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दावे से दूर जमीनी हकीकत

Fri, 17 Apr 2015 08:19 PM IST
एम के वेणु
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यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परंपरा तोड़ते हुए विदेशी धरती पर पूर्व सरकारों की गंभीर आलोचना की। वैश्विक राजनय में ऐसा नहीं होता। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को अपने पूर्ववर्ती जॉर्ज डब्ल्यू बुश की अमेरिका से बाहर आलोचना करते हुए आप कभी नहीं सुनेंगे। पर कनाडा में मोदी ने पूर्ववर्ती सरकारों के दौर को 'स्कैम इंडिया' (घोटालों का भारत) बताया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार ने 'पिछली सरकारों द्वारा जमा की गई गंदगी हटाने का काम किया है।' मुमकिन है, इसमें पूर्व एनडीए सरकार के साथ-साथ पिछले पंद्रह वर्षों में भाजपा शासित विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा जमा की गई 'गंदगी' भी शामिल हो।
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जर्मनी में प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि कैसे पूर्ववर्ती सरकार ने 'मुक्तभाव से रूमाल की तरह कोयला खदान बांटे।' यह कहते हुए मोदी इस तथ्य से पूरी तरह अनजान थे कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकारों ने एक लाख करोड़ रुपये की कोयला खदान मुक्तभाव से निजी क्षेत्र की कंपनियों को आवंटित की। उन्हें भी सुप्रीम कोर्ट ने अवैध बताकर रद्द किया है। पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) विनोद राय ने कहा था कि राज्य सरकारों द्वारा अपने सार्वजनिक क्षेत्र की खनन कंपनियों के जरिये सीधे आवंटित किए गए कोयला खदानों से हुए घाटे का आकलन करने के लिए उनके पास पर्याप्त साधन नहीं हैं। जाहिर है, पूर्ववर्ती सरकारों पर 'गंदगी' फैलाने का आरोप लगाते हुए नरेंद्र मोदी ने इन विवरणों में जाने की जरूरत नहीं समझी।

बयानबाजी में प्रधानमंत्री इतनी दूर चले गए कि उन्होंने दावा किया कि पूर्व की सरकारों ने जो काम दशकों में नहीं किया, उसे उनकी सरकार ने ग्यारह महीनों में कर दिखाया! उन्हें विदेशी धरती पर ऐसी अतिशयोक्ति से परहेज करना चाहिए था, क्योंकि भारत जैसी जटिल राजनीतिक अर्थव्यवस्था में ऐसे अतिरंजित दावों की अक्सर कलई खुलती रही है।
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प्रधानमंत्री मोदी का एक बड़ा दावा फ्रांस में उल्टा पड़ गया, जहां सबको चौंकाते हुए उन्होंने सीधे वहां की सरकार से 36 राफेल एयरक्राफ्ट का सौदा किया। यह बिल्कुल अप्रत्याशित था, क्योंकि 126 राफेल विमानों का करार पहले ही हो चुका था, जिनमें से पहली खेप के 18 विमानों की खरीद की प्रक्रिया चल रही थी, जबकि शेष 108 विमानों का निर्माण 'मेक इन इंडिया' के तहत हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) में होना था। 'मेक इन इंडिया' में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और अगले कुछ वर्षों में खुद ही उसे तैयार करने की प्रक्रिया शामिल है, जो सार्वजनिक क्षेत्र की एचएएल को अंततः आत्मनिर्भर बनाती। भारत दुनिया में रक्षा उपकरणों का सबसे बड़ा आयातक बनकर उभरा है। इसलिए विचार यह है कि एक बड़े खरीदार के रूप में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, स्वदेशी क्षमता विकसित करने और रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए भारत की स्थिति का फायदा उठाया जाए। हालांकि 36 राफेल एयरक्राफ्ट खरीद के सीधे सौदे और बाद में रक्षा मंत्री के इस बयान ने, कि एचएएल के साथ संयुक्त उत्पादन का करार रद्द हो सकता है, सरकार ने 'मेक इन इंडिया' को विडंबनापूर्वक 'मेक इन फ्रांस' में बदल दिया है। इसका मतलब यह है कि मोदी सरकार की योजना के विपरीत ज्यादा उत्पादन और रोजगार सृजन भारत के बजाय फ्रांस में होगा।

बड़ी बात यह है कि मोदी तत्काल बदलाव लाने के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं। पर जमीनी हकीकत ग्यारह महीने पूर्व की स्थिति से ज्यादा भिन्न नहीं है, जब वह प्रधानमंत्री बने थे। असल में केंद्र एवं राज्य में नौकरशाही उनकी कार्यशैली के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पाई है। बेशक नौकरशाही खुलेआम नहीं बोलती, पर निजी बातचीत में मानती है कि मोदी के कई भव्य विचारों को जमीनी स्तर पर लागू नहीं किया जा सकता। कई वरिष्ठ नौकरशाह अब भी 'मेक इन इंडिया' की धारणा के बारे में स्पष्ट नहीं हैं कि नारों से परे इसका मतलब क्या है।

बहुप्रचारित जन-धन योजना की जमीनी हकीकत प्रधानमंत्री के बड़े दावों की असलियत बताने वाला दूसरा उदाहण है। विदेशी जमीन पर मोदी ने इस योजना को स्वतंत्र भारत में गरीबों के लिए सबसे बड़ी योजना बताया। तथ्य यह है कि सरकार ने बैंकों पर 31 मार्च, 2015 तक 14.7 करोड़ नए खाते खोलने का दबाव बनाया। लेकिन इनमें से 8.5 करोड़ खातों में अब भी जमा राशि शून्य है। इस लेखक ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और बीमा कंपनियों से बात की, तो सबने यही कहा कि शून्य शेष खातों को बनाए रखना व्यावहारिक नहीं है, क्योंकि एक अप्रयुक्त खाते को बनाए रखने में बैंक को 125 रुपये की लागत आती है। इसके अलावा सरकार के वायदे के मुताबिक रुपे कार्ड जारी करने के लिए प्रति खाता सौ रुपये अतिरिक्त खर्च होता है। बैंक निजी तौर पर मानते हैं कि बगैर वास्तविक बदलाव के सिर्फ खाते खोलने के इतने बड़े लक्ष्य के पीछे भागना न केवल बेहद कठिन काम है, बल्कि इसका मतलब भी नहीं है।

मोदी दावा करते हैं कि पहली बार इतने बड़े पैमाने पर गरीबों का खाता खोला गया, पर हाल ही में पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने अपने एक लेख में बताया है कि यूपीए सरकार ने पांच से सात वर्षों के दौरान विशेष अभियान के तहत गरीबों के लिए 24 करोड़ बैंक खाते खोले। अगर सचमुच ग्रामीण क्षेत्रों में इतने बैंक खाते खुले हैं, तो मोदी सरकार उत्तर भारत के लाखों पीड़ित किसानों को एकमुश्त राहत राशि उनमें हस्तांतरित क्यों नहीं कर रही? आईआईएम, बंगलूरू के छात्रों ने एक सर्वे में यह पाया कि सार्वजनिक बैंक और बीमा कंपनियां इस बारे में कतई आश्वस्त नहीं हैं कि वे जन-धन योजना के तहत दूरस्थ गांवों तक पहुंच बनाने में सफल होंगी।

समय आ गया है कि मोदी जमीनी स्तर पर विकास संबंधी जरूरी काम करें। इसकी शुरुआत वह कृषि अर्थव्यवस्था के व्यापक संकट की प्रकृति को समझने के लिए ग्रामीण भारत के दौरे के तौर पर कर सकते हैं। क्या मेक इन इंडिया में सबसे पहले कृषि अर्थव्यवस्था को सुनिश्चित करना जरूरी नहीं है!
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