मांओं के दिल पर क्या गुजरती है, जब वे अपने बच्चों को भूखा देखती हैं, जब वे अपने बच्चों को बीमार देखती हैं, जब वे अपने बच्चों को परेशान देखती हैं? जब बेटी की चिट्ठी ससुराल से आती है और उसमे जो कुछ नहीं लिखा है, उसे समझकर वह बेटी के दुख का एहसास करती है। और फिर उन मांओं के दिलों पर क्या गुजरती है, जिनके सामने जवान बेटे की लाश बिछी होती है? ये लाशें अक्सर फौज के जवानों और अधिकारियों की होती हैं या फिर किसी आंदोलन में भाग लेने वालों की होती हैं। अपार दुख के बीच कम से कम इस बात की जानकारी तो होती है कि बेटा क्यों मरा। उसका नाम लेकर जिंदाबाद के नारे भी लगते हैं, जो दिल को कुछ तसल्ली भी देते हैं।
एक ऐसी मां को मैंने कुछ दिन पहले देखा, जो शायद इन सबसे ज्यादा दुखी और विचलित थी। उसके पंद्रह साल के लड़के को उनके सबसे बड़े त्योहार से ठीक एक दिन पहले बिना किसी कारण के मार डाला गया था। वह अपने भाइयों के साथ त्योहार के लिए नए कपड़े खरीदने दिल्ली गया था। लौटते वक्त उन सब पर रेल में सफर करने वाले सहयात्रियों ने हमला कर दिया। उनकी आपस में कोई दुश्मनी नहीं थी। डिब्बे में किसी बात को लेकर झगड़ा भी नहीं हुआ था। किसी तरह के गोश्त साथ लाने का भी कोई मसला नहीं था। बस पंद्रह साल के उस लड़के और उसके भाइयों के सिर पर टोपी थी। यही टोपी उस बच्चे की मौत का कारण बन गई। उसको सिर्फ मारा नहीं, बड़े धारदार छुरों से बदन पर बार-बार वार भी किया गया। स्टेशन पर उसने और उसके भाइयों ने उतरना चाहा, पर उनको उतरने नहीं दिया गया। उन्हें उनको मार डालना था। जिस स्टेशन पर गाड़ी की यात्रा समाप्त हुई, वहां लाश और घायलों को फेंक दिया गया और बाकी सब उतर गए। किसी ने कुछ देखा नहीं, किसी ने कुछ सुना नहीं।
यह सब कुछ रेल के डिब्बे में हुआ। वह एक ऐसी जगह है, जिसमें सुरक्षा का आभास होता है। रेल के डिब्बे के बारे में सोचते ही बहुत सारी खूबसूरत जगहों की याद ताजा हो जाती है। रेल में नए लोगों से मिलने, उनसे गपशप करने और फिर उनके साथ घर से लाया खाना बांटने का पूरा मौका मिलता था। सफर लंबा हो या छोटा, सहयात्रियों के साथ विश्वास और मित्रता का संबंध स्थापित हो ही जाता था।
भारतीय रेल का नारा है कि वह देश के एक हिस्से को दूसरे से जोड़ता है। लेकिन अब ये रेल के डिब्बे ऐसी जगहें बनने लगी है, जहां लोग एक दूसरे से जुड़ने के बजाय, एक दूसरे को शक और नफरत की निगाहों से देखने लगे हैं। ट्रेन के डिब्बों में लड़कियों और औरतों के साथ बलात्कार और हिंसक हमले भी हुए हैं। अगर लोगों को छुरा लेकर सफर करने की छूट मिलती रही, तो पता नहीं, ऐसी कितनी घटनाएं होंगी।
पंद्रह साल के उस लड़के की मां की आंखें बहुत खूबसूरत, नीले रंग की हैं। जब मैं उनसे मिलने गई, तो वे आंखें बिल्कुल सूनी थीं। आंसू भी सूख चुके थे। उसने मेरी तरफ देखकर कहा, अब ट्रेन में हमारे बच्चे कैसे बैठेंगे? और बिना बैठे काम कैसे चलेगा?
इस सवाल का कोई जवाब मेरे पास नहीं था। उल्टे इस सवाल ने मेरे दिल में कई सवाल पैदा कर दिए। अगर ट्रेन के डिब्बों में नफरत से भरे लोग छुरा लेकर घूमेंगे, तो क्या हममें से कोई सफर कर पाएगा? उन छुरों की तेज धार के चलते सब अंधे और बहरे बन जाएंगे। उनसे टपकते खून को देखने वाला कोई नहीं होगा। घायल की चीख सुनने वाला कोई नहीं होगा। हत्यारे की शक्ल पहचानने वाला कोई नहीं होगा।
-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं