विस्तारवादी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए किसी भी करार और कानून को बेहिचक तोड़ने में, आधुनिक विश्व इतिहास में हिटलर के जर्मनी से भी ज्यादा खतरनाक है चीन। हिटलर ने सिर्फ मोलोतोव-रिबेनट्रॉप संधि तोड़कर सोवियत संघ पर हमला किया था। हिटलर पहले विश्वयुद्ध में पराजित, अपमानजनक शर्तों से दबे और बदला लेने पर उतारू एक नवोदित राष्ट्र का नेतृत्व कर रहा था। जर्मन जनता को 4,000 साल की 'महानतम सभ्यता' का गुमान नहीं था। और न जर्मनी को यह अहंकार था कि वह पूरी दुनिया को ज्ञान दे सकता है। 1949 की कम्युनिस्ट क्रांति के बाद माओ ने एक मुक्तिदायी विचारधारा की आड़ में चीनी सम्राटों की नीतियां जारी रखीं।
भारत सहित दुनिया के करोड़ों लोग चीनी कम्युनिस्ट क्रांति की शुद्धता के विभ्रम में फंसे रहे। हिंदी-चीनी भाई-भाई के दौर में वह चोरी से अक्साई चिन को हड़पता रहा। नेहरू को गलतफहमी रही कि चीन हमला नहीं करेगा और अगर ऐसा हुआ भी, तो विश्वयुद्ध की नौबत आ जाएगी। चीन ने 1962 में पराजित कर न केवल भारत का सिर नीचा किया, बल्कि आज भी वह हमारे जख्मों को कुरेद रहा है। 2006 में चीन ने 2005 की इस सहमति को अचानक तोड़ दिया कि सीमा विवाद तय करने में आबादी वाले इलाकों को नहीं छेड़ा जाएगा। वह तवांग ही नहीं, अरुणाचल के बड़े हिस्से की वापसी पर अड़ गया। भारत-सिक्किम-भूटान के संगम स्थल पर चल रहे तनाव के बीच अब उसने यह सफेद झूठ बोला है कि भूटान के साथ उसका कोई सीमा विवाद ही नहीं है। चीन एकमात्र देश है, जो दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को बलपूर्वक बदल रहा है। चीन दुनिया का अकेला देश है, जिसके बीस देशों के साथ सीमा विवाद रहे हैं। वह जिसे कमजोर समझता है, उसी पर शर्तें थोपता है।
भारत के प्रति उसकी हिकारत का हाल यह है कि दर्जनों बार खंड-खंड कर देने की धमकी दे चुका है। इस तरह के सैन्यवादी-संशोधनवादी देश से भारत कैसे निपटे? वर्ष 1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन की ऐतिहासिक चीन यात्रा के पहले हेनरी किसिंजर ने इसे बखूबी समझा था। किसिंजर ने शतरंज से मिलते-जुलते चीन के खेल वे ची का उल्लेख किया है। वे ची लंबी लड़ाई पर आधारित है, जबकि शतरंज में ऐसा नहीं होता। वे ची का बुनियादी सिद्धांत है सामरिक लचीलेपन पर आधारित घेरेबंदी। वे ची का कुशल खिलाड़ी बोर्ड पर खाली जगह पर कब्जा करते हुए विरोधी की सामरिक क्षमता का क्षरण कर डालता है। वे ची के साथ चीन का एक और नीति निर्देशक सामरिक सिद्धांत समझना आवश्यक है। भारत समेत विश्व भर की सैन्य अकादमियों और अनेक मैनेजमेंट स्कूलों में पढ़ाई जा रही, 2000 वर्ष पूर्व के चीनी युद्धविशारद सुन जू की किताब 'युद्ध की कला' में धोखा और भ्रामक सूचना के महत्व को रेखांकित किया गया है। सुन जू लिखते हैं, जब ताकत हो, कमजोर दिखें। जब सेना की तैनाती कर रहे हों, तब ऐसा दिखाई न पड़े। जब नजदीक हों, तब लगे, आप दूर हैं। जब दूर हों, तब लगे नजदीक हैं। जापान-विरोधी संग्राम के दौरान माओ ने इस सिद्धांत को इस प्रकार आगे बढ़ाया, दुश्मन हमला करता है, हम पलायन करते हैं। दुश्मन रुक जाता है, तब हम ताकत जुटाकर हमला करते हैं और उसे नष्ट कर डालते हैं।
अतीत के प्रति चीन का अनुराग देखिए। ईसा पूर्व 221 में सम्राट छिन शीहुआंग नें चीन का एकीकरण किया था। माओ ने छिन के सम्मान में कविता लिखी, सम्राट छिन शीहुआंग का अनादर न करें, श्रीमन/करें पुनर्विचार क्यों जलाई थीं किताबें/जीवित है आत्मा हमारे उस पुरखे ड्रैगन की/युगों-युगों तक चलती रही है छिन की परंपरा। करीब 2,300 साल पहले चंद्रगुप्त मौर्य ने विश्व विजयी यूनानी सेना को पराजित कर मगध से आगे बढ़कर अफगानिस्तान तक एक राज्यसत्ता कायम की थी। पर्सिपोलिस को ध्वस्त कर आगे बढ़ते हुए सिकंदर की सेना से मुकाबला हुआ पुरु का ,जो एक छोटे राज्य का राजा था। सिकंदर अंत में पुरु से समझौते के लिए मजबूर हो गया था। हमारी स्मृति में इन इतिहास पुरुषों का क्या स्थान है?
चीन को छोड़ कोई भी देश सुदूर अतीत के आधार पर 21 वीं शताब्दी में सीमाओं के निर्धारण की सोच भी नहीं सकता। चीनियों का मानना है कि ईसा पूर्व दूसरी सदी में भूटान और सिक्किम तिब्बत का हिस्सा थे। उसके आधार पर चीन ने 1991 में जारी एटलस में भूटान और सिक्किम को चीन का हिस्सा बताया, हालांकि तिब्बत पर चीन का हमेशा कब्जा कभी नहीं रहा।
मौजूदा विवाद के संदर्भ में भारत सरकार और जनता के विचार की धुरी यह होनी चाहिए कि चीन दुस्साहसी है और उसकी हर अविवेकी हरकत के पीछे विवेक होता है। हम 1962 को नहीं भूल सकते और चीन को 1979 भी अच्छी तरह याद होगा, जब उसने विएतनाम को सबक सिखाने के लिए उस पर हमला किया और खुद सबक सीखकर उसकी सेना लौट आई थी। सत्तरह साल पहले जॉन गारवर ने इसी संगम स्थल के बारे में लिखा था, अगर सिक्किम और भूटान से भारत का सैनिक प्रभाव समाप्त हो जाए, तो चुंबी घाटी होते हुए तेजी से आगे बढ़ना चीन के लिए सुगम हो जाएगा। अगर सिक्किम और भूटान में भारत की सैन्य उपस्थिति बनी रही, तो सिलीगुड़ी की तरफ चीन का आगे बढ़ना तो दूर, भारत की विनाशक गोलाबारी और बमबारी का चीनी सेना को सामना करना पड़ेगा। सारा दारोमदार इस बात पर है कि पहले किसकी पलक झपकती है। चौबीस घंटे के लाइव टेलीकास्ट और सोशल मीडिया के दौर में जनता की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। युद्धोन्माद खतरनाक है, तो मन की हार उससे भी ज्यादा संकटदायिनी। 1962 में विपक्ष ने संसद से सड़क तक ऐसा माहौल बना दिया था कि झाड़ पर चढ़ जाने के अलावा नेहरू के सामने कोई रास्ता ही नहीं बचा था। गनीमत है, अभी तक किसी ने गैरजिम्मेदाराना बात नहीं की है और सरकार पर सब छोड़ दिया है। अभी तो उस स्थिति के लिए भी तैयार रहना चाहिए, जब चीन का साथ देने के लिए पाकिस्तान दबाव बनाएगा। सेनाध्यक्ष ने दो मोर्चों पर लड़ने की बात यों ही नहीं कही है।