फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

ज्यादा जरूरी है भरोसे की सूची: चुनाव आयोग सरकारी विभाग नहीं; आईटी व्यवस्था की स्वतंत्र जांच, निगरानी जरूरी

राजीव शुक्ला
Updated Tue, 29 Sep 2026 09:11 AM IST

सार

चुनाव आयोग की सबसे बड़ी ताकत जनता का भरोसा ही है। अगर उसका चुनावी प्रक्रिया से विश्वास उठ गया, तो यह किसी सरकारी आदेश से वापस नहीं आएगा।
विज्ञापन
विज्ञापन
चुनाव आयोग में विवादों की कहानी पुरानी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स


एसआईआर के नाम पर मतदाता सूची की जांच चल रही है और आयोग कहता है कि इसका मकसद सूची को साफ करना है। ठीक है, लेकिन लोकतंत्र में केवल मकसद नहीं देखा जाता, तरीका भी देखा जाता है। एक राज्य में यदि एक पार्टी तीस लाख मतों के अंंतर से जीत रही है और अापने एक जांच के नाम पर इकत्तीस लाख वोट हटा दिए, तो इसका क्या अर्थ होगा? क्योंकि वोट कोई सरकारी कागज नहीं है, जिसे गलती से काट दिया और बाद में जोड़ दिया। वोट उस आम आदमी की ताकत है, जिसके पास सत्ता के दरवाजे तक पहुंच नहीं है।  इसलिए सवाल यह है कि मतदाता सूची की सफाई करते समय कहीं मतदाता ही तो नहीं साफ हो रहे?


विपक्ष यह सवाल लगातार उठा रहा है कि प्रक्रिया के बहाने सही भारतीयों को भी वोट से बाहर करने का रास्ता बनाया जा रहा है। इसे सरकार और चुनाव आयोग खारिज कर सकते हैं, पर आरोप को राजनीतिक बताकर खारिज कर देना कहां की जवाबदेही और जिम्मेदारी है? आप आंकड़े सामने रखिए कि कितने नाम हटे? क्यों हटे? कितने लोगों ने आपत्ति की? कितनों की आपत्ति सही निकली? कितने नाम वापस जोड़े गए? कितने लोग ऐसे रहे, जो प्रक्रिया पूरी ही नहीं कर पाए? और  मतदान वाले राज्यों में यह प्रक्रिया चुनावों से कितनी पहले पूर्ण हुई? दिल्ली में लाखों मतदाताओं को नोटिस दिए गए हैं। आयोग का कहना है कि नोटिस का अर्थ नाम काट देना नहीं है। लोगों को अपनी बात रखने का मौका मिलेगा। यह बात अपनी जगह ठीक है, लेकिन जिसे नोटिस मिला है, उससे एक बार गांव की भाषा में पूछिए कि उसे यह प्रक्रिया कितनी आसान लगती है।  जिस मजदूर ने पांच शहर बदल दिए, वह हर जगह का रिकॉर्ड कहां से लाएगा? जिस बुजुर्ग को अपने माता-पिता के पुराने दस्तावेज तक याद नहीं, वह किस दफ्तर में जाएगा?


दिल्ली में बैठकर फाइल पर लिखा जा सकता है कि नागरिक को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा, लेकिन लोकतंत्र की असली लड़ाई फाइल में नहीं, गरीब आदमी के दरवाजे पर होती है। यहीं चुनाव आयोग को सबसे ज्यादा सावधान होना चाहिए, क्योंकि किसी गलत नाम को हटाना प्रशासन की सफलता हो सकती है, पर किसी सही नागरिक का नाम कट जाना सिर्फ प्रशासन की गलती नहीं रह जाती। वह नागरिक के अधिकार का सवाल बन जाती है। दस महीने में दो चुनाव आयुक्त 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज करते हैं, तो कहा जाता है कि बहुमत से फैसला होना कानून की व्यवस्था है, पर बहुमत कोई जादुई शब्द नहीं है, जिससे हर सवाल खत्म हो जाए। अगर दो आयुक्त बार बार किसी प्रक्रिया पर आपत्ति कर रहे हैं, तो उसका विवरण जानने का अधिकार सबको है। सबसे बड़ा खतरा यही है कि बहुमत के नाम पर सवाल पूछना ही बेकार समझ लिया जाए।  


जहां तक  सॉफ्टवेयर का सवाल है, करोड़ों मतदाताओं का रिकॉर्ड डिजिटल सिस्टम पर है। यह जरूरी भी है। इतनी बड़ी आबादी की मतदाता सूची कंप्यूटर के बिना संभालना मुश्किल है, लेकिन लोकतांत्रिक अधिकार को सिर्फ सॉफ्टवेयर के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। सॉफ्टवेयर गलती कर सकता है, डाटा गलत जा सकता है, किसी अधिकारी का फैसला दर्ज करने में असफल हो सकता है, तब उसका नुकसान किसे होगा? तकनीक, व्यवस्था की मदद के लिए है, न कि व्यवस्था, तकनीक की मदद के लिए। कंप्यूटर के लिए एक नाम डाटा है और हमारे लिए वह नाम एक इन्सान है। इसीलिए, चुनावी आईटी  व्यवस्था पर स्वतंत्र जांच, साफ जवाबदेही और मानवीय निगरानी जरूरी है।


आयोग किसी सरकार का विभाग नहीं है। उसे किसी सरकार के पक्ष में नहीं होना चाहिए और किसी विपक्ष के पक्ष में भी नहीं। उसकी निष्ठा सिर्फ संविधान और मतदाता के प्रति होती है, लेकिन स्वतंत्र संस्था होने का मतलब जवाबदेही से जुड़े सवालों से मुक्त होना नहीं होता। लिहाजा, चुनाव आयोग को आलोचना से बचने की नहीं, बल्कि पारदर्शिता बढ़ाने की जरूरत है। किसी नागरिक का नाम काटिए, तो कारण बताइए, नोटिस दीजिए, तो भाषा ऐसी रखिए, जिसे गांव का आदमी समझ सके, कागज मांगिए, तो बताइए कि कौन-सा दस्तावेज और गलती हो, तो जल्दी सुधारिए, सॉफ्टवेयर का फैसला इन्सानी जांच से ऊपर मत रखिए और आयोग के भीतर गंभीर आपत्तियां उठें, तो उनका जवाब रिकॉर्ड पर रखिए। यह लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है। चुनाव आयोग की सबसे बड़ी ताकत उसकी कानूनी शक्ति नहीं, बल्कि जनता का भरोसा है। अगर नागरिकों के मन में यह बैठ गया कि चुनाव की प्रक्रिया पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो उस भरोसे को वापस लाना किसी सरकारी आदेश से संभव नहीं होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next