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कहां फिरत मगरूरी में, मन लागो यार फकीरी में

Sat, 31 Aug 2013 09:10 PM IST
आबिदा परवीन/ पाकिस्तान की मशहूर गायिका
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सूफियाना गायिका के तौर पर भले ही पाकिस्तान और पूरी दुनिया का सिंधी समुदाय मुझे इज्जत बख्शे, लेकिन मैं तो बस सूफियाना नज्मों के जरिए अल्लाह की बंदगी करती हूं। जब मैं गाती हूं तो दिल में अल्लाह और उसकी नेमतों के सिवाय और कुछ नहीं होता। मुझे अपने आस-पास की हर चीज में अल्लाह की सूरत नजर आती है। इंसान को अल्लाह का दिया हुआ सबसे खूबसूरत नजराना है सूफियाना कलाम। सूफीवाद में अल्लाह की इबादत को एक अलग ही नजर से देखा जाता है। सूफियाना कलाम अल्लाह और इंसान के बीच एक रिश्ता कायम करते हैं और हर दिन अल्लाह के करिश्मे का कुछ हिस्सा हम तक भी पहुंच जाता है ताकि हम उसके और करीब जा सकें।
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जब मैं कार्यक्रम पेश कर रही होती हूं तो मैं खुद को अल्लाह से जुड़ने का सिर्फ एक माध्यम समझती हूं। मुझे खुद पर किसी तरह का गुरूर नहीं है। वह खुदा ही है जो अपने बंदों को एक जगह पर बुलाता है ताकि वे उसकी मोहब्बत महसूस कर सकें। हम इतने तजुर्बेकार नहीं हैं कि खुदा की चीजों को समझ सकें। मैं यही कोशिश करती हूं कि अपने श्रोताओं को उस रुहानी ताकत के साथ जोड़ सकूं। मेरी रग-रग उस फासले को मिटा देना चाहती है जो इस दुनिया और अल्लाह की रहनुमाई के बीच है।

भारत और पाकिस्तान में लोग मुझे इतना पसंद करते हैं कि मुझे दूसरे देशों में कार्यक्रम करने का मौका कम ही मिल पाता है। लेकिन मौका मिलने पर मैं दूसरे देशों में भी कार्यक्रम करती हूं ताकि वहां के लोगों को सूफीवाद से जुड़ने का मौका मिले। मैं जहां कहीं भी जाती हूं, अल्लाह के फजल से हर जगह लोग मुझ पर अपना प्यार लुटाते हैं। जब हम गाते हैं जो हममें एक अलग ही रुहानी ताकत आ जाती है और शायद वही चीज लोगों के दिल में उतर जाती है। मुझे एक खूबसूरत वाकया याद आता है। एक बार मैं यूरोप के टूर पर थी, डेनमार्क में हमारा कार्यक्रम होने वाला था। यह कार्यक्रम सात बजे शुरू होने वाला था। जिस जगह कार्यक्रम पेश होना था, वहां साउंड चेक के लिए मैं चार बजे पहुंच गई, लेकिन मुझे यह देखकर हैरत हुई कि सूफीवाद के बहुत से प्रशंसक गेट के बाहर कतार में खड़े थे। साउंड चेक के दौरान के गवाह बनने के बाद उन सभी ने कार्यक्रम का भी भरपूर लुत्फ उठाया। जब मैं तीन बरस की थी, तभी से गा रही हूं। तभी से सूफियाना कलामों से मुझे इश्क हो गया। एक महिला सूफी गायिका होने की फिक्र मैंने कभी नहीं की क्योंकि मेरे अब्बा उस्ताद गुलाम हैदर खुद एक जाने-माने सूफी गायक थे और उनकी शागिर्दी में मैंने बहुत कुछ सीखा।
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एक महिला होने के नाते मेरे साथ कभी नाइंसाफी नहीं हुई। आमतौर पर जिस तरह का माहौल घरों में होता है, उससे हमारे घर का माहौल बिल्कुल जुदा है। मेरे घर में हर शख्स मेरा खयाल रखता है। मैं बहुत खुशकिस्मत हूं कि मैं एक सूफी घराने में पैदा हुई। मैं एक ऐसे माहौल में पली-बढ़ी, जहां की फिजाएं सूफियाना संगीत से गुलजार रहती हैं। मेरे घरवाले अल्लाह से मेरी बंदगी और रियाज की जरूरतों को बखूबी समझते हैं इसलिए मुझे किसी तरह की मुश्किल नहीं होती। सूफी गायिका के तौर पर कार्यक्रम पेश करते हुए मुझे एक अरसा बीत चुका है, लेकिन मैं मानती हूं कि मुझे अब भी बहुत कुछ सीखना बाकी है।

पाकिस्तान और भारत के बहुत से प्रतिभाशाली नौजवान मेरे कलामों के साथ सूफी गायन में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं, जिससे एक नए इतिहास की इबारत लिखी जाएगी। सूफीवाद का जादू है ही कुछ ऐसा कि लोग इसके दीवाने हो जाते हैं। बात चाहे तुर्की के फकीरों की हो, या सूफी संतों और उनकी दरगाहों की, या फिर पश्चिमी दुनिया की सोच पर रूमी के असर की, अल्लाह की इबादत में खुद को सराबोर कर देने वाले सूफी संतों ने सूफीवाद को नए मुकाम पर पहुंचाया है। सूफियाना संगीत अल्लाह से इश्क और उसकी इबादत का ऐसा रास्ता दिखाता है, जिसमें सब कुछ अल्लाह पर कुर्बान करने की हसरत होती है। दरगाह के गायकों से लेकर नए जमाने के पॉप गायकों तक, सूफी संगीत अलग-अलग शाहकारों में दुनिया भर में मशहूर रहा है। सूफी चीज ही ऐसी है, दिल में बस जाए तो मगरूरी से अलग, मन फकीरी में रमने लगता है।
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