उत्तर प्रदेश और बिहार के लाखों टैक्सी ड्राइवर मुंबई और दिल्ली में रहते हैं, जो नियमित रूप से बुवाई और कटाई के मौसम में ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले अपने परिवारों के पास जाते हैं। वे लगातार यह कहानी सुनाते हैं कि यूरिया, बिजली और पानी की कीमत बढ़ने से लागत खर्च में बढ़ोतरी के कारण कैसे खेती घाटे का सौदा हो गई है।
चंद्रभूषण राय मुंबई में टैक्सी चलाते हैं और हर महीने बलिया में रहने वाले अपने परिवार को मासिक खर्च के लिए करीब छह हजार रुपये भेजते हैं, जिसमें उनके एकमात्र बेटे के साधारण प्राइवेट स्कूल में पढाई का खर्च भी शामिल है। उनके पास पांच बीघा जमीन है और बेबसी से कहते हैं कि खेती से होने वाली आय से उनके परिवार का भोजन और दूध का खर्च ही निकल पाता है और उसके बाद बहुत थोड़ा पैसा बच पाता है। चंद्रभूषण बताते हैं कि उत्तर प्रदेश और बिहार के ज्यादातर खेतिहर परिवारों के पास पांच एकड़ से भी कम जमीन है। लिहाजा परिवार के कम से कम एक सदस्य को पारिवारिक आय के पूरक के तौर पर शहरों में काम करना पड़ता है। इस आय के बिना परिवार के बढ़ते खर्च को पूरा कर पाना असंभव है, खासकर बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना और स्वास्थ्य एवं परिवार में होने वाले विवाह आदि का खर्च जुटाना। चंद्रभूषण की कहानी दिल्ली और मुंबई में टैक्सी चलाने वाले वे हजारों लोग अनंत बार दोहरा सकते हैं, जो उत्तर प्रदेश और बिहार के कृषक परिवारों से आते हैं।
चंद्रभूषण कहते हैं कि उन्होंने इस उम्मीद में मोदी को वोट दिया था कि उनके सत्ता में आने से छोटे खेतिहर परिवारों के जीवन में कुछ सुधार आएगा। खासकर इसलिए, क्योंकि मोदी ने स्पष्ट रूप से वायदा किया था कि किसानों को उनकी लागत से 50 फीसदी ज्यादा मुनाफा दिया जाएगा। वह वायदा तो पूरा नहीं ही हुआ, बेमौसम की बरसात और कृषि उत्पादों के मूल्यों में भारी गिरावट के चलते किसानों की हालत और भी खराब हो गई। यही वह समय था, जब छोटे किसानों ने कुछ राहत की उम्मीद की थी। अपने पहले पूर्ण बजट में अरुण जेटली ने बाजार मूल्य के गिरने की स्थिति में किसानों की मदद के लिए एक छोटा-सा मूल्य स्थिरीकरण (संतुलन) कोष बनाया है। लेकिन किसी को यह पता नहीं है कि यह कोष आज काम कर रहा है या नहीं।
चंद्रभूषण कहते हैं, 'मोदी ने बड़े-बड़े वायदे किए, लेकिन उन्होंने हमें निराश किया।' कोई हैरानी नहीं कि विपक्षी पार्टियां भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर नारे लगा रही हैं- किसान विरोधी, नरेंद्र मोदी। भारतीय जनता पार्टी तेजी से भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर लोगों का भरोसा खोती जा रही है, जिसमें सार्वजनिक-निजी भागीदारी परियोजना के लिए किसानों की सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण करने का प्रावधान है। मोदी की त्रासदी यह है कि इस मसले पर उन्हें न तो अपने सहयोगियों का पूर्ण समर्थन प्राप्त है और न ही भारतीय किसान संघ और स्वदेशी जागरण मंच जैसे संघ परिवार के संगठनों का। यह त्रासदी इसलिए भी जटिल हो गई है, क्योंकि भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर बहस वैसे समय में हो रही है, जब खेती दशक के सबसे बुरे संकट में है।
खबरें हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान बेमौसम की बरसात से इतने ज्यादा पीड़ित हैं कि उन्होंने अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों और कॉलेजों से वापस बुलाना शुरू कर दिया है, क्योंकि वे उनकी फीस नहीं दे सकते। उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों को चीनी मिलों से अब तक भुगतान नहीं मिला है। ऐसी भी खबरे हैं कि उत्तरी क्षेत्र में गेहूं और महाराष्ट्र में प्याज के मूल्यों में भारी गिरावट आई है। कपास का मूल्य भी गिर गया है, क्योंकि चीन ने भारत से अपने कपास आयात को आधा कर दिया है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि किसानों की आत्महत्या, जो पहले से ही बड़े पैमाने पर हो रही है, आने वाले महीनों में और बढ़ेगी।
ऐसे तीव्र कृषि संकट के बीच मोदी सरकार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश पर विपक्ष के साथ एक अनावश्यक विवाद में उलझी हुई है, जो तेज औद्योगिक विकास के नाम पर किसानों के ऊपर थोप दिया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की समझदारी इसी में है कि वह इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाएं और भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को नए सिरे से विचार करने के लिए संसदीय समिति को सौंप दे। इसी बीच उन्हें किसानों के तात्कालिक संकट का समाधान करना चाहिए। सरकार को मूल्य स्थिरीकरण (संतुलन) कोष का विस्तार करना चाहिए और न्यूनतम समर्थन मूल्य के दायरे में ज्यादा से ज्यादा जिंसों को शामिल करना चाहिए। किसानों को ऋण अदायगी पर एक बार जरूर राहत दी जानी चाहिए।
यदि बैंक बड़े उद्योगों को कई लाख करोड़ रुपये की कर्ज अदायगी पर राहत दे सकता है, तो वैसी ही राहत किसानों को भी क्यों नहीं मिलनी चाहिए? लंबे समय से उद्योग जगत सरकार और सार्वजनिक बैंकों से 'विकास और रोजगार सृजन' के नाम पर रियायतें लेता रहा है। पिछले दशक में रोजगारविहीन विकास के लंबे दौर के हम सभी साक्षी रहे हैं। आठ फीसदी से ज्यादा ऊंची विकास दर ने भी रोजगार के बाजार में स्थिरता सुनिश्चित नहीं की।
भाजपा का प्रमुख आर्थिक मुद्दा कृषि को छोटे उद्योगों और सेवा क्षेत्र से जोड़कर ग्रामीण रोजगार पर ध्यान केंद्रित करना था, जो रोजगारविहीन विकास के बिल्कुल उलट था। लेकिन मोदी सरकार द्वारा इस रणनीति के क्रियान्वयन के बारे में हम कुछ देख-सुन नहीं रहे हैं। इस बारे में हमने शायद ही कभी कृषि मंत्री के मुंह से कुछ सुना है, जो इतने लो प्रोफाइल (कम सामने आते) हैं कि बहुतों को उनका नाम भी नहीं पता। अगर प्रधानमंत्री ने किसानों के हित में तेजी से कदम नहीं उठाया, तो उन्हें जल्दी ही ग्रामीण भारत से भारी विरोध का सामना करना पड़ सकता है।