चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने प्रचार से दूर रहने की देंग श्याओपिंग की सलाह को त्याग दिया है। देंग उस दौर में चीन के नेता थे, जब चीन एक विकासशील देश था। देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में व्यापक सुधारों के अग्रणी देंग ने वैश्विक व्यवस्था में चीन की स्थिति को मजबूत करने की दृष्टि से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में विनम्र रहने की सलाह दी थी और घरेलू मोर्चे पर शांत रहकर तेजी से विकास पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा था।
लेकिन शी जिनपिंग ऐसे समय में चीन के नेता हैं, जब दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के साथ तेजी से उभरती महाशक्ति है और वैश्विक स्तर पर सर्वाधिक वाणिज्यिक गतिविधियों में संलग्न है। यही नहीं, वह अपनी सैन्यशक्ति में भी बढ़ोतरी करता जा रहा है। इस तरह चीन ने न्यू डेवलपमेंट बैंक, एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड इन्वेस्टमेंट बैंक के निर्माण, शंघाई सहयोग संगठन के विस्तार और वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) जैसी महत्वाकांक्षी पहल में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका निभानी शुरू कर दी है।
चीन द्वारा समर्थित ओबीओआर की औपचारिक शुरुआत के मौके पर हाल ही में बीजिंग में करीब सौ देशों के नेताओं का जमघट लगा, जिसमें 28 देशों के राष्ट्र प्रमुख मौजूद थे। यह परियोजना दुनिया की आबादी का 60 फीसदी और वैश्विक डीडीपी का एक तिहाई कवर करती है। इस परियोजना का उद्देश्य परिवहन कनेक्टिविटी का नेटवर्क बनाना है, जो पूर्वी एशिया को दक्षिण-पूर्वी और दक्षिण एशिया, अफ्रीका, मध्य एशिया, भूमध्यसागरीय देश और यूरोप से जोड़ेगी। और कनेक्टिविटी बंदरगाहों, रेलमार्गों, सड़कों और यहां तक कि वायुमार्गों पर आधारित होगी, जो सामान, सेवाओं और निवेश में व्यापार सुविधा प्रदान करेगी।
इस परियोजना से चीन कैसे लाभ उठाएगा? सबसे पहले तो चीन के आर्थिक विकास में जारी मौजूदा मंदी को इससे रोका जा सकता है।चीन के उत्पादन की अति क्षमता को विदेशों में निर्यात की ओर मोड़ा जा सकता है। चीन की कंपनियां अपने श्रमिकों के लिए रोजगार के अवसरों के क्षरण को रोक सकती हैं। चीन की तकनीकी श्रमशक्ति को कई देशों में रोजगार मिल सकता है। चीन के कम ब्याज वाले अमेरिकी राजकोषीय बॉन्ड को उच्च लाभ की उम्मीद में दूसरे देशों में निवेश किया जा सकता है।
दूसरी बात, दुनिया के बड़े हिस्से में चीन का प्रभाव स्वतः बढ़ जाएगा। भारी मात्रा में पूंजी निवेश करके चीन ओबीओआर परियोजना में भागीदारी करने वाले कई देशों की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पर हावी हो सकता है और उनमें से कुछ तो कर्ज के जाल में भी फंस सकते हैं।
तीसरी बात, इस कनेक्टिविटी नेटवर्क के माध्यम से चीन एशिया प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी वर्चस्व से आसानी से निपट सकता है। एशिया को केंद्रबिंदु बनाने की नीति की शुरुआत राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने की थी और उसे आगे बढ़ाया राष्ट्रपति ओबामा ने, जिसका उद्देश्य चीन की बढ़ती ताकत का मुकाबला करने के लिए इस क्षेत्र में अमेरिकी सामरिक उपस्थिति बढ़ाना था। भले ही ट्रंप ने अपने पूर्ववर्तियों की नीतियों को छोड़ दिया हो, लेकिन वह इस क्षेत्र में बढ़ती शक्ति और प्रभाव से निपटने के लिए एशिया प्रशांत क्षेत्र में अधिक से अधिक अमेरिकी संलग्नता पर जोर देंगे। यदि वन बेल्ट वन रोड परियोजना सफल हो जाती है, तो चीन पश्चिमी एशियाई क्षेत्र से ऊर्जा स्रोतों के आयात और दक्षिण, मध्य, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और यूरोप में अपनी वस्तुओं के निर्यात के लिए हिंद महासागर के जलमार्गों पर बहुत कम निर्भर रहेगा।
चीन अपनी इस स्वप्नदर्शी परियोजना को परस्पर लाभकारी पहल के रूप में प्रचारित करना चाहता है। वैश्विक मंदी, यूरोपीय अर्थव्यवस्था में सुस्ती, ट्रंप की अमेरिका प्रथम की नीति और एशिया और अफ्रीका में आधारभूत संरचनाओं के विकास की जरूरतों ने वास्तव में चीन के प्रस्ताव को बेहद आकर्षक बना दिया है। तो क्या चीन अपने सपने को साकार करने में सक्षम होगा?
वास्तव में यह मसला सतह पर दिखाई देने से ज्यादा जटिल है। भारत ने संप्रभुता के कारणों से ओबीओआर को अपना समर्थन नहीं दिया है, क्योंकि ओबीओआर का एक हिस्सा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से संलग्न है, जो विवादित पाक अधिकृत कश्मीर और गिलगिट-बाल्टिस्तान से होकर गुजरता है। ऑस्ट्रेलिया भी इसमें शामिल नहीं है, क्योंकि चीन के साथ आर्थिक सहयोग से जो उसे लाभ मिलता है, उसके अतिरिक्त लाभ उसे इसमें नहीं दिखता है। अरब देशों की चिंता है कि इस परियोजना के पूरा होना पर ईरान ताकतवर बन जाएगा और पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन बिगड़ जाएगा। कुछ यूरोपीय देशों को आशंका है कि संवेदनशील पूर्वी यूरोप में चीन का प्रभाव महाद्वीप के भू-राजनीतिक नुकसान को बढ़ा देगा। कुछ अफ्रीकी देशों को संभावित कर्ज के जाल में फंसने का डर लग रहा है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाकिस्तान का नागरिक समाज भी ओबीओआर परियोजना को लेकर बहुत उत्साहित नहीं है, जिसे राजनीतकि संभ्रांत वर्ग ने अनिच्छा से गले लगा लिया है। बलूचिस्तान इसके नकारात्मक प्रभाव को लेकर चिंतित है, खासकर विदेशियों और अन्य नस्लीय समूहों की उपस्थिति को लेकर। पाकिस्तान में चीन का निवेश सुरक्षित नहीं है, क्योंकि इसका पता इस बात से चलता है कि दस हजार श्रमिकों की रक्षा के लिए पाकिस्तानी सेना ने बारह हजार सुरक्षा बलों की तैनाती की है।
इस तरह से चीन केंद्रित विश्व व्यवस्था का सपना एक कठिन काम है और भविष्य ही इसका वास्तविक परिणाम बता सकता है। भले ही यह परियोजना आंशिक रूप से सफल हो सकती है, चीन को एक बड़े समझौते से लाभ मिल सकता है, लेकिन भू-राजनीतिक मोर्चे पर चीन की महत्वाकांक्षा पूरी नहीं हो सकती है।