गत दिनों मुजफ्फरनगर जिले के सिसौली गांव में गन्ना किसान चौधरी ओमपाल सिंह की आत्महत्या कई सवालों को जन्म दे गई। हरित क्रांति के दौरान समृद्धि के पायदान पर कभी मुजफ्फरनगर जनपद देश के समृद्ध जिलों में शुमार रहा है। ब्रिटिश शासन काल से ही पानी के वितरण का ऐसा सुनियोजित तंत्र कम जगहों पर उपलब्ध है, जैसा कि गंगा-यमुना के बीच के इस कृषि क्षेत्र का है।
गेहूं, धान, गन्ना, कपास, कई प्रकार की दालें, तिलहन, हरी सब्जियां, आम उत्पादन आदि ने इस क्षेत्र को आर्थिक तौर पर काफी मजबूत बना रखा है। अगर कहा जाए कि यहां शत-प्रतिशत भूमि सिंचित है, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। किसानों में महाजनों, सूदखोरों से कर्ज लेने की प्रवृत्ति भी नहीं है।
सहकारी बैंकों के कर्ज भी फसल के आगमन के साथ चुका दिए जाते हैं। शादी-विवाह जैसे समारोह पर खुले हाथों से पैसा खर्च करने की मानो इन इलाकों में होड़ लगी रहती है। यहां से पलायन की खबरें भी नहीं ही आती हैं। ऐसे में यहां एक किसान की आत्महत्या सोचने को मजबूर करती है।
हरित क्रांति के बलबूते तथा इन इलाकों की आर्थिक संपन्नता ने चौधरी चरण सिंह को राजनीति के शिखर पर पहुंचा दिया था। उनकी मृत्यु के बाद नेतृत्व और संघर्षों की बागडोर ठेठ देहाती किसान नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के हाथ में रही। सिसौली चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की जन्म और कर्मभूमि है।
1986 में उनके नेतृत्व में मेरठ का ऐतिहासिक धरना राजीव गांधी के गले की फांस बन गया था, जब कई दिनों तक लाखों किसान अपना-अपना राशन, पानी और हुक्का लेकर मेरठ के अंदर डटे रहे थे। तब अपने दूत के रूप में राजीव गांधी ने राजेश पायलट को भेजकर किसी तरह स्थिति पर नियंत्रण किया था।
सांगठनिक किसान आंदोलन के शिखर के वे दिन थे, जब उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. वीरबहादुर सिंह ने स्वयं सिसौली आकर किसानों की लगभग सभी मांगें स्वीकार की थी और वह भी एक साधारण किसान की तरह जमीन पर बैठकर खाना खाने को मजबूर हुए थे। सिसौली को लेकर कई किस्से-कहानियां मशहूर हैं।
जनता दल के शासन के दौरान चौधरी देवीलाल को सिसौली जाने का निमंत्रण मिला, तो सिसौली को किसानों की राष्ट्रीय राजधानी घोषित कर दिया गया। वह उस समय उप प्रधानमंत्री थे, और उनके पदनाम के आगे से उप हटाकर उन्हें किसानों का प्रधानमंत्री घोषित कर दिया गया था।
चौधरी टिकैत की मृत्यु के बाद नव उदारवाद ने नई राजनीति को जन्म दे दिया। प्राथमिकताएं और संघर्ष के मुद्दे बदल गए। कोरोना संक्रमण के कारण किसानों को भी असामान्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। महीनों लॉकडाउन के चलते चीनी मिलें बंद रहीं और कई जगहों पर खेतों में गन्ना खड़ा है और मिलें बंद हो रही हैं।
गन्ने का भुगतान न होने से कई मिलों पर किसानों ने धरने-प्रदर्शन भी किए हैं। चौधरी ओमपाल सिंह छोटे किसान थे। उनके पास लगभग एक एकड़ कृषि योग्य भूमि थी। सर्वविदित है कि भारत में लगभग 80 फीसदी किसानों के पास दो हेक्टेयर से भी कम कृषि योग्य जमीन है। इस स्थिति में जोत अलाभकारी भी हो जाती है।
उस पर से पर्चियों की आवंटन प्रक्रिया, मिल प्रबंधन की अनियंत्रित व्यवस्था और गन्ना समितियों व मिलों में प्रभावी सिंडिकेट का कब्जा है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कई अवसरों पर घोषणा की गई है कि किसी भी किसान का गन्ना शेष नहीं रहेगा, जो मिल द्वारा न लिया जाए।
अदालत द्वारा भी ऐसा आदेश दिया जा चुका है। बड़े प्रयत्न के बाद मृतक किसान को गन्ने की आपूर्ति के लिए पर्ची तो जरूर मिली, लेकिन गन्ना केंद्र पहुंचने पर उसे निराशा ही हुई, क्योंकि केंद्र बंद था। कई अन्य केंद्रों पर भी उस किसान के प्रयास बेनतीजा ही रहे।
अंततः उसने गन्ना के साथ अपने गांव लौटकर मजबूरीवश खुदकुशी को अंजाम दिया। यह आत्महत्या उत्तर प्रदेश की सरकारी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ी कर गई। आम तौर पर इन क्षेत्रों से किसान आत्महत्या के समाचार नहीं मिलते हैं।
देश में किसान आत्महत्या के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2018 में महाराष्ट्र में 3,594, कर्नाटक में 2,405, तेलंगाना में 908, आंध्र प्रदेश में 664, मध्य प्रदेश में 655, छत्तीसगढ़ में 467, तमिलनाडु में 401, पंजाब में 323 तथा उत्तर प्रदेश में 253 किसानों ने आत्महत्या की।
इस दौरान बिहार, बंगाल, उत्तराखंड आदि से आत्महत्या की कोई खबर नहीं आई है। एनसीआरबी की ही एक रिपोर्ट की मानें, तो आत्महत्या करने वाले कुल किसानों का लगभग 72 फीसदी हिस्सा छोटे एवं गरीब किसानों का रहा है, जिनके पास दो हेक्टेयर से भी कम जमीन है। इनका लगभग 80 फीसदी हिस्सा बैंक कर्ज से दबा पाया गया था।
जहां तक गन्ना किसानों को फसल के मूल्य भुगतान की समस्या है, तो यह हर वर्ष की कहानी है। सिर्फ उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों पर किसानों के 18,000 करोड़ रुपये बकाया हैं। यही स्थिति सभी गन्ना उत्पादक राज्यों की है। जबकि सेंट्रल शुगरकेन ऑर्डर के अनुसार, मिलों द्वारा किसानों को खरीद के 14 दिनों के अंदर कीमत भुगतान करने का आदेश है।
ऐसा न होने पर 15 फीसदी वार्षिक दर से ब्याज देने का प्रावधान भी है, लेकिन ऐसे आदेश कागजों तक सीमित रहे हैं। सरकार मिलों को घाटे से उबारने तथा किसानों की बकाया राशि भुगतान करवाने के उद्देश्य से हजारों करोड़ रुपये की वित्तीय मदद हर वर्ष देती रही है। फिर भी भुगतान प्रक्रिया में लेट-लतीफी आम बात बनी हुई है।
कोरोना संकट के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि कृषि ही एकमात्र क्षेत्र है, जो हमें भुखमरी और बर्बादी से बचाए हुए है। सरकार की भी प्राथमिक जिम्मेदारी है कि अन्य प्रतिष्ठानों की तरह कृषि एवं कृषकों की रक्षा करे। उत्तर प्रदेश में यह आखिरी आत्महत्या हो, यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार को और से मुस्तैदी से गन्ने की खरीद और भुगतान प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है।