शहरों के इतिहास तारीखों का महत्व बताने के लिए नहीं लिखे जाते। न ही वे पुराने और मौजूदा दौर का फर्क बताने के लिए लिखे जाते हैं। वैसे भी पारंपरिक इतिहास से अलग सब अल्टर्न हिस्ट्री के केंद्र में आम लोग होते हैं। इसलिए पटना के इतिहास के बारे में जानने के इच्छुक लोगों को यह किताब निराश करेगी। इतिहास की बजाय ऐतिहासिक ब्योरों और मौजूदा घटनाओं के आईने में यह उस शहर को जानने-परखने की एक कोशिश है, जो छठी शताब्दी ईसा पूर्व में खड़ा हुआ था। इसमें इतिहास इतना भर है, जिससे कि मदद ली जा सके। वह इतिहास बताता है कि मौर्य और गुप्त वंश के समय जो पटना भव्य दिखता था और फाह्यान व ह्वेन सांग ने जिसे सुनियोजित ढंग से बसा शहर बताया था, वह अंग्रेजों के दौर में, कपास, चीन और अफीम के निर्यात का एक बड़ा केंद्र बन गया था।
उसी दौर में पटना की तस्वीर बिगड़नी शुरू हो गई थी। यहां बिंदेश्वर पाठक का जिक्र है, जिन्होंने शौचालय क्रांति की नींव डाली; लेकिन उनके शहर पटना में शौचालय विहीन लोगों की संख्या अच्छी खासी है! आज का पटना किस तरह है? पटना मेडिकल कॉलेज की स्थिति ठीक नहीं, कभी विद्वानों का शहर रहा पटना अब प्रतियोगी परीक्षाओं का केंद्र बन गया है, और उच्च शिक्षा का हाल यह है कि पटना विश्वविद्यालय के किसी भी विभाग में पिछले बीस वर्षों से कोई नियुक्ति नहीं हुई! पटना में चूहों का उपद्रव इतना ज्यादा है कि वे इस किताब का शीर्षक बनते हैं। रूपक में देखें, तो लेखक खुद को डूबते जहाज को छोड़कर अमेरिका भाग जाने वाला चूहा बताते हैं!
लेखक ने पटना को तीन हिस्सों में बांटा है। एक पटना वह है, जिसे पटना छोड़कर बाहर गए लोगों ने बनाया है। कलाकार सुबोध गुप्ता और टेलीविजन पत्रकार रवीश कुमार को उन्होंने इस श्रेणी में रखा है। दूसरा पटना वह है, जिसे पटना में रह रहे लोगों ने बनाया। सुपर-30 के आनंद कुमार और क्रांतिकारी कवि आलोक धन्वा इस कोटि में आते हैं। आनंद कुमार का जीवन बताता है कि एक जीनियस को पटना में होने की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है, तो आलोक धन्वा के जरिये लेखक एक बेचैन शहर की असलियत का खुलासा करता है। कवि और हिंदी शिक्षक जगदीश नारायण चौबे भी इसी कोटि में आते हैं, जो नीतीश कुमार को पढ़ा चुके हैं। तीसरे पटना के निर्माता वे हैं, जो आस-पास के शहरों-कस्बों से पढ़ने, इलाज कराने और अपना अस्तित्व बचाने के लिए आते हैं और उसी में एकाकार हो जाते हैं।
लेखक के लिए पटना पर लिखना स्मृतियों में लौटने जैसा है, लेकिन अच्छी बात यह है कि अपनी तरफ से कोई निष्कर्ष देने के बजाय उन्होंने बिहार की राजधानी को उसकी समग्रता में रखा है। एक बिहार वह है, जिसे वी.एस.नायपॉल के भाई शिव नायपॉल कलंकित करने की कुचेष्टा करते हैं, दूसरा बिहार वह है, जिसके बारे में 'ग्रांटा' के पूर्व संपादक इयान जैक सकारात्मक ढंग से लिखते हैं। अपने यहां शहरों पर किताबें कम ही आई हैं; इस दृष्टि से दिल्ली पर लाला महेश्वर दयाल की पुस्तक, और सुधीर विद्यार्थी की हाल में ही शाहजहांपुर पर आई किताब उल्लेखनीय है। अमिताव कुमार की मौजूदा किताब उन दोनों से अलग तो है ही, मूल्यवान शोध, चुटीली टिप्पणियों और इतिहास की मौजूदगी के बावजूद उबाऊ न होने के कारण यह किताब पठनीय और महत्वपूर्ण बन पड़ी है।