फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

कोरोना काल का नया शास्त्र-सार

पिलकेन्द्र अरोरा, वरिष्ठ व्यंग्यकार Published by: योगेश साहू Updated Thu, 11 Jun 2020 03:07 AM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
कोरोना वायरस (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
उस रात मैं टीवी सीरियल महाभारत में कृष्ण-अर्जुन संवाद का एपिसोड देखकर सोया था। अचानक नींद में मैंने एक दिव्य वाणी सुनी, उठो वत्स! यह समय तुम्हारे सोने का नहीं है। देखो, कितने कोरोना रोगी, कितने वारियर्स और कितने परिजन जाग रहे हैं। कितने आइसोलेशन में और कितने क्वारंटीन में हैं, जिन्हें दहशत के कारण नींद नहीं आ रही है।


कितने मजदूरों को दिन-रात, भूखे-प्यासे नंगे पांव चलने के कारण नींद न आने की बीमारी हो गई है। और इधर एक तुम हो कि इस तरह निश्चिंत होकर सो रहे हो, जैसे कि वैक्सीन लगवा कर कोरोना से अभयदान पा लिया है। उठो, जागो। कोरोना की बात सुनकर मैं सकपकाकर उठा, तो देखा कि सामने टीवी वाले भगवान मुस्करा रहे हैं।


मैंने उन्हें प्रणाम किया, तो बोले, वत्स, आज मैं तुम्हें नया शास्त्र-सार सुना रहा हूं, ध्यान से सुनो। वत्स, शास्त्रों ने कहा था कि यह जीवन क्षणभंगुर है, जगत नश्वर है, लेकिन तुमने एक न सुनी। इसके बजाय ज्ञान-विज्ञान का बेसुरा गीत गाते रहे।


और अब न्यूज चैनलों पर कोरोना का स्कोर बोर्ड देखकर जब तुम्हें साक्षात अपनी ही अंतिम यात्रा दिखाई पड़ने लगी है, तब तुम्हें शास्त्रों का यह सत्य समझ में आ रहा है और तुम दहशत में आ जाते हो। तुममें आज इतनी दहशत घर कर गई है कि जब घर की कॉलबेल बजती है, तब तुम्हें लगता है कि कहीं यह साक्षात काल की बेल तो नहीं! और फिर तुम्हारी दशहत वायरस की मानिंद बढ़ जाती है।


मैंने तुमसे कहा था कि ईश्वर की भक्ति किया करो। लेकिन तुम जीवन भर दीवार फिल्म के हीरो अमिताभ बच्चन बने रहे और मंदिर में भगवान के दर्शन करना तो दूर, कभी उसकी सीढ़ियां तक नहीं चढ़े! तुम कहते थे न कि कौन भगवान, कैसा भगवान! लेकिन आज कोरोना काल में कोरोना जब काल बनकर दहाड़ रहा है, तब तुम्हें कण-कण में भगवान दिखने लगे हैं और तुम पल-पल उन्हें याद कर रहे हो।


जब मंदिर-गुरुद्वारे खुले हुए थे, तब तुम वहां कभी गए नहीं। और जब लॉकडाउन में वे बंद हुए, तो तुम उन्हें खुलवाने पर आमादा हो गए! वाह मनुष्य, वाह! तुम्हारा जवाब नहीं। काश, तुमने भक्त कबीर की बात मानी होती और सुख में भी भगवान का सुमिरन किया होता। तब तुम्हारा और तुम्हारी आत्मा का इम्युनिटी सिस्टम इतना कम नहीं होता।


वायरस का एकमात्र उपचार भक्ति रस है वत्स। काश, तुम समय पर जाग गए होते। मैंने तुमसे कहा था, माया-मोह से दूर रहो। पर तुम जीवन भर जर-जोरू-जमीन के जाल-जंजाल में उलझे रहे। भौतिकता की अंधी सुरंग में तुम मैराथन दौड़ लगाते रहे। तुम गाते थे, हर पल यहां जी-भर जियो, कल हो न हो!
विज्ञापन


और अब कोरोना में जब माया की छाया भी आइसोलेशन में चली गई, तब तुम्हारा मोहभंग होना शुरू हुआ। मैंने कहा था, जल में कमल की भांति जीवन जियो। पर तुम्हें हमेशा तरबतर रहने की आदत थी। और अब तालाब का पानी जब सूखता दिख रहा है, तब तुम बाहर निकलने के लिए आकुल-व्याकुल हो रहे हो।


मैंने तुमसे कहा था, सदा सहज और स्वस्थ रहो। पर तुम जीवन भर कृत्रिम और जटिल बने रहे। चेहरे पर चेहरा लगाए घूमते रहे। तुम कहते थे कि विश्व एक रंगमंच है, जीवन एक नाटक है और हम उसके पात्र। वह तुम्हारा अहं था वत्स! और अब असली चेहरा जब सामने आया, तब चेहरे पर वास्तविक मास्क लगाने को विवश होना पड़ा है। काश, तुमने नकली मास्क न लगाए होते।


रीयल लाइफ जी होती, तब आज तुम्हें अपना असली चेहरा छिपाने के लिए मास्क न लगाना पड़ता। मैंने तुमसे कहा था, राग-द्वेष से दूर रहो। लेकिन तुमने मेरी एक न सुनी। जिनसे राग रखना था, उनसे तुम द्वेष रखते रहे और जिनसे द्वेष रखना था, उनसे तुम राग रखते रहे। तुम कहते थे कि दिल है कि मानता नहीं।


अब सोशल डिस्टेंसिंग में जब न राग काम का रहा, न द्वेष, तब तुम पछता रहे हो। शुक्र मनाओ वत्स। अभी चिड़िया ने पूरा खेत चुगा नहीं है। फसल अभी बाकी है। इसलिए उठो और जागो। यह सिलसिला आगे और चलता कि अचानक अलार्म बजा और मैं नींद से जाग गया। हालांकि मैं वास्तव में जागा या नहीं, इसका मुझे पता नहीं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next