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समकालीन राजनीति के भूगोल में एक दरवाजा, मगर एक परदा भी

Sat, 22 Jun 2013 09:37 PM IST
कल्लोल चक्रवर्ती
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नरेंद्र दामोदरदास मोदी का राजनीतिक उत्थान एक घटना है। आधुनिक भारतीय राजनीति में कांग्रेस से इतर सामान्य पृष्ठभूमि के किसी राजनेता ने इतने कम समय में इतनी ऊंची उड़ान नहीं भरी। सार्वजनिक जीवन में सफल होने के लिए जिन गुणों की जरूरत पड़ती है, उनके अभाव के बावजूद मोदी की लोकप्रियता अगर नए कीर्तिमान बना रही है, तो इसकी बड़ी वजह हमारा यह समय है।
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जब राजनीति और भ्रष्टाचार का चोली-दामन का संबंध है, जब सार्वजनिक छवि वाले लोग गलत वजहों से चर्चा में आते हैं, जब विदेशी मुल्क हमारी राष्ट्रीय छवि को निशाना बनाने में सफल हो जाते हैं, तब मोदी जैसी शख्सियत पर भरोसा बढ़ता है, जिसने अपना परिवार नहीं बनाया, जिसने गोधरा के धब्बे को धोने के लिए ही सही, विकास पर जोर दिया और जो जब-तब विदेशी प्रतीकों को, चाहे वे मुस्लिम आक्रांता हों या धर्म-परिवर्तन करने वाले ईसाई, ध्वस्त करने की बात करता है।

मामूली पारिवारिक पृष्ठभूमि से संघ तक की यात्रा, आपातकाल के दौर में उनके कठिन परिश्रम और गुजरात से निकाले जाने के बाद हिमाचल प्रदेश और हरियाणा में भाजपा को मजबूत बनाने में नरेंद्र मोदी की भूमिका की उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। जिस दौर में नरेंद्र मोदी की पहचान व्यापक हुई है, उसी समय दो वरिष्ठ पत्रकारों की मोदी पर किताब उनके व्यक्तित्व और राजनीति पर मुकम्मल रोशनी डालती है।
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ये लेखक बताते हैं कि आधुनिक भारतीय राजनीति के निर्विवाद चाणक्य वह इसलिए हैं कि एक-एक कर बड़ी होशियारी से उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया। लालकृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता के दौर में गोविंदाचार्य के अलावा वह दूसरे प्रचारक थे, जो संघ से भाजपा में आए, लेकिन उनकी तुलना में गोविंदाचार्य आज कहीं नहीं दिखते।

जिस पार्टी ने एकात्म मानववाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद जैसे जुमले गढ़े, उस पार्टी के इस तारणहार ने गोधरा की प्रतिहिंसा में राज्य-प्रायोजित हिंसा पर न सिर्फ कभी माफी नहीं मांगी, बल्कि सद्भावना मिशन जैसे दिखावे के आयोजन में मुस्लिम टोपी खारिज कर अपने तेवर का भी परिचय दिया। खुद पर लगे आरोप को वह छह करोड़ गुजरातियों की अस्मिता से जोड़ सकते हैं, तो कच्छ में भूकंप पीड़ितों की याद में आयोजित सभा को भूमि पूजन जैसे ठेठ हिंदू आयोजनों से जोड़कर उपस्थित अल्पसंख्यक समुदाय को सीधा संदेश दे सकते हैं।

दोनों लेखकों का मानना है कि चूंकि गुजरात सदियों से धार्मिक रूप से विभाजित रहा है, इसलिए मोदी का जादू वहां चला है, लेकिन यही जादू पूरे देश में चलेगा, इसकी बहुत गारंटी नहीं है। मुखोपाध्याय और नाग, दोनों ने नरेंद्र मोदी के जीवन को जिस तरह उनकी संपूर्णता में सामने रखा है, वह बेहद उल्लेखनीय है। किंशुक नाग अगर अपेक्षाकृत आक्रामक हैं, तो नीलांजन मुखोपाध्याय की किताब में विस्तार भी है और शोध भी।
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