे।


आधुनिक सोच का लाभ केवल हिंदुओं तक ही सीमित न रहे और वह दूसरे मतावलंबियों को भी हासिल हो, इसके लिए अदालतें लगातार कोशिश करती रहीं। मुहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो (1985) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि यह अत्यंत खेद का विषय है कि संविधान के अनुच्छेद 44 में तय की राज्य की जिम्मेदारी अब निर्जीव शब्द समूहों का संग्रह मात्र बनकर रह गई है। अदालत ने कहा कि मुस्लिम समाज को इस मामले में पहल करने की जरूरत है, ताकि प्रगति की दौड़ में वह दूसरों से पीछे न रहे। हैरानी की बात यह है कि शाहबानो के जिस मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने लोगों से इस दिशा मे आगे बढ़ने का आह्वान किया, उसके दुष्प्रचार ने समान नागरिक कानून की पहल को भारी चोट पहुंचाई।


शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला के गुजर-बसर के लिए कुछ धनराशि तय की थी, लेकिन इसे मुसलमानों के धार्मिक मामलों में दखलंदाजी के रूप में प्रचारित किया गया। कुछ लोगों ने इसे पूरे कौम की अस्मिता पर खतरा करार दिया। राजीव गांधी की प्रचंड बहुमत वाली सरकार भी उस दुष्प्रचार का सामना नहीं कर सकी और उसे कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं को गुजारे भत्ते के अधिकार से वंचित करना पड़ा। संविधान की पराजय हुई और मानवता तथा समानता के उन सिद्धांतों की बलि दी गई, जिनकी बुनियाद पर इस्लाम की स्थापना हुई थी। इससे संदेश यह गया कि अब समान नागरिक संहिता के लिए पहल मत करना।


शाहबानो प्रकरण के बाद सरला मुद्गल (1995) तथा लिली थॉमस (2000) जैसे कई प्रकरणों में सर्वोच्च न्यायालय ने समान नागरिक कानून के नहीं होने के दोषों को उजागर करते हुए इसे तुरंत लागू करने का निर्देश दिया। वैवाहिक साथी से छुटकारा पाने के लिए कुछ लोगों ने कुछ समय के लिए अपना धर्म बदलकर दूसरी शादी कर ली, क्योंकि दूसरे धर्म से जुड़े कानून में उसे मान्यता दी गई है। फिर अपनी मर्जी से तलाक देकर उस महिला से छुटकारा पा लिया, क्योंकि उस धर्म का कानून इसकी इजाजत देता है। सुप्रीम कोर्ट और दूसरे विद्धानों ने इस कमी की ओर बार-बार इशारा किया, लेकिन हमारे राजनीतिक नेतृत्व पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।


मार्कण्डेय काटजू ने अपने बयान में समान नागरिक कानून की वकालत करके संविधान के अनुच्छेद 44 और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया। इससे पहले कई अन्य विद्वानों ने भी इसकी वकालत की है। न्यायमूर्ति मुहम्मद करीम छागला ने मोतीलाल नेहरू व्याख्यान मामले में, प्रोफेसर ताहिर महमूद ने अपनी पुस्तक मुस्लिम पर्सनल लॉ (1977) में तथा न्यायमूर्ति एम यू बेग ने इम्पेंक्ट ऑफ सेक्युलरिज्म (1973) में भी संविधान के अनुच्छेद 44 को अमली जामा पहनाने का आह्वान किया, किंतु शाहबानो प्रकरण के दुःस्वप्न से अभी कोई उबरने को तैयार नहीं है। समाज के व्यापक हितों के मद्देनजर पंथनिरपेक्ष हितचिंतकों को आगे बढ़कर इस दिशा में पहल करने जरूरत है, ताकि हम एक प्रगतिशील समाज के रूप में एकजुट हो सकें।
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-लेखक तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवं डीन हैं।

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