फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

भीड़ में बदलते बेरोजगार

Sun, 18 Jun 2017 05:43 PM IST
तवलीन सिंह
विज्ञापन
तवलीन सिंह
विज्ञापन
पिछले हफ्ते जिस दिन मुंबई में इस मौसम की पहली बारिश हुई थी, मेरी मुलाकात एक बुजुर्ग उद्योगपति से हुई। वह उन लोगों में से हैं, जिन्हें अपनी कम, देश की चिंता ज्यादा रहती है, सो उम्र भर इन्होंने ऐसी चीजों में निवेश किया, जिनसे देश का भविष्य रोशन हो सके। शिक्षा के क्षेत्र में इनका खास योगदान रहा है। उस दिन जब मिले, तो कुछ मायूस दिखे और जब मैंने कारण पूछा, तो उन्होंने कहा कि बेरोजगारी को लेकर वह इन दिनों काफी चिंतित हैं। उन्होंने कहा, ‘नरेंद्र मोदी का मैंने शुरू से इस उम्मीद से समर्थन किया कि वह ऐसी आर्थिक नीतियां बनाएंगे, जिनसे बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा हो। ऐसा अभी तक हुआ नहीं है। और मेरा मानना है कि जब तक ऐसा नहीं होगा, अराजकता फैलती ही रहेगी।’
विज्ञापन


इस मुलाकात से कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश में किसानों की हिंसक भीड़ ने कई वाहनों को जलाया था। हिंसा रोकने के लिए पुलिस ने गोली चलाई थी, जिसमें छह लोगों की मौत हो गई थी। मेरे उद्योगपति दोस्त ने ध्यान दिलाया कि हिंसक भीड़ में ज्यादातर नौजवान थे, जिन्होंने जींस और टी-शर्ट पहन रखी थी और शिक्षित वर्ग के लगते थे। उन्होंने कहा, ये नौजवान, बेरोजगार न होते, तो खेती न कर रहे होते।

ऐसे नौजवान उस भीड़ में भी थे, जिन्होंने अलवर में पहलू खान को मार डाला था। और उस भीड़ में भी दिखे, जिन्होंने पिछले सप्ताह तमिलनाडु सरकार के एक काफिले पर बाड़मेर में हमला किया था। तमिलनाडु के अधिकारियों ने भीड़ को शांत करने के लिए कागजात दिखाए, जो साबित करते थे कि जायज तरीके से गायों को खरीदा गया था, लेकिन भीड़ ने फिर भी हमला किया और एक ट्रक को जलाने की कोशिश की यह जानते हुए कि उसके अंदर जिंदा गायें और बछड़े थे। पिछले तीन वर्ष में गोरक्षा के नाम पर जितनी भी हिंसक घटनाएं हुई हैं, उनके पीछे बेरोजगार नौजवान रहे हैं।
विज्ञापन


विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था के मुताबिक भारत में हर वर्ष एक करोड़ नए नौजवान पहुंचते हैं रोजगार बाजार में नौकरियों की तलाश में। इनमें से ज्यादातर निराश होकर वापस जाते हैं अपने गांव खेती में हाथ बंटाने। अराजकता कैसे नहीं फैलेगी? आजकल मैं जब भी छोटे शहरों में जाती हूं, तो मेरी भेंट होती है ऐसे शिक्षित युवकों से जो टैक्सी चला रहे होते हैं या किसी दफ्तर में चपरासी की मामूली नौकरी कर रहे होते हैं। इन युवकों में एक अजीब किस्म की बेचैनी नजर आती है, जिसे हिंसा में तब्दील करना कठिन नहीं है। समस्या इतनी गंभीर है कि महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे विकसित राज्यों में भी जाट और मराठा युवक प्रदर्शन करते दिखे हैं पिछले महीनों में।

गुजरात में हार्दिक पटेल ने साबित कर दिया है कि पटेलों में भी आक्रोश है। कहने को तो इन सबकी मांग सिर्फ आरक्षण से जुड़ी हैं, लेकिन अगर बेरोजगारी की इतनी बड़ी समस्या न होती तो यह मांग क्यों होती। एक समय था, जब सरकारी नौकरियां आसानी से मिल जाती थीं, उन नौजवानों को जो ग्रामीण क्षेत्रों से निकल कर बड़े शहरों में आया करते थे। 

कोई दस साल पहले जब भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से दौड़ रही थी, तो रोजगार के नए अवसर लाखों की तादाद में निजी कंपनियों में पैदा हुए थे। महानगरों में रोज नए मॉल खुल रहे थे, नए कारखाने, नए रेस्तरां और नए होटल खुल रहे थे। पिछले कुछ वर्षों में ऐसी मंदी आई है, निजी क्षेत्र में कि रोजगार के नए अवसर पैदा होना, तो दूर कई कंपनियां और कारखाने बंद हो गए हैं। मोदी जब प्रधानमंत्री बने थे, बहुत उम्मीदें थीं कि निवेशकों की कतारें लग जाएंगी और निजी क्षेत्र में नई ऊर्जा पैदा होगी। ऐसा अभी तक हुआ नहीं है। मेरे उस उद्योगपति दोस्त की चिंता प्रधानमंत्री की भी होनी चाहिए। कुछ ऐसे ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है, जिनसे रोजगार के बाजार में फिर से बहार आ जाए।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें