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इन नाकाबिल युवाओं का क्या करेंगे

Tue, 16 Jul 2013 08:43 PM IST
अनुराग दीक्षित
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भारत के 47 फीसदी स्नातक रोजगार के लिहाज से नाकाबिल हैं! 35 फीसदी स्नातक केवल क्लर्क की नौकरी के ही योग्य हैं! यह आकलन उच्च शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र से जुड़ी संस्था एस्पायरिंग माइंड का है, जिसके मुताबिक, हमारे देश के केवल 15 फीसदी स्नातक ही बेहतर रोजगार के लायक हैं। वहीं विश्व बैंक के एक अध्ययन में 10 से 25 फीसदी भारतीय स्नातकों को ही रोजगार के योग्य माना गया था। भारत जैसी विशाल आबादी वाले मुल्क में इस रिपोर्ट के मायने को जानने के लिए समझना होगा कि देश की करीब 65 फीसदी आबादी की उम्र 35 वर्ष से कम है।
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प्रत्येक वर्ष लाखों विद्यार्थी स्नातक की पढ़ाई पूरी करते हैं। यानी भारत एक युवा मुल्क है, जहां रोजगार तलाशने वालों की संख्या करोड़ों में है। संगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसर लगातार कम हो रहे हैं, जबकि असंगठित क्षेत्र में रोजगारपरक शिक्षा की ही आवश्यकता है। ऐसे में स्नातकों की आधी आबादी का रोजगार के लिए नाकाबिल होना बेरोजगारी या आर्थिक विषमता की दृष्टि से भारी सामाजिक और आर्थिक संकट पैदा कर सकता है। इन्हीं मुद्दों पर कई देशों में मचा हाहाकर आज भी सबका ध्यान खींचता है।

इस गंभीर समस्या को समझने के लिए देश की शिक्षा व्यवस्था को समझना भी जरूरी है। गैर सरकारी रिपोर्टें बताती हैं कि हमारे मुल्क में पांचवीं कक्षा का छात्र दूसरी कक्षा के गणित के सवाल हल नहीं कर सकता! जाहिर है, देश के अधिकांश नौनिहालों की बुनियाद ही कमजोर है। यकीनन सर्वशिक्षा अभियान से प्राथमिक स्कूलों में नामांकन दर बढ़ी है। इमारतें बनी हैं। बजटीय आवंटन भी बढ़ा है, लेकिन यही सब कुछ नहीं है। काबिल शिक्षकों की नियुक्ति और शिक्षा की गुणवत्ता में भारी सुधार जैसे मुद्दों पर अब गंभीरता से सोचे जाने की दरकार है।
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उच्च शिक्षा तक आते-आते हालात और बिगड़ते जा रहे हैं। कुकुरमुत्ते के जैसे खुलते निजी संस्थान एवं महंगी फीस के बीच शिक्षा की गुणवत्ता यहां भी बड़ी चुनौती बन चुकी है। दुनिया के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों की सूची में एक भी भारतीय विश्वविद्यालय के न होने पर स्वयं राष्ट्रपति चिंता जता चुके हैं। ऐसे में अच्छे संस्थानों में प्रवेश के लिए हाय-तौबा लगातार बढ़ रही है। तभी तो डीयू जैसे कुछ विश्वविद्यालयों की हजारों सीटों के लिए लाखों आवेदक कतार में होते हैं। जबकि दूसरी तरफ हजारों संस्थान छात्र, अध्यापक या बुनियादी सुविधाओं से ही वंचित हैं।

देश के हजारों कॉलेजों में आज भी प्राध्यापकों के पद रिक्त पड़े हैं! जाहिर है, जब पढ़ाने वाला काबिल अध्यापक ही नहीं तो वहां पढ़ने वाले छात्र-छात्राओं से रोजगार के लिए काबिल होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? इस सबके चलते एक बड़े हिस्से के लिए पढ़ाई सिर्फ रस्म अदायगी भर होकर रह गई है। बेहतर रोजगार के लिए अनिवार्य बन चुकी अंग्रेजी भाषा और कंप्यूटर की बेहतर जानकारी हमारे देश में अब भी दूर की कौड़ी हैं। यह तब है, जबकि देश में उच्च शिक्षा में नामांकन दर करीब 18 फीसदी ही है। यानी एक तो विश्व के अन्य देशों के मुकाबले नामांकन दर काफी कम है और उसमें भी 47 फीसदी की पढ़ाई बेकार है।

दूसरी तरफ, वर्षों से कॉलेजों के परपंरागत पाठ्यक्रमों को बदलने को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर फैसला नहीं हो सका है। कॉलेजों में जो पढ़ाया जा रहा है, उसमें से अधिकांश रोजगारपरक नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक, देश के 97 फीसदी कामगारों को कोई तकनीकी शिक्षा नहीं मिल सकी है। इसका सीधा असर उनकी आमदनी पर पड़ता है। अपने जीवन के करीब 15 वर्ष शिक्षा में व्यतीत करने के बाद देश के 58 फीसदी स्नातक केवल 6,250 रुपये महीना ही कमाने को मजबूर हैं।

जबकि कई राज्यों में अशिक्षित भी निर्धारित न्यूनतम मजदूरी के हिसाब से महीने भर में पढ़े-लिखों से ज्यादा कमा सकते हैं। अब राष्ट्रीय कौशल विकास कार्यक्रम के तहत वर्ष 2022 तक 50 करोड़ भारतीयों को तकनीकी शिक्षा देने का दावा किया जा रहा है, किंतु मौजूदा राजनीतिक तस्वीर को देखते हुए कहना मुश्किल है कि बहुत देर से जागी सरकार इस लक्ष्य को समय पर हासिल कर भी सकेगी या नहीं।
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